मॉडर्न हो गई चॉक, कुम्हार के घर फिर भी अंधेरा

मॉडर्न हो गई चॉक, कुम्हार के घर फिर भी अंधेरा

Om Prakash Mali | Publish: Oct, 13 2018 06:03:23 PM (IST) Barmer, Rajasthan, India

दिवाली पर मिट्टी का दीपक हर किसी के घर रोशनी करता है और सारे जहां जिससे जगमग हो जाता है। उस दीपक को बनाने में पहले कुम्हार को भी पसीना आता था। अब आधुनिकता के चलते दीपक बनाने में कुम्हार ने भी बदलाव किया है। पहले कुम्हार को चाक हाथों से चलानी पड़ती थी, लेकिन अब इसे इलेक्ट्रिक मशीन से चलाना शुरू कर दिया है। इससे कम समय में अधिक दीपक बनने लगे हैं। लेकिन मेहनत के बदले मजदूरी कम होने से परंपरागत रूप से मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हार का घर में दिवाली पर भी अंधेरे का साया रहता है।

मॉडर्न हो गई चॉक, कुम्हार के घर फिर भी अंधेरा

-अब मिट्टी के दीपक भी बनते है इलेक्ट्रोनिक चाक पर
-कम समय में तैयार होते है मिट्टी के दीपक

-मेहनत के मुकाबले नहीं मिलती मजदूरी
बाड़मेर. दिवाली पर मिट्टी का दीपक हर किसी के घर रोशनी करता है और सारे जहां जिससे जगमग हो जाता है। उस दीपक को बनाने में पहले कुम्हार को भी पसीना आता था। अब आधुनिकता के चलते दीपक बनाने में कुम्हार ने भी बदलाव किया है। पहले कुम्हार को चाक हाथों से चलानी पड़ती थी, लेकिन अब इसे इलेक्ट्रिक मशीन से चलाना शुरू कर दिया है। इससे कम समय में अधिक दीपक बनने लगे हैं। लेकिन मेहनत के बदले मजदूरी कम होने से परंपरागत रूप से मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हार का घर में दिवाली पर भी अंधेरे का साया रहता है।

४०० सौ की जगह बनते है १२०० सौ दीपक
पहले कुम्हार को चाक हाथ से चलानी पड़ती थी। जिससे वह दिन में ४०० से ५०० दीपक ही बना बना पाता था। अब इनेक्टिक मशीन से चॉक चलाने से दिन में १२०० से १५०० सौ दीपक बनते हैं। चाक को बार-बार लकड़ी के डंडे से चलाने की जरूश्रत अब मशीन ने खत्म कर दी है।

उत्पादन के साथ बढ़ा बिजली बिल
चाक को इलेक्ट्रोनिक मोटर से चलाने के कारण कुम्हार को शारीरिक आराम के साथ उत्पादन भी बढ़ा है। वहीं समय की बचत भी होने लगी है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि इससे बिजली का बिल बढ़ गया है। पहले बिल एक हजारा या बारह सौ का आता था। वहीं अब तीन से चार हजार रुपए आ रहा है। जो कि दीपक की आमदनी से भरना मुश्किल है।

यों बनते हैं दीपक
बाड़मेर के कुम्हार बागुण्डी गांव से तालाब की गीली मिट्टी लाते है। इसे पहले सुखाया जाता है फिर मिट्टी की बारीक कुटाई होती है। पुन: मिट्टी को पानी से गीला कर आटे की तरह लचीला बनाने के बाद उससे चाक की मदद से दीपक और बर्तन बनाते हैं। इसके बाद भट्टी में पकाने के बाद बाजार में बेचा जाता है।

दीपक बनाने का सिमट रहा काम
मिट्टी के बर्तन बनाने का कार्य पहले ५० से अधिक परिवार करते थे लेकिन अब केवल पांच से सात परिवार ही यह काम करते हैं। क्योंकि इस कार्य में पूरी मजदूरी नहीं मिलती है। दीपक की बात करें तो थोक के भाव मात्र ५० पैसे में बिकता है। गली-गली में बेचने पर प्रति दीपक एक रुपया मिलता है। मजदूरी नहीं मिलने के कारण अब कुम्हार का भी इस कार्य से मन उठता हुआ दिख रहा है। वह अपनी अगली पीढ़ी को इस काम की बजाय अन्य कार्य के लिए भेजा जाता है।

मजदूरी नहीं मिलती
इस कार्य में बुजुर्ग ही थोड़ी रूचि ले रहे हैं। युवाओं की इसमें रूचि भी नहीं हैं। पुश्तैनी कार्य करने से रोजगार तो मिलता है लेकिन घर चलाना मुश्किल है। इससे अच्छा कमठे पर जाए तो चार से पांच सौ तक मजदूरी मिल जाती है।

आईदान प्रजापत, युवा
अन्य कार्य में अच्छी मजदूरी-

कम्प्यूटर का काम सीख गया हूं फोटोग्राफी भी करता हूं। उसमें अच्छी मजदूरी मिल जाती है। यह काम तो सीजन का है। जो कि मात्र साल में दो महीने ही होता है। जिसमें भी मजदूरी पूरी नहीं मिलती है।
गंगाराम प्रजापत, युवा

चाक चलाना मुश्किल हो गया
इस कार्य में पूरे दिन मेहनत करनी पड़ती है जो कि आज के युवा नहीं कर पाते हैं। हम भी अब चाक नहीं चला पाते। इसलिए मोटर लगाते हैं। काम को संबल नहीं मिलन से पुश्तैनी काम छोड़ रहे हैं।

नखताराम, बुजुर्ग
चाक से अब घर चलाना मुश्किल

अब हमारे परिवार अन्य कार्य करने पसंद करते हैं। मिट्टी के कार्य में मेहनत के मुकाबले मजदूरी काफी कम है। बिजली मोटर से बिल भी इतना आता है कि भरना मुश्किल हो जाता है। यह काम साल में मात्र दो महीने ही कर सकते हैं। बाकी पूरे साल फ्री रहते हैं। दो महीने की कमाई से १२ महीने घर नहीं चल सकते हैं।
-मुकनाराम

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