राजस्थान रोडवेज की हो रही किरकिरी, निगम की बसें बीच रास्ते छोड़ रही साथ, ठेका संचालक आखिरी समय पर खड़े कर रहे हाथ

राजस्थान रोडवेज की हो रही किरकिरी, निगम की बसें बीच रास्ते छोड़ रही साथ, ठेका संचालक आखिरी समय पर खड़े कर रहे हाथ
राजस्थान रोडवेज की हो रही किरकिरी, निगम की बसें बीच रास्ते छोड़ रही साथ, ठेका संचालक आखिरी समय पर खड़े कर रहे हाथ

Varun Kumar Bhatt | Updated: 19 Sep 2019, 09:25:03 PM (IST) Banswara, Banswara, Rajasthan, India

- Rajasthan Roadways Bus Schedule

- ठेका व्यवस्था में भी ठेंगा, रोडवेज के थमते पहिये
- आखिरी समय पर हाथ खड़े करने से यात्री भी परेशान
- कमाई पर चोट, शिकायतों का भी लग रहा अंबार

बांसवाड़ा. जिले में रोडवेज का अपना ही ठेका बंदोबस्त उसकी किरकिरी करा रहा है। गाडिय़ां कम होने की मजबूरी में लगाई अनुबंधित बसों पर मोटी रकम खर्च करने के बावजूद संचालक की मनमानी से सेवाएं ठप हो ही रही हंै, आए दिन अचानक शिड्यूल रोकने से घाटे के साथ इंतजार करते यात्रियों की शिकायतों पर प्रबंधन की साख पर धब्बा लग रहा है। हालात यह है कि अब तक 80 से 84 शिड्यूल चलाने वाला बांसवाड़ा आगार प्रबंधन अब 66 पर आ गया। इनमें भी आठ शिड्यूल गड़बड़ाए हुए हैं। इससे अब तक रोज 32 हजार से ज्यादा किलोमीटर रोज दौडऩे वाली रोडवेज की बसों का दायरा 30 हजार किलोमीटर पर आकर अटक गया है। निगम अधिकारियों की मानें तो बसों की कमी के साथ स्टाफ भी दिनोंदिन घट रहा है। इसके चलते अनुबंध पर 20 बसें लगाने के साथ बस सारथी यानी एजेंटों पर निर्भरता बढ़ी है। ठेकेदार कभी ब्रेक डाउन, कभी चालक नहीं होने तो कभी और किसी कारण से अचानक अनुबंधित बसें खड़ी करवाकर हाथ खड़े कर देते हैं, जिससे पांच-सात रूट की गाडिय़ां आए दिन नहीं चल पा रही हैं।

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इस महीने अहमदाबाद जैसे बड़े रूट पर लगा झटका
अमूमन उपचार के लिए बांसवाड़ा से रोज बड़ी संख्या में यात्री अहमदाबाद जाते हैं। इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण होते हुए भी इस महीने इस रूट की अनुबंधित बसों के सुबह-शाम के दो शिड्यूल कई बार ठेकेदार की मनमानी के चलते रोक दिए गए। यही नहीं, अरथूना मार्ग पर पांच-सात दिन से बस संचालन ठप है। इसके अलावा डूंगरपुर की तीन और दाहोद की गाडिय़ां भी ठेकेदार ने नहीं चलाई।

रिटायर हो रहे कर्मचारी, नए के ठिकाने नहीं
निगम प्रबंधन की भीतर खाने भी हालत पतली है। 57 गाडिय़ां हैं, लेकिन ये भी सामान नहीं मिलने पर दूसरी बिगड़ी गाडिय़ों से स्पेयर पाट्र्स निकालकर जैसे-तैसे चलाई जा रही हैं। सभी शिड्यूल व्यवस्थित चलाने निगम को 135 चालक चाहिए, लेकिन यहां 103 ही हैं। परिचालक तो 134 के मुकाबले 95 ही होने से चालकों को परिचालक बनाकर भेजा जा रहा है। इसके अलावा वर्कशॉप में 77 स्वीकृत तकनीकी अधिकारियों-कर्मचारियों के पदों के मुकाबले यहां मात्र 21 लोग है, जबकि मंत्रालयिक कर्मचारी भी 45 पदों के विरुद्ध एक तिहाई से कम यानी 15 ही हैं। इस वर्ष में अब तक 15 कर्मचारी रिटायर हो चुके हैं, वहीं 9 अन्य दिसंबर तक घर लौटने तय हैं। इनकी एवज में नए आने के कोई आसार नहीं दिखते, जिससे आगार में मानव संसाधन का संकट और गहराना तय है।

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अनुबंधित बस खटारा तो बनाया मयखाना
यहां कबाड़ बनी अनुबंधित बसें मयखाना बनी हुई है। फटी सीटें, टूटे कांच और खराब इंजन के कारण आगार परिसर में खड़ी कर दी गई इन बसों का इस्तेमाल खाने-पीने में हो रहा है। भूल से कोई यात्री अपने गंतव्य की गाड़ी समझकर इनमें घुस जाए, तो जी-घबराने की शिकायत के साथ फौरन उल्टे पांव भागता है। इस स्थिति पर भी निगम प्रशासन मौन है। कारण साफ है कि ठेकेदार पर उसका कोई अंकुश नहीं है।

इनका कहना है..
- रोडवेज से समय पर भुगतान समय पर नहीं मिलने से 20 गाडिय़ों के रखरखाव और चालकों के वेतन का जुगाड़ करके जैसे-तैसे काम चला रहे हैं। जून का ढाई लाख रुपए भुगतान पिछले सप्ताह मिला। जुलाई का जयपुर मुख्यालय से अटका है।
विजयकुमार प्रबंधक ठेका फर्म

- भुगतान नहीं होने की बात गलत है। ठेकेदार फर्म के खाते में नियमित अंतराल में पैसा जयपुर से जा रहा है। दिक्कत अनुबंधित बसें खराब होने की है। हाल ही एमडी स्तर पर प्रदेश में 1150 बसें खरीदने के प्रस्ताव पर मंत्री ने घोषणा की। सरकार निर्णय करती है और 20 गाडिय़ां बांसवाड़ा को मिलती है, तो ठेकेदार पर निर्भरता नहीं रहेगी और रोडवेज का संचालन व्यवस्थित हो सकता है।
रविकुमार मेहरा मुख्य प्रबंधक बांसवाड़ा रोडवेज आगार

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