सर्दी में सहेजते मिट्टी, गर्मी में रहता मीठा पानी

- मटकियां बनाने में जुटे कुम्भकार

- सरकारी संरक्षण,प्रोत्साहन अभाव में दम तोड़ रहा पारम्परिक उद्योग

By: Dilip dave

Published: 18 Feb 2020, 08:28 AM IST


बालोतरा. गर्मी में शीतल पेय के लिए मटकियों की अधिक मांग पर पचपदरा के कुंभकार परिवार इनके निर्माण में जुट गए हैं। दर्जनों परिवार के एक सौ से अधिक कारीगर मटकी बनाने के काम में लगे हुए हैं। हल्की सर्दी कम होते ही इनकी बिक्री शुरू हो गई है। सरकार के उद्योग को प्रोत्साहन व संरक्षण नहीं देने पर मेहनतकश माटी के इन कारीगरों में रोष है।

दीपावली बीतने के 15-20 दिन बाद जब जोर की सर्दी पड़ती है, तब कुंभकार परिवार मटकी बनाने का कार्य करते हैं और जुलाई-अगस्त में तब तक बारिश का दौर शुरू नहीं होता, वे मटकियां बनाते हैं। पचपदरा में 60 से अधिक परिवार मटकी बनाने का काम करते हैं। इसके लिए वे खेड़ व रायथल के तालाब से मिट्टी लाते हंै।

दस दिन में तैयारी होती मटकी- मिट्टी भीगों, अच्छी तरह मथकर तैयार कर इसमें बजरी का बाण, लकड़ी बुरादा मिलाकर मटकी बनाते हैं। एक मटकी दस दिन में बन व पककर तैयार होती है। एक कारीगर दिन में औसत 25 से 30 मटकी बनाता है। पचपदरा में औसतन प्रतिदिन 1500 मटकियां बनती है, जो प्रदेश के कोने-कोने में बिकने को जाती है। गर्मी की सीजन को लेकर होलसेल व्यापारी इन दिनों इनकी खरीद कर इन्हें ले जा रहे हैं।
संरक्षण अभाव में कारीगरों का हो रहा मोहभंग- सदियों से माटी का काम कर रहे कुंभकार परिवारों को सरकारी संरक्षण व प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। मटकी बनाने,सूखाने,पकाने के लिए कम से कम 100 गुणा 100 वर्ग फीट की जरूरत रहती है। पारम्परिक तरीके से मटकी पकाने में समय अधिक लगने के साथ धुएं के रूप में प्रदूषण अधिक होता है। इस पर कुंभकार परिवार कईवर्षों से रियायती दर पर भूखंड के साथ चिमनी आधारित भट्टा लगाने के लिए सरकार से मांग कर रहे हैं। सरंक्षण व प्रोत्साहन के अभाव में मात्र अब 60 परिवार मटकी बनाने का काम करते हैं। जबकि पांच वर्ष पूर्व 120 से अधिक परिवार यह काम करते थे। यह स्थिति मोकलसर, मूंगड़ा आदि गांवों की है, यहां के कारीगरों को पारम्परिक उद्योग से मोहभंग हो रहा है।

सरकारी संरक्षण की जरूरत - शीतलता के लिए मटकियां प्रसिद्ध होने पर, इनकी मांग व बिक्री में कोई कमी नहीं आई है। सम्पन्न परिवार भी घरों में इनका उपयोग करते हैं, लेकिन सरकार की ओर से उद्योग को संरक्षण व प्रोत्साहन कुछ भी नहीं है। इस पर नई पीढ़ी इसमें रुचि नहीं ले रही है। - प्रेमप्रकाश प्रजापत. मटकी कारीगर
जितनी मेहतन उतना नहीं मुनाफा- मटकी उद्योग जितना मेहनत भरा है, उतना इसमें मुनाफा नहीं है। वर्षों से कारीगरों को रियायती दर पर भूखंड व अनुदान आधार पर चिमनी भट्टा उपलब्ध करवाने की मांग कर रहे हैं। सरकार पारम्परिक उद्योग को बचाने के लिए मदद करे। - डालाराम प्रजापत, सरपंच मण्डापुरा

Dilip dave Desk
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