जिंदा रहे ये ... रम्मक-झम्मक

विजन-2030
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आओ मिलकर देखें सपना ऐसा हों बाड़मेर अपना

By: Ratan Singh Dave

Updated: 06 Oct 2021, 06:01 PM IST

बाड़मेर पत्रिका.
बल्र्ब- अत्याधुनिकता और आर्थिक तरक्की की राह चल रहा बाढ़ाणे की आने वाले सालों में खनिज और तेल के बूते तस्वीर ही बदलती नजर आएगी। सिक्सलेन हाईवे, हवाइसेवाएं, सूखा बंदरगाह, रेलवे लाइन और रिफाइनरी सहित तमाम तरक्की के रास्ते बता रहे है कि जोधपुर से बाड़मेर तक का स्वरूप ही अलग होगा लेकिन इस सारी तरक्की के बीच में जरूरी है कि बाड़मेर की विरासतों को संजोकर रखना। बाड़मेर की कला-साहित्य और संस्कृति की थाती में असली बाड़मेर रचता-बसता है। यहां की गैर-लूर- मांगणिहार गायकी की रम्मक-झम्मक को जिंदा रखने की दरकार 2030 में रहेगी ताकि बाड़मेर आर्थिक उन्नयन के साथ पर्यटन के सहारे खूब आगे बढ़े।
मांगणिहार गायकी स्वर्णिम सफर
यजमानों के यहां पर वार-त्यौहार पर गाने वाले मांगणिहार गायकों को जन्म से ही लोकसंगीत की घुट्टी पिलाई हुई है लेकिन गायकों की कला, चढ़ते-उठते स्वर और इनमें छिपी राग रागनियों को पहचाना स्वर मर्मज्ञ कोमल दा यानि कोमल कोठारी ने। गांव के ठेट कलाकारों को पांच दशक पहले मंच दिया और फिर अंगुली पकड़ाकर देश-विदेश के मंचों तक पहुंचाया तो कलाकारों ने मंच लूट लिए। मांगणिहार गायकी ऐसी छाई कि विदेशों तक इनको बुलावा आने लगा। अब ये कलाकार टी वी की दुनियां में छा गए है और इनकी गायकी को यूट्यूब व इंटरनेट ने और आगे बढ़ा दिया है।
गैर की रम्मक-झम्मक
बाड़मेर के कनाना, जसोल, समदड़ी और पूरे इलाके में गैर की मस्ती होली पर जमती है। आंगी-बांगी पहने हुए गैरिए जब ढोल की ढंकार, थाली की टंकार के साथ पांवों के बंधे घुंघरू के धम्म से जमीन पर पांव पटकते है और इसी के साथ हवा में लहराते डांडिए टकराने और गोल घेर में नाचने की मदमस्ती देखते ही बनती है। इस गैर को भी मंच मिलने लगा और देश विदेशों तक पहुंच गई है। गैरियों की मस्ती अमेरिका सहित कई देशों ने देखी और आत्ममुग्ध हुए है।
हमारे मेले-हमारी संस्कृति
तिलवाड़ा का श्री मल्लीनाथ पशुमेला प्रदेश में प्रसिद्ध है। कनाना के शीतलामाता मेले में गैरियों की रम्मक-झम्मक अद्भुत है। आलमजी पशु मेला भी इसी श्रेणी में है। इन मेलों में पशुधन,कृषि उत्पादन और डेयरी उत्पादन के सामान के हाट बाजार लगने के साथ ही ठेट पुरातन ग्रामीण संस्कृति ङ्क्षजदा रहती है। मेलों की प्रसिद्धी राज्यभर में रही है। इन मेलों के संरक्षण व संवद्र्धन की दरकार अब अत्याधुनिक युग में जरूरी है।
हैण्डीक्राफ्ट और बाड़मेर
हैण्डीक्राफ्ट का कार्य पाकिस्तानक के सिंध से आया। बंटवारे के बाद से आई पाकिस्तान की महिलाओं ने यहां सिंधी कशीदाकारी को फैलाया। घर में विशेष अवसर पर बनने वाले उत्पादों को जब बाजार मिला तो देखते ही देखते छा गया और अब तो बाड़मेर की कशीदाकारी विश्व स्तर पर पहचान बना चुकी है। एपलिक वर्क, राली और अन्य उत्पाद देश विदेश पहुंच रहे है। करीब एक लाख महिलाएं इस कार्य को कर रही है।
बाड़मेरी प्रिंट और लकड़ी पर नक्काशी
कपड़े पर बाड़मेरी प्रिंट और लकड़ी पर नक्काशी का कार्य न केवल यहां आर्थिक उत्पाद है यह यहां की कला का बेजोड़ नमूना है। विश्व स्तर तक पहचान रखने वाले प्रिंट और नक्काशी के कार्य से जुड़े कारीगरों मजदूरों को भी संबल की दरकार है।
पद्मश्री मिला गायकी को
बाड़मेर के अनवरखां बहिया को पद्मश्री का पुरस्कार गायकी से मिला। 6 रंग और 36 रागनियों के सिद्धहस्त मांगणिहार कला के वे उस्ताद है। बाड़मेर के ही
यों बचाए थाती
- बाड़मेर-बालोतरा व जिले में इतिहास,संस्कृति, कला से जुड़े महान लोगों की प्रतिमाएं लगे और चौराहों का निर्माण हों
- वॉर म्युजियम, रेलवे शहीद स्थल और बायतु शहीद स्मारक का हों शीघ्र निर्माण
- जसोल में जनरल हणूत के नाम पर हों पर्यटन व शौर्य स्थल
- मांगणिहार लोक गायकी के लिए बने कलाकार कॉलोनी में खुले कला स्कूल
- भादरेस में संत ईसरदास साहित्य सहित डिंगल साहित्य की लाइबे्ररी बने
- जसोल-कनाना में गैर का खुले प्रशिक्षण केन्द्र
- मांड गायकी के लिए मांगणिहार गायिकाओं को मिले प्रोत्साहन
- खड़ताल, कमायचा और अन्य वाद्य व वादन यंत्रों के निर्माण को मिले प्रोत्साहन
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Ratan Singh Dave
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