दिलीप दवे/ ओम माली
बाड़मेर. कोरोना वायरस से लडऩे की जंग का ऐसा जज्बा कि आइसोलेनेशन वार्ड में ड्यूटी लगी तो सात दिन तक घर नहीं गए। डेढ़ साल की मासूम बेटी व बीवी को घर पर छोड़ा और लग गए लोगों की जिंदगी बचाने में। यह कहानी नहीं हकीकत है। बाड़मेर के राजकीय अस्पताल में कार्यरत चिकित्सक आइसोलेशन वार्ड प्रभारी डॉ. विक्रमङ्क्षसह की जो कोरोना की जंग में
बाड़मेर को बचाने में सबकुछ झोंक रहे हैं। सिंह विशेषयोग्यजन है, लेकिन कोरोना को हराने में उनके हौंसले बुलंद है। वहीं, ईसरोल से प्रतिदिन मोटरसाइकिल पर आने वाली पुष्पा अपनी दो मासूम बच्चियों को घर पर छोड़ सेवा में जुटी है। उन पर अब दोहरा भार है,
क्योंकि पति दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, जिनका काम लॉक डाउन के चलते बंद हो चुका है। ऐसे में पति व परिवार को आर्थिक संबल देने का काम भी उन्हीं का है। उषा जैन भी नि:शक्त है जो सुबह उठकर घर का चूल्हा-चौका संभालती है और इसके बाद सरकारी ड्यूटी। ये कुछ ऐसे उदाहरण है जो समाज को कोरोना से बचाने की लड़ाई में अपनी पीड़ा भूल लोगों के लिए जी जान से जुटे हैं।
कोरोना वायरस संक्रमण को जिले में फैलने से बचाने का जिम्मा बाड़मेर के राजकीय अस्पताल में ज्यादा है। इस अस्पताल में कोरोना आइसोलेशन वार्ड है तो स्क्रीनिंग की रिपोर्ट भी यहीं से जोधपुर जाती है या फिर मेडिकल कॉलेज तक। इसके चलते अस्पताल में हर चिकित्सक, पैरा मेडिकल स्टाफ अपने फर्ज को बखुबी निभा रहा है, लेकिन कुछ नि:शक्त अपनी पीड़ा भूल दूसरों का दर्द बांट रहे हैं। अस्पताल में कार्यरत डॉ. विक्रमसिंह भरतपुर से है, वे यहां उस चिकित्सक टीम में शामिल है, जो आइसोलेशन वार्ड का जिम्मा संभाल रही है, जिसमें संदिग्ध मरीज भर्ती है। इन मरीजों के सेहत की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने सात दिन की ड्यूटी के दौरान घर का रुख तक नहीं किया है। घर में डेढ़ साल की मासूम बिटिया और बीबी से दूरी पीड़ा दायक थी, लेकिन जज्बा इस बात का कि बाड़मेर को कोरोना के कहर से बचाना है। उनके अनुसार बाड़मेरवासी अनुशासित है, लेकिन अभी भी कोरोना को लेकर लापरवाही बरतना ठीक नहीं होगा। सरकार के निर्देशों का पालन करना जरूरी है।
पति को आर्थिक संबल तो ड्यूटी का भी फर्ज- पुष्पा का ससुराल ईसरोल में है, वे संविदाकर्मी हैं और दो-ढाई से अस्पताल में सेवा दे रही हैं। उनके सामने फर्ज और परिवार को लेकर पहले ऐसा संकट नहीं आया जैसा अब आया है। हालांकि अस्पताल में मरीज कम हुए हैं, लेकिन ड्यूटी कम नहीं हुई। ऐसे में उन्हें हर रोज अस्पताल आना पड़ता है। उनके दो मासूम बिटिया हैं। लॉक डाउन नहीं होने पर वे आसानी से आ-जा सकती थी, लेकिन अब पति मोटरसाइकिल पर उसे छोडऩे-लेने आते हैं। कई बार पुलिस के प्रहरे से पति को दिक्कत होती है, ऐसे में बच्चों को अपने पीहर जालीपा में नानी के पास छोड़ कर वे डयूटी निभा रही है। पति का काम लॉक डाउन के चलते छूट गया है, ऐसे में परिवार के लिए आर्थिक संबल भी पुष्पा का मानदेय ही है।
काम कम हुआ पर डयूटी नहीं- कोरोना वायरस के चलते उषा जैन का डयूटी कार्य थोड़ा कम हुआ है। वे बच्चों के वार्ड में टीकाकरण का कार्य करती हैं। हालांकि वे हर दिन की तरह अस्पताल आती है और यहां आने वाले मरीजों को कोरोना वायरस को लेकर जागरूक करती है। मास्क नहीं लगाने वालों को सख्त हिदायत देती हैं कि लापरवाही ना बरतें। बेटा-बेटी कॉलेज व उच्च कक्षा में पढ़ते हैं, उनको खाना बना कर खिलाने के बाद अस्पताल आती है। दोपहर तीन बजे डयूटी खत्म होने पर घर जाती हैं। नि:शक्त होने के बावजूद उनके जज्बे में कोई कमी नहीं है। उनके अनुसार लोगों की हिम्मत और निर्देशों की पालना पर ही बाड़मेर कोरोना के कहर से बच पाएगा।

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned