अगर चाहिए कान्हा जैसी सन्तान तो जन्माष्टमी के दिन करें ये उपाय

अगर चाहिए कान्हा जैसी सन्तान तो जन्माष्टमी के दिन करें ये उपाय

suchita mishra | Publish: Sep, 01 2018 05:15:40 PM (IST) Agra, Uttar Pradesh, India

नि:संतान लोगों के लिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का दिन बेहद उत्तम होता है। करें ये उपाय।

बरेली। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की देशभर में धूम है। मन्दिरों में जन्माष्टमी मनाने की सभी तैयारियां पूरी हो चुकी है। लोग भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में डूबे हुए हैं। अब हर किसी को बस इंतजार है तो कान्हा के जन्म का। जन्माष्टमी पर भगवान श्री कृष्ण की पूजा का विशेष फल मिलता है। यही कारण है कि जन्माष्टमी के मौके पर लाखों की तादाद में भक्त मथुरा पहुंचते हैं। बाला जी ज्योतिष संस्थान के ज्योतिषाचार्य पण्डित राजीव शर्मा के अनुसार संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का ये दिन सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अतः इस दिन सिद्ध योग में भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप (लड्डू गोपाल जी) की पूजा अनुष्ठान के साथ इस मंत्र का जाप करें।

देवकी सुत गोविंद वासुदेव जगत्पते।
देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरण गतः।।

ये करें उपाय

1. संतानहीन जातकों को रात्रिकाल में भगवान श्रीकृष्ण के मन्दिर में जाकर तांबे से बनी एक बांसुरी और एक मोर पंख भगवान के श्री चरणों में अर्पित कर गुप्तता रखते हुए संतान सुख की प्रार्थना करें।

2. अष्टमी तिथि को अपने पूजा स्थल में भगवान श्री कृष्ण की उस तस्वीर को लगाएं जिसमें श्री कृष्ण राधा जी के साथ बांसुरी बजा रहे हैं और पीछे एक गाय है।

3. सात दिन तक श्री कृष्ण को गोपी चंदन से तिलक करें। शुद्ध घी का दीपक, चंदन की अगरबत्ती, धूप बत्ती के साथ माखन मिश्री का भोग अर्पित कर आठवें दिन एक कन्या को वस्त्र का जोड़ा आदि दान कर सुख समृद्धि की प्रार्थना करें।

4. भगवान श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त करने के लिए छोटी कन्याओं को समय समय पर माखन मिश्री का प्रसाद बांटें।

5. इस रात्रि संतान सुख प्राप्ति के दृष्टिकोण से अष्टमी तिथि की रात्रि हरिवंश पुराण के पाठ के साथ संतान गोपाल स्तोत्र का पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है। साथ ही गर्भ गौरी रूद्राक्ष धारण करना भी श्रेष्ठ माना गया है।

कैसे करें पूजा
जन्माष्टमी के दिन प्रातः स्नानादि के उपरांत श्रीकृष्ण भगवान के लिए व्रत करने व भक्ति करने का संकल्प लेना चाहिए। तदोपरांत चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर कलश पर आम के पत्ते या नारियल स्थापित करें। स्वास्तिक का चिन्ह भी बनायें। पूर्व या उत्तर की ओर और मुंह करके बैठें, एक थाली में कुमकुम, चंदन, अक्षत, पुष्प, तुलसी, दल, मौली, कलावा रख लें। खोये का प्रसाद, ऋतु फल, माखन मिश्री ले लें और चौकी के दाहिनी ओर घी का दीपक प्रज्जवलित करें। इसके पश्चात् वासुदेव-देवकी एवं नन्द-यशोदा की पूजा अर्चना करें। इसके पश्चात् दिन मे व्रत रखने के उपरान्त रात्रि 8:00 बजे पुनः पूजा आरम्भ करे और एक खीरे को काटकर उसमें श्रीकृष्ण का विग्रह रूप स्थापित करें। इसके बाद रात्रि 10:00 बजे विग्रह अर्थात लड्डू गोपाल को खीरे से निकाल कर पंचामृत से उसका अभिषेक करें। पंचामृत में विद्यमान दूध से वंशवृद्धि, दही से स्वास्थ्य, घी से समृद्धि, शहद से मधुरता, बूरा से परोपकार की भावना एवं गंगा जल से भक्ति की भावना प्राप्त होती है। श्रीकृष्ण को पंचामृत का अभिषेक शंख से करने से कई गुणा फल प्राप्त होता है। इसके बाद तीसरे चरण की पूजा रात्रि 12:00 बजे आरम्भ करें क्योंकि श्रीकृष्ण जी का इस धरती पर प्राकट्य रात्रि 12:00 बजे हुआ था। इसके बाद इस समय भगवान श्रीकृष्ण का निराजन 11 अथवा 21 बत्तियों के दीपक से करें।

 

 

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