जिले में डेढ़ दशक में खत्म हो गए दस पैंथर

एक ओर मुकन्दरा हिल्स नेशनल पार्क में बाघों को बसाने की योजना आगे बढ़ रही है, दूसरी ओर हाड़ौती अंचल मे

By: मुकेश शर्मा

Published: 16 Apr 2016, 11:45 PM IST

बारां।एक ओर मुकन्दरा हिल्स नेशनल पार्क में बाघों को बसाने की योजना आगे बढ़ रही है, दूसरी ओर हाड़ौती अंचल में पूर्व से मौजूद वन्यजीवों के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। वन क्षेत्र के मामले में प्रदेश में तीसरे स्थान पर आने वाले बारां जिले में डेढ़ दशक में पैंथर दस गुना घट गए हैं। पूर्व में शाहाबाद, शेरगढ़ रेंज क्षेत्र में कई पैंथर थे लेकिन अब शाहाबाद में एकमात्र पैंथर की मौजूदगी प्रमाणित है वहीं एक अभी हरनावदाशाहजी में सामने आया है।

पिछले दिनों बारां जिले से सटे सुल्तानपुर क्षेत्र में बाघिन की संदिग्धावस्था में मौत हो गई, उसके बाद रावतभाटा के समीप पैंथर का शावक मृत मिला, अब बारां जिले के हरनावदाशाहजी क्षेत्र में अचानक पैंथर ने हमला बोल दिया लेकिन वन विभाग को इससे पहले इसकी सुगबुगाहट तक नहीं मिली। कुछ वर्षों पहले शाहाबाद में ही एक पैंथर की मौत भी हो चुकी है। वन प्रबंधन में उलझा वन विभाग वन्यजीव प्रबंधन में पिछड़ा साबित हो रहा है।

शाहाबाद में पैंथर की गतिविधि से अनजान

शाहाबाद के जंगलों में कुछ वर्षों पहले पैंथर की मौजूदगी सामने आने के बाद वन विभाग की ओर से उसकी गतिविधि पर नजर रखने के लिए ट्रेप कैमरे समेत अन्य उपकरणों की ऊपर मांग भेजी गई थी, लेकिन ये उपकरण विभाग को नहीं मिले। ऐेसे में उक्त पैंथर की गतिविधि पर वन विभाग नजर नहीं रख पा रहा है। गाहे-बगाहे पगमार्क ही दिख रहे हैं।

गोडावण भी लुप्त हो गया

वर्ष 1980 के दशक तक जिले के सोरसन क्षेत्र में एक-डेढ़ दर्जन गोडावण थे। यहां के गोडावण से जिले की खासी पहचान थी। इसके बाद धीरे-धीरे इनकी संख्या घटने लगी और ये लुप्त होने लगे। वर्ष 2000-2001 की अवधि तक समूचे जिले में महज एक गोडावण की मौजूदगी प्रमाणित हुई। इसके बाद तो एकमात्र गोडावण भी लुप्त हो गया। पुन: गोडावण बसाने के प्रयास भी सफल नहीं हो पाए।

वन्यजीवों पर आए दिन कहर

जैव विविधता से परिपूर्ण जिले के शाहाबाद के जंगलों में कई वन्यजीवों का बसेरा है, लेकिन सुरक्षा के माकूल बंदोबस्त नहीं। पिछले दिनों ही इस क्षेत्र में अलग-अलग जगह दो जरख की मौत हो गई तो कुछ वर्षों पहले शाहाबाद में रफ्तार ने एक पैंथर की जान ले ली। पिछले साल मार्च माह में कोयला क्षेत्र में जहरीला दाना खाने से एक दिन आधा दर्जन व उसके अगले दिन फिर चार मोरों की मृत्यु हुई थी वहीं बारां के समीप अभी गत 25 मार्च को कृष्णमृग का शिकार करने के मामले में दो जनों को पकड़ा गया था। वन विभाग ने मौके पर पहुंच दोनों को कृष्ण मृग को काटते धरा था। वन विभाग के ही विश्वस्त सूत्रों के अनुसार कुछ अरसे पहले केलवाड़ा के समीप दुर्लभ प्रजाति की एक केट  भी मृत पड़ी मिली थी।


ऐसे घटती गई तादाद  
वर्ष 2001 की वन्यजीव गणना में बारां जिले में 11 पैंथर (बघेरे) सामने आए थे। 2002 में यह संख्या 10 रह गई। 2003 में तो केवल दो ही पैंथर सामने आए।  2004 में बढ़कर संख्या 5 हो गई। 2007 में केवल एक पैंथर दिखा। 2011 की गणना के बाद शाहाबाद में एक पैंथसर के पगमार्क दिखे तो 2012 में दो पैंथर सामने आए। पिछले कुछ वर्षों से जारी गणना में केवल एक पैंथर सामने आ रहा है। वन विभाग के अधिकारी भी इस बारे में नहीं कह पा रहे कि पैंथर कहां गए। पूछने पर एक अधिकारी ने इतना ही कहा कि, पता कराएंगे। इनके अलावा सियार, भालू जैसे वन्यजीव भी घटे हैं। जरख भी डेढ़ दशक में 333 से घटकर 40 रह गए।

 पैंथरों का पता कराएंगे। उच्चाधिकारियों से ट्रेप कैमरों की मांग की जाएगी। शाहाबाद व सोरसन को कन्जरवेशन रिजर्व बनाने के प्रस्ताव भेजे हुए हैं।
जोधराज सिंह हाड़ा,
सहायक वनसंरक्षक, बारां
मुकेश शर्मा Reporting
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