10 सालों से बच्चों को डरा रहा जिले का यह सरकारी विद्यालय, पढ़ाने के बजाय बंदरों को भगाती हैं यहां की टीचर

सरकारी विद्यालयों की बदहाल तस्वीर आप पहले भी देख चुके होंगे लेकिन जिले का एक प्राइमरी स्कूल ऐसा भी है जो बीते 10 सालों से यहां पढ़ने वाले बच्चों और टीचरों को डरा रहा है।

बाराबंकी. इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना...जी हां, यह प्रार्थना एक सरकारी स्कूल के बच्चों के लिए वाकई बेहद जरूरी है और इसके पीछे जो वजह हम आपको बताने वाले हैं वह सुनकर आप निश्चित ही दंग रह जाएंगे। क्योंकि वैसे तो तमाम सरकारी विद्यालयों की बदहाल तस्वीर आप पहले भी देख चुके होंगे लेकिन जिले का एक प्राइमरी स्कूल ऐसा भी है जो बीते 10 सालों से यहां पढ़ने वाले बच्चों और टीचरों को डरा रहा है। यकीन मानिए इस स्कूल की हालत देखने के बाद आप खुद भी यही कहेंगे कि इन बच्चों को वाकई बस प्रार्थना का ही भरोसा है, पेश है खास रिपोर्ट...


स्कूल की दरारोंभरी दीवारें, जर्जर छत और जहरीले जानवर इस स्कूल के बच्चों को डराते हैं। स्कूल में खिड़की-दरवाजे और बाउंड्री ने होने के चलते कभी भी झुंड के झुंड बंदर आकर हमला बोल देते हैं। आलम ये है कि स्कूल की टीचर बच्चों को पढ़ाने के बजाए बंदरों और दूसरे जानवरों को भगाने में ही लगी रहती हैं। बिना सीट और बेंच के बच्चों के लिए पढ़ाई करना तो दूर, यहां बैठना तक मुश्किल हो जाता है। स्कूल में शौचालय न होने के चलते छात्र और छात्राओं को बाहर जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। मामला बंकी ब्लॉक के उच्च प्राथमिक विद्यावय ढकौली से जुड़ा है। वैसे तो जिले में जर्जर विद्यालय भवनों की लंबी फेहरिस्त है। लेकिन इस स्कूल की यह हालत एक-दो साल से नहीं बल्कि बीते 10 सालों से ऐसी ही है। और तो और यहां के टीचरों ने अब तक कई बार विभाग के अधिकारियों को इस हालत के बारे में जानकारी दी, जिससे इस स्कूल में किसी अनहोनी से बचा जा सके। लेकिन फिलहाल अभी तक उसका कोई असर नहीं दिखा और अब भी बच्चे खतरे के साये में पढ़ने को मजबूर हैं। जिसके चलते कई अभिभावक इस स्कूल से अपने बच्चों का नाम कटवा चुके हैं।


वहीं इस विद्यालय की प्रधानाध्यापिका शशिबाला राठौर ने बताया कि इस बिल्डिंग को बने करीब 10 साल बीत चुके हैं। मेरी अभी कुछ दिन पहले ही यहां पोस्टिंग हुई है। यहा आने के बाद पचा चला कि इस विद्यालय की बिल्डिंग में प्लास्टर से लेकर खिड़की, दरवाजे और बाउंड्रीवाल जैसी कोई भी बुनियादी व्यवस्था नहीं है। यहां तक की स्कूल में बच्चों के बैठने के लिए बेंच तक का इंतजाम नहीं है। प्रधानाध्यापिका ने बताया कि स्कूल की इस हालत के चलते अभिभावक अपने बच्चों का नाम कटवाकर दूसरी जगह पढ़ाने को मजबूर हैं और हम लोग उन्हें मना भी नहीं कर पाते। शशिबाला राठौर ने बताया कि उन्होंने विभाग के अधिकारियों को भी अपनी इस समस्या की जानकारी दी है, लेकिन अभी तक कोई समाझान नहीं निकल चुका है।


स्कूल की सहायक अध्यापिका का कहना है कि हम लोग यहां बच्चों को सही से पढा नहीं पाते। बच्चों को जमीन पर बिठाकर पढ़ाने में भी काफी खतरा है, क्योंकि यहां अक्सर सांप समेत दूसरे विषैले जानवर बहुत निकलते हैं। इसके अलावा स्कूल में हमेशा झुंड के झुंड बंदर मौजूद रहते हैं, जो हम लोगों पर कई बार अटैक कर चुके हैं। ऐसे में दिनभर हम लोग बंदरों को ही भगाया करते हैं। बरिश में यहां पूरी बिल्डिंग से पानी टपकता है। स्कूल में शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है। यहां के बच्चों को बाहर जाना पड़ता है। जिसके चलते उन्हें शर्मिंदा होना पड़ता है।


इसके बाद जिले के बीएसए से जब हमने स्कूल की ऐसी हालत की वजह पूछी तो उनका कहना था कि स्कूल के बारे में जानकारी हमारे संज्ञान में आई थी तो मैं खुद वहां गया था। वहां पहुंचने पर पता चला कि वहां बगल में पीसीएफ का गोदाम है और जब उस स्कूल की निर्माण शुरू हुआ, तो उन लोगों ने कोर्ट से स्टे ले लिया। स्टे लेने के बाद उस जगह से हटकर दोबारा स्कूल का निर्माण शुरू कराया गया और बिल्डिंग खड़ी हो गई। लेकिन दोबारा पीसीएफ की तरफ से स्टे लेने के चलते बिल्डिंग का निर्माण अधूरा ही छोड़ दिया गया। कोर्ट ने आदेश दिया की स्कूल जिस स्थिति में है, उसका काम वहीं रोक दिया जाए। कोर्ट के निर्देश के चलते अभी तक स्कूल में आगे कोई काम नहीं हो पाया है। बीएसए ने बताया कि वह कोर्ट में इस मामले को जल्द से जल्द निस्तारित कराने की कोशिश करेंगे। बीएसए के मुताबिक तत्कालीन अधिकारी को इस मामले को सुलझाकर विद्यालय का निर्माण कहीं और कराना चाहिए था।

 

नितिन श्रीवास्तव
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