पत्रिका स्टिंग.........बच्चों के पोषाहार में बड़ों का डाका, मिलीभगत के खेल में जानकर भी अनजान बने अधिकारी

Ratan Singh Dave

Publish: Dec, 08 2017 01:00:09 (IST)

Barmer, Rajasthan, India
पत्रिका स्टिंग.........बच्चों के पोषाहार में बड़ों का डाका, मिलीभगत के खेल में जानकर भी अनजान बने अधिकारी

- आंगनबाड़ी केन्द्रों के हालात

- समूहों की आड़ में कार्यकर्ताओं के परिजन कर रहे पोषाहार का परिवहन

- मिलीभगत के खेल में जानकर भी अनजान बने अधिकारी

बाड़मेर। देखन में छोटे लगे...घाव करे गंभीर...। यह दोहा आंगनबाड़ी केन्द्रों के पोषाहार में सही बैठ रहा है। स्वयं सहायता समूहों की आड़ में कई आंगनबाड़ी केन्द्रों में पोषाहार परोसने के नाम पर जिले में प्रतिमाह करोड़ों की धांधली हो रही है। यहां मिलीभगत का खेल इतना पक्का है कि सब कुछ जानते हुए भी ऊपर से नीचे तक के अधिकारी अनजान बने हैं। नाम स्वयं सहायता समूह का है, कार्य आंगनबाड़ी केन्द्र की कार्यकर्ता, सहायिका व उनके परिजन कर रहे हैं। जबकि विकेन्द्रीकृत व्यवस्था के बाद परियोजना स्तर पर न तो पोषाहार पकाया जाता है और ना ही उसका परिवहन करने की अनुमति है। पत्रिका टीम ने गुरुवार को बाड़मेर शहर के कई आंगनबाड़ी केन्द्रों की टोह ली तो मिलीभगत का पूरा खेल कैमरे में कैद हुआ। कई केन्द्रों पर टीम को सच्चाई से दूर रखा गया तो कुछ जगह दबी जुबां फर्जीवाड़े का पूरा कच्चा-चि_ा खोल दिया गया।

प्रतिमाह साढ़े तीन करोड़ का खर्चा

बच्चों, किशोरी बालिकाओं, गर्भवती महिलाओं के पोषाहार पर प्रतिमाह जिले में 3 करोड़ 54 लाख 80 हजार 820 रुपए का बजट ठिकाने लग रहा है। इसका प्रतिमाह का गणित यह है :-
तीन वर्ष तक के बच्चों पर खर्चा- 1,35,80,190

तीन से छह वर्ष के बच्चे- 1,32,34,500
गर्भवती व किशोरी बालिकाएं- 86,66,130

कुल खर्चा- 3,54,80,820


नाश्ते का नाम, देते हैं गुड़-चना
आंगनबाड़ी केन्द्रों पर प्रतिदिन तीन से छह वर्ष तक के बच्चों को नाश्ता देने का प्रावधान है। इन्हें नाश्ते के नाम पर चने व गुड़ दिया जाता है। कई जगह तो इससे उकताए बच्चे घर से खाना लेकर आते हैं।


नियमों को टांग कर यूं करते हैं मिलीभगत

नियम- विकेन्द्रीकृत व्यवस्था रहेगी। स्वयं सहायता समूह ही गरम खाने, नाश्ते व प्रति सप्ताह आहार के पैकेट की व्यवस्था करेंगे। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता स्वयं व उनके परिजन इसमें शामिल नहीं होंगे। इसका खर्चा समूह के खाते में जाएगा।
खेल- नाम समूह का रहता है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता खुद ही नाश्ता पकाती है या फिर घर व अन्य परिजनों से लेकर आती है। राशि तो समूह के खाते में आती है लेकिन फिर उसे निकालकर बंदरबांट चलती है।

जिम्मेदार- यह खेल रोकने की जिम्मेदार विभाग के उपनिदेशक, परियोजना अधिकारी व सुपरवाइजर की है, लेकिन वे मौन हैं।


यह भी गड़बड़ी
कागजों के अनुसार जिले में प्रतिदिन 174119 बच्चे, 48578 गर्भवती महिलाएं व 3191 किशोरी बालिकाएं लाभान्वित होती है। इस आंकड़े के अनुसार ही कार्यालय व्यय, भ्रमण व प्रशिक्षण की राशि आती है, लेकिन वास्तविकता में लाभान्वित नगण्य ही रहते हैं। फिर सवाल कि राशि जाती कहां है?

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