इंसान ने महोब्बत दी तो दिल दे बैठे पक्षी

बेमिसाल- तालाब खुदवाया ताकि कुरजां न रहे प्यासी
-10 हजार रुपए प्रतिदिन दाना

-10 लाख से खुदवाया तालाब

-200 से अधिक लगाए देसी पौधे

- 20 लाख के करीब हर साल होते है खर्च

By: Ratan Singh Dave

Published: 28 Dec 2020, 02:05 AM IST


रतन दवे
बाड़मेर पत्रिका.
मालाणी और रेगिस्तान लोकगीतों में इसे सदियों से गा रहा है केसरिया,बालम आवोनी पधारो म्हारे देस..। आर्थिक अभावों और अकाल के संकट में भी इस धरा ने मेहमाननवाजी को परदेसी पांवणों पर न्यौछावर किया है कि वे यहां की अपणायत को भूलते नहीं है। इंसान क्यों महोब्बत दें तो पशु-पक्षी भी अपना दिल दे बैठते है। मालाणी के जसोल-तिलवाड़ा गांव में साइबेरियन पक्षी कुरजां की आवभगत के लिए तालाब खुदवाना, दाने का प्रबंध मिसाल बन रहा है। सात समंदर पार आने वाले इस पक्षी पर हर साल पंद्रह से बीस लाख रुपए खर्च हो रहे है।
पांच क्विंटल प्रतिदिन दाना
जसोल में आने वाली कुरजां को प्रतिदिन पांच क्विंटल के करीब दाना देने का प्रबंध है जो सितंबर से मार्च माह तक अनवरत जारी रहता है। इसके बाद भी कुरजां न लौटे तो जारी रखा जाता है। इस पर करीब दस हजार रुपए प्रतिदिन का खर्च आ जाता है।
तालाब खुदवा दिया पानी को
कुरजां के प्रवास के बाद इनके पानी की समस्या बढऩे लगी तो करीब 10 लाख रुपए की लागत से रामसरोवर तालाब खुदवा दिया गया। श्री जसोल माता राणी भटियाणी ट्रस्ट और इंटेक चेप्टर के आर्थिक सहयोग से खुदे इस तालाब पर अब कुरजां दाना चुगने के बाद प्यास बुझाती है।
जाळ के पेड़ की छांव
कुरजां को दाना-पानी मिलने के बाद उसकी तीसरी जरूरत है छांव। इसके लिए जाळ के वृक्ष बेहद पसंद है। इस इलाके में पांच सौ से अधिक जाळ और देसी पौधे लगाकर पनापाया गया जो अब कुरजां के झुण्ड के लिए रात्रि आश्रय देते है।
यही प्यार खींच लाता है
एशिया, रसिया, उज्बेकिस्तान, मंगोलिया, किरगिस्तान, तजाकिस्तान से कुरजां का यह झुण्ड रवाना होता है। साइबेरियन पक्षी करीब 8000 फीट का रास्ता तय करता है। हिमालय की 10 हजार किमी ऊंची चोटियों को लांघता है। मध्य एशिया में प्रजनन के बाद यहां तक पहुंचता है। रेगिस्तान के इस इलाके के प्यार ही है कि यहां आने के बाद सितंबर से मार्च तक इन पक्षियों का कहीं और जी नहीं लगता...। मानो ये यहां की होकर रह गई है।
मेह मूहंगो मेहमान..
यह तो कुरजां का स्नेह है कि उसने इस इलाके को चुना। इतनी दूर से आए इन महंगे मेहमानों के लिए हमने दाना-पानी और आश्रय का ही इंतजाम किया है। यह तो हमारे मारवाड़ की रीत है। मेह सूं मूहंगो मेहमान..यानि मेह इस रेगिस्तान में बहुत अनमोल है लेकिन मेहमान उससे भी अधिक।- रावल किशनसिंह जसोल, अध्यक्ष इंटैक चेप्टर एवं श्री माता राणी भटियाणी ट्रस्ट

Ratan Singh Dave
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