Video : बांसवाड़ा की इस महिला ने ताउम्र खादी के साथ जीवन जीया और खादी के कफन में लिपट कर दुनिया से हुई विदा

By: deendayal sharma

Updated: 04 Apr 2019, 02:53 PM IST

Banswara, Banswara, Rajasthan, India

बांसवाड़ा. ताउम्र खादी की दूत बनकर जीवन जीया और खादी के कफन में लिपट कर ही दुनिया से विदाई ली। स्वतंत्रता सेनानी धूलजी भाई भावसार की पुत्री एवं रेत के चित्र बनाने की कला में महारथ हासिल प्रख्यात चित्रकार, खादी दूत प्रो. वीरबाला भावसार का बुधवार को निधन हो गया। उन्होंने बांसवाड़ा में स्थित पैतृक मकान में अन्तिम सांस ली। वे 78 वर्ष की थी। उनका अंतिम संस्कार बुधवार को किया गया। इस दौरान उनकी दो बहनों ने अर्थी को कांधा भी दिया। स्वतंत्रता सैनानी स्व. भावसार तथा विजया देवी भावसार की कुल पांच बेटियों में डॉ. वीरबाला दूसरे नम्बर की बेटी थी। बेटियों ने उम्रभर खादी पहनने व अपनाने का वचन अपने पिता को दिया था। उनकी बहन कृष्णा भावसार ने बताया कि वीरबाला बचपन से ही खादी को अपनाया। घर में साबरमती से लाया गया पेटी चरखा आज भी वजूद में है। पहनावे में खादी के अलावा अन्य वस्त्र वर्जित है। वहीं घर में भी पहनने, ओढऩे, कुर्सी, दीवान आदि पर भी खादी का ही इस्तेमाल किया।

यूं खादी को किया आत्मसात
स्वतंत्रता सेनानी भावसार आजादी के आंदोलन के दौरान साबरमती में महात्मा गांधी से मिले थे। उसी वक्त से उनके परिवार ने खादी को जीवन समर्पित कर दिया। धूलजी पहले कंधे पर खादी लेकर घूमे और बेची, फिर ठेलागाड़ी पर उसके बाद दुकान पर बैठकर खादी को लोगों तक पहुंचाया। उसके बाद से उनका परिवार खादी का हो कर रह गया है। प्रो. वीरबाला भावसार नेे प्राथमिक शिक्षा यहाँ प्राप्त करने के बाद अहमदाबाद से चित्रकला में डिप्लोमा तथा उज्जैन से स् नाकोतर करने के बाद राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से आदिवासी कला विषय में पीएच.डी. उपाधि प्राप्त की। उनकी राजकीय यात्रा की शुरूआत 1972 में महारानी कालेज जयपुर से हुई। जयपुर को अपनी कर्मभूमि बना दिया। यहीं से इनकी सृजन यात्रा भी आरम्भ हुई। प्रो. वीरबाला ने अखिल भारतीय स्तर पर कुल 31 तथा देशभर में 27 एकल प्रदर्शनी की। देश तथा प्रदेश स्तर पर कुल 37 कला मेलों, शिविरों में भाग लिया। इटली के केव म्यूजियम में उनके द्वारा बनाया गया रेत चित्र पिछले दो वर्षो से लगा हुआ है। 2018 में कोरिया में आयोजित प्रदर्शनी में उनका चित्र लगाया गया। कला व साहित्य में योगदान के उन्हें अनेकों सम्मान से भी नवाजा गया।

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