scriptDid not save the water source, the result... the desolation engulfed, | जलस्रोत को नहीं सहेजा, नतीजा... छा गई वीरानी, कब्जों से सिकुड़ा | Patrika News

जलस्रोत को नहीं सहेजा, नतीजा... छा गई वीरानी, कब्जों से सिकुड़ा

मांगरोल. नगरपालिका ने सीसवाली रोड़ पर चांदा हाला तालाब के बारे में आज तक नहीं सोचा। पहले यह गांव के बाहर था, अब आबादी के विस्तार के साथ नगरपालिका क्षेत्र में आ गया, हालांकि अब भी नगरपालिका की चहुंदिशाओं में सीमा कहां तक है, यह नगरपालिका को भी पता नहीं है।

बारां

Published: May 26, 2022 09:56:25 pm

मांगरोल. नगरपालिका ने सीसवाली रोड़ पर चांदा हाला तालाब के बारे में आज तक नहीं सोचा। पहले यह गांव के बाहर था, अब आबादी के विस्तार के साथ नगरपालिका क्षेत्र में आ गया, हालांकि अब भी नगरपालिका की चहुंदिशाओं में सीमा कहां तक है, यह नगरपालिका को भी पता नहीं है। राजस्व के खाते में आने वाली खेती की जमीनें भी अब आबादी क्षेत्र में आने के साथ ही नगरपालिका इनसे मोटी कमाई करने लगी है। इस बीच प्राचीन सरोवर के महत्व को नकारा जा रहा है। जबकि सरकार जल बचाओ आंदोलन को जन-जन से जोडऩे की गुहार करती नजर आती है। जो यहां नारा लेखन में ही दिखाई देती है। यहां के दो प्रमुख प्राचीन तालाबों का अस्त्तिव खतरे में है। अब वहां न तो प्रवासी पक्षियों का कलरव रहा, न ही कृषि भूमि की ङ्क्षसचाई होती है। अतिक्रमण का शिकार हो गए तालाब को प्रशासन ने भी नहीं बख्शा। करीब 22 बरस पहले अस्पताल के लिए तालाब को ही चिन्हित कर दिया। हालांकि बाद में विवादित होने के कारण अस्पताल यहां नहीं बन सका था। एक ओर सरकार जल स्वालंबन के नाम पर लाखों रुपए खर्च कर रही है। गांवों में तालाब बनवाए जा रहे हैं। यहां यह हाल है कि इन तालाबों का रकबा धीरे धीरे कम होता जा रहा है। नगर के पश्चिम में स्थित चांदा हाला तालाब की 67 बीघा भूमि राजस्व खाते में दर्ज हैं। चांदा हाला तालाब मांगरोल ही नहीं वरन आसपास के एक दर्जन गांवों के बाङ्क्षशदों के लिए मुख्य जलस्त्रोत था। मवेशी यहां पानी पीते थे। तालाब से 400 बीघा भूमि तो ङ्क्षसचित होती ही थी। भूमिगत पानी को संग्रह करने का यह प्रमुख स्रोत भी था।
पहले खेती होती थी, खूब कमल खिलते थे
चांदा हाला तालाब में पहले ङ्क्षसघाड़े की खेती होती थी। कमल खिले रहते थे। धीरे-धीरे अतिक्रमण से तालाब का रकबा सिकुड़ते-सिकुडते मामूली सा रह गया है। चांदा तालाब की भूमि पर अब काश्त होती है चांदा हाला तालाब की खसरा नम्बर1013 की क्रमश: 3.49 व5.55 हेक्टेयर भूमि राजस्व रेकार्ड में दर्ज हैं, लेकिन न तहसील के तौर पर और न ही नगरपालिका ने आज तक इन तालाबों को बरकरार रखने के जतन किए। हालत यह है कि तालाब में मामूली सा पानी रह गया। पानी में कमल खिले रहने से यहां कुछेक पक्षी ही अब पानी में किलोल करते दिखाई देते है। आसपास गंदगी व लोगों के शौच जाने से पास की बस्तियों के बाङ्क्षशदे भी परेशान हैं। तालाब के पास से जलोदातेजाजी गांव का रास्ता भी अब अतिक्रमण का शिकार हो गया जलोदा के लोगों को सीसावली रोड का लंबा चक्कर काटकर गांव जाना आना पड़ता है। भूमिगत जलस्तर के घटते दौर में इन तालाबों को पुन: अस्त्तिव में लाया जाए तो ये लोगों के लिए जीवनदायी साबित हो सकते हैं। लेकिन न नगरपालिका और न ही प्रशासन इस ओर ध्यान दे रहा है। पश्चिम दिशा में होने से इसे चांद के नाम से चांदा हाला तालाब के नाम से पुकारा जाता है। लेकिन चांद सी शीतलता के बजाय यहां अब मामूली सा जल और उसमें खाना ढूंढते पखेरु ही शेष बचे हैं।
नष्ट से हो गए तालाब
तालाब नष्ट हुए तो ङ्क्षसचाई बंद हुई, प्रवासी पखेरुओं ने अपना रुख कहीं और कर लिया। पहले बगुले, बत्तख और अन्य प्रजातियों के पक्षियों का यहां जमावड़ा रहता था।

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