न बिजली न नेटवर्क रेडियो सुन रहे है , रामायण तो हमें भी देखनी है पर कैेसे?

- बॉर्डर क्षेत्र होने से बीएसएफ, सेना के जवानों का भी घर से संपर्क नहीं
- इंटरनेट व डिजिटल जमाने मे टीवी, मोबाइल आज भी एक सपना

By: Dilip dave

Published: 08 Apr 2020, 12:22 PM IST



भीख भारती गोस्वामी
पश्चिमी सीमा के गडरारोड (बाड़मेर) .
देश दुनियां जहां कोरोना के दौर में एक दूसरे से कटी है लेकिन इंटनरेट और टी.वी. ने पूरी दुनियां को जोड़ रखा है। पल-पल की खबरें उनके पास पहुंच रही है लेकिन पश्चिमी सीमा के दर्जनों गांव ऐसे है जहां बिजली है न मोबाइल नेटवर्क। कोरोना के लॉक डाऊन में वाहनों का आना-जान बंद। अब केवल इनके पास रेडियो एकमात्र सहारा है जिससे समाचार सुन रहे है। हालांकि ये लोग इस बात से आश्वस्त है कि उनके गांव से न तो कोई बाहर गया और न ही ज्यादा लोग आए है,इसलिए सबसे ज्यादा सुरक्षित वे ही है।
पश्चिमी सीमा के बाड़मेर जैसलमेर के ७३ गांवों में राष्ट्रीय मरू उद्यान क्षेत्र होने से इन गांवों में मोबाइल टॉवर, बिजली के खंभे और अन्य सुविधाएं विकसित नहंीं हो पा रही है। दूरस्थ ढाणियों में तो हालात खराब है। बिजली के लिए वैकल्पिक इंतजाम सौर ऊर्जा किया है लेकिन वो भी असफल साबित हो रहा है। आम दिनों में आवागमन के साधन होन ेसे ग्रामीण निकटवर्ती अन्य गांव में पहुंचकर मोबाइल चार्ज कर आते है। इसके अलावा भी अन्य सुविधाएं मिल रही है लेकिन पिछले दिनों से चल रहे लॉक डाऊन ने इनको देश-दुनियां से अलग-थलग कर दिया है। मोबाइल झुनझुने बन गए है। नेटवर्क नहीं मिल रहा और बिजली नहीं होने से चार्ज भी नहीं हो रहे है। ग्रामीण शिकायत करते है कि रामायण महाभारत तो हमें भी देखनी है पर रेडियो पर कैसे देखें?
यहां नहीं है मोबाइल नेटवर्क सुविधा
सुंदरा, पांचला, रोहिड़ी, रोहिड़ाला, रतरेड़ी कला, मठारानी मेघवाल, डाभड़, गूजरी, ढंगारी, बोई, मोडरडी, शहदाद का पार खुदज़्, चंदनिया, रिखियानी, मोती की बेरी, द्राभा, ख़बड़ाला, हापिया, रूपाकर, मिरसानी ढाणी ,डबली गाव, भीलों की बस्ती,बिजावल, समन्द का पार, गड़स, हापिया,पनिया, सिरगुवाला, दुठोड, बाड़मेरों का पार, मायाणी, मठाराणी, खंगारानी, बुलाणी, डेडोकरी, रहलिया, ख़बड़ाला, नोहडिय़ाला,बचिया, पते का पार, कलसिंह की ढाणी, पूंजराज का पार सहित कई गांवो में आज भी बिजली व नेटवर्क का अभाव है।
रेडियो बना सहारा
कोरोना के दौर में देश दुनियां की खबर से बाखबर रहने के लिए रेडियो नहीं हों तो कोई खबर नहीं लगती। पचास किलोमीटर दूर क्या हो रहा है, यह भी नहीं पता। टीवी पर इन दिनों रामायण महाभारत चल रही है। हमें भी देखनी है पर यह सपना ही है।- पन्नेसिंह सोढ़ा, सिरगुवाला

७४ साल बाद भी यह हाल
आजादी के ७४ वर्षों बाद भी मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे हैं! १८ वीं सदी में जी रहे हम लोगों के लिए बिजली, नेटवर्क का अभाव बाकी दुनियां से अलग कर रहा है।
- करीमदाद, रिखियानी
बिजली व मोबाइल दे दो
आम दिनोंं में हमारी मांग कोई नहीं सुन पाया। आज फिर कहते है कि हम तो देश दुनियां से कट गए है। इस हालात में हमारा मददगार कौन होगा? मोबाइल नेटवर्क हों तो किसी को संदेश भी भेजें, अब तो कुछ भी नहंीं है। रेडियो ही सहारा है।- खुदाबख्श खलीफा
सदस्य रेडियो श्रोता संघ

Dilip dave Desk
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