शिक्षक दिवस विशेष : शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच बना ऐसा संबंध, बिना बोले ही इशारों-इशारों में समझ जाते है 'मन की बात'

- sign language, teachers day in banswara

- इशारों में गूंथा गुरु-शिष्य का आत्मीय संबंध
- ये बच्चे गुरु की और स्वयं की इशारों की भाषा ही समझते हैं

By: Varun Bhatt

Published: 05 Sep 2019, 12:01 PM IST

Banswara, Banswara, Rajasthan, India

हेमंत पंड्या/बांसवाड़ा. गुरु-शिष्य के बीच ‘इशारों’ की भाषा का आत्मीय संबंध, गुरु जहां इशारों में ही अपनी बात कहता है तो बच्चे भी इशारों की भाषा में ही जवाब देते हैं तो समझते भी इसी भाषा को है। जी हां, ये कहानी उन बच्चों और उनके शिक्षकों की है जो मूक बधिर विद्यालय में पढ़ते हैं और पढ़ा रहे हैं। इस विद्यालय में पढऩे वाले तमाम बच्चे सामान्य बच्चों से अलग है, क्योंकि ये न तो सुन सकते हैं और न ही बोल सकते हैं। ऐसे में उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों की भाषा भी बच्चों की भाषा जैसी ही हो जाती है। जब किसी बच्चे को अपनी कोई बात कहनी होती है तो वह हाथों के इशारों से ही बात रखता है और उस बच्चे की बात को शिक्षक भी अच्छे से समझ लेता है।

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खेल- खेल में ही सिखाई जाती है इशारों की भाषा
शिक्षिका रंजना यादव ने बताया कि जब बच्चे का प्रवेश होता है तब भी और बाद में भी। वह बच्चा सामान्य नहीं होता है। ऐसे में उस बच्चे की पढ़ाई की शुरुआत खेल खेल से होती है और खेल - खेल में ही इशारे समझाए जाते हंैं। इसके बाद वह धीरे धीरे इशारों को समझने भी लगता है और इशारे करने भी लगता है। तकनीकी भाषा में इसे साइन लैंग्वेज कहते हैं, लेकिन इस भाषा को बोलना, बताना और समझाना बहुत ही कठिन होता है। अब तक 500 से ज्यादा बच्चों को ये भाषा सीखा चुकी यादव का कहना है कि दो मूक बधिर जब आपस में बात करते है तो ऐसा महसूस होता है कि कितनी समझदारी से एक दूसरे को कुछ कह रहे हैं।

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कई बार एक जैसे इशारे, लेकिन परिस्थिति से जोड़ते हैं
कई बार एक जैसे ही इशारे होते हैं। जब इन इशारों को बच्चों को समझाते हैं तो इसका अर्थ भी एक जैसा ही निकलता है। ऐसे में तत्कालीन परिस्थितियों के बारें में बताकर उन बच्चों को उस बात से जोडऩा होता है। शिक्षक जयप्रकाश यादव और विनय व्यास बताते हंै कि जितना समझना सरल होता है, उतना ही इशारों की भाषा को कहना मुश्किल होता है। यदि गलत इशारा हो गया तो उसका अर्थ भी बच्चा अलग ही समझेगा। वर्तमान में 96 बच्चे इस विद्यालय में अध्ययनरत है और वह आसानी से अपनी जिंदगी की बातें आपस में करते हैं। भले ही कोई और इनकी बातों को नहीं समझता हो, लेकिन ये शिक्षक आसानी से समझकर अंदाजा लगा लेते हैं कि बच्चा क्या कहना चाहता है।

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