वागड़ अंचल में सुविधाएं मिली तो अशिक्षा की बेडिय़ा टूटी, बदली शिक्षा की तस्वीर और युवा पीढ़ी की तकदीर

- सुविधाएं जुटीं तो बदल गया आदिवासी शिक्षा का मिजाज
- कुशलगढ़ महाविद्यालय में छात्राओं की संख्या अधिक
- सागवाड़ा क्षेत्र में ही करीब 20 से अधिक महाविद्यालय

By: Varun Bhatt

Published: 10 Sep 2019, 03:27 PM IST

बांसवाड़ा. राहें आसान हुईं, आर्थिक सीमाएं टूटीं और सुविधाएं जुटीं तो शिक्षा की तस्वीर और युवा पीढ़ी की तकदीर बदल गई। आदिवासी बहुल और अपेक्षाकृत पिछड़े दक्षिणांचल के बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ जिले के युवक युवतियां नए जमाने के साथ कदमताल करने लगे हैं और उच्च शिक्षा लेकर विभिन्न क्षेत्रों में परचम भी लहराने रहे हैं। इन आदिवासी जिलों में गरीबी, अशिक्षा और जागरूकता का अभाव ऐसे डेरा डाले हुए था कि लोग खेती, मजदूरी से आगे सोच तक नहीं पा रहे थे, लेकिन नए जमाने में अब इन इलाकों के युवा बड़ी तादाद में उच्च शिक्षा से जुड़ गए हैं।

कुकुरमुत्तों की तरह खुल गए कॉलेज
डंूगरपुर जिले के सागवाड़ा उपखण्ड के आस-पास के क्षेत्र में स्नातक स्तर के करीब 20 राजकीय एवं निजी महाविद्यालय संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा बांसवाड़ा, डंूगरपर व प्रतापगढ़ जिले में करीब 22 महाविद्यालयों में बीएड़ व बीएबीएड तथा बीएसीबीएड पाठ्यक्रम संचालित हैं। इन कॉलेजों में हजारों विद्यार्थी उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। वहीं तकनीकी व व्यावसायिक शिक्षा के दृष्टिगत बांसवाड़ा में इंजीनियरिंग तथा डंूगरपुर में मेडिकल कॉलेज सहित पॉलेटिक्नक कॉलेज भी संचालित हो रहे हैं। यह भी शिक्षा के प्रति बढ़ते रुझान का ही परिचायक है। कभी इन इलाकों में इक्का-दुक्का कॉलेज ही हुआ करते थे।

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यहां तो छात्रों से आगे निकल गई छात्राएं
शिक्षा की बदलती तस्वीर देखना हो तो बांसवाड़ा जिले के कुशलगढ़ स्थित मामा बालेश्वर दयाल राजकीय महाविद्यालय में चले जाएं। जिस इलाके में महिला शिक्षा औंधे मुंह गिरी हुई थी वहीं अब छात्राएं पढ़ाई के मामले में छात्रों से भी आगे हैं। कॉलेज में वर्तमान में कुल 1982 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। इनमें छात्राओं की संख्या 1115 है तो छात्र संख्या 867 है। इससे स्पष्ट है कि जनजाति अंचल व निवासरत जनजाति व अन्य वर्गों में महिला शिक्षा के प्रति जागरुकता आई है और लड़कियों को भी उच्च शिक्षा के अवसर प्राप्त हो रहे हैं। बदलती तस्वीर का एक और उजला पक्ष है छात्रसंघ चुनाव मे छात्राओं की भागीदारी और उसमें भी अध्यक्ष पद पर छात्रा का काबिज होना। गोविन्द गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय के क्षेत्राधिकार के तहत बांसवाड़ा, डंूगरपुर एवं प्रतापगढ़ में से सबसे कम कॉलेज प्रतापगढ़ जिले में हैं। यहां निजी महाविद्यालयों की कुल संख्या महज 8 ही है।

ये है बदलाव की वजह
सरकारी की आदिवासी इलाकों के उत्थान पर खास ध्यान
शिक्षा के प्रति बढ़ती जागरूकता
ढेरों सरकारी योजनाओं के तहत आर्थिक मदद, छात्रवृत्ति मिलना
आवासीय छात्रावासों की सुविधाएं विकसित होना
राजनीतिक दृष्टि से अहमियत पाना
आरक्षण के कारण आगे आने का मौका मिलना
नौकरियों में प्रतिनिधित्व बढऩे के साथ परिवारों मेंं शिक्षा का समावेश बढ़ा।

Varun Bhatt
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