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कौन अपनी हड्डियां तुड़वाएगा?

बेहिसाब पैसे के साथ अपराध..अपराधियों का गठजोड़...गैंग बनना..हथियार आना और फिर भय, आतंक और भ्रष्टाचार..। यह रातों रात नहीं होता है, यह धीरे से शुरू होकर जब लगाम न कसे तो रफ्तार से बढ़ जाता है। बेलगाम होने के पीछे केवल अपराधी हों यह कत्तई नहीं हो सकता।

बाड़मेर

Published: December 25, 2021 11:57:23 am

कौन अपनी हड्डियां तुड़वाएगा?
रतन दवे
टिप्पणी
बेहिसाब पैसे के साथ अपराध..अपराधियों का गठजोड़...गैंग बनना..हथियार आना और फिर भय, आतंक और भ्रष्टाचार..। यह रातों रात नहीं होता है, यह धीरे से शुरू होकर जब लगाम न कसे तो रफ्तार से बढ़ जाता है। बेलगाम होने के पीछे केवल अपराधी हों यह कत्तई नहीं हो सकता। शह, सहयोग,सिफारिश, राजनीतिक,पुलिस व प्रशासनिक अमले में भी अंदर तक दखल का परिणाम होता है। परिणाम भुगतते है वे लोग जो सवाल उठाते है? जिनके कंठ की जुबान गांठ नहीं लगाकर खुला बोलती है। गुनाह यही है कि अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को गलत को गलत कहना नागवार गुजर जाता है और फिर टारगेट कर दिया जाता है उस विरले व्यक्ति को जो आवाज उठा रहा है। उदाहरण सामने है आरटीआइ कार्यकर्ता अमराराम। अमराराम को मारने पर उतारू हो गए। पांवों में कीलें ठोक दी। हाथ पांव तोड़ दिए। भगवान ने ही बचाया है बाकि अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों ने तो मार ही दिया था। अपराध का विभत्स और जघन्य रूप बाड़मेर में पहले नहीं देखा गया। कसूर भी यही तो था कि ... बोला क्यूं? प्रशासन गांवों के संग शिविर में अर्जी दी और उस पर कार्यवाही हुई। इससे पहले शराब माफिया के खिलाफ शिकायत की। दोनों ही शिकायतें झूठी भी नहीं थी। अब पीछे जाएं तो देखते है भय और आतंक की फसल की बुवाई रेगिस्तान में सात-आठ साल से हो रही है। बजरी , शराब , डोडा पोस्त तस्करी और निजी तेल कंपनियों में काम पाने की हौड़ ने यहां गैंग बना दी है। हथियार और तमंचे अनगिनत आ चुके है, जो कई बार ताने गए है। अपराधियों पर लगाम कसने के लिए पुलिस की कार्यवाही इनके सामने बौनी होने लगी है। अपराधियों की असंख्य संख्या के सामने आवाज उठाने वाले दो दूनी चार भी नहीं है, लिहाजा अपराध समाज का हिस्सा नहीं बन रहा है अब तो सभ्य समाज पर अतिक्रमण करने लगा है। आम आदमी के वोटों से भले ही सरकारें सुनी जा रही है लेकिन वो वक्त दूर नहीं जब इस हालात में अपराधियों के रुपयों, गैंग और धमकियों के बूते चुनाव जीतने-हारने के दावे होने लगे, जैसे अन्य प्रदेशों में होते है। विकास के साथ-साथ दौड़ रहा यह विनाश शांत और सौहार्दपूर्ण समझे जाने वाले बाड़मेर की आबोहवा में जहर घोल दे उससे पहले चेतना होगा। सच मानिए यह वो इलाका है, जहां अभाव और समस्याओं से घिरे हुए रहने पर भी जीवटता वाले लोगों ने एक दूसरे की मदद की है। गांव में कोई गलत करता तो उसको उलाहना देते ही उसको इतनी शर्म आती कि वो आंख नहीं उठाता और गांव का दर्द गांव के लोग मिल बैठकर बांट लेते। कहीं कोई राजनीतिक दखल नहीं था, एक सामाजिक ताना-बाना रहा। जिस ताने-बाने में एक दूसरे से जुड़े हुए लोग खुद तय करते कि गांव के लिए क्या सही है और क्या गलत है। विकास के नाम पर निर्माण कार्यों की बंदरबांट, राजनीतिक दल के साथ रहने पर रेवडिय़ों की तरह टांके, सभाभवन और अन्य परिलाभों में हिस्सेदारी मिलना और पंच-सरपंची के लिए गांव का ही कई गुटों में विभाजित हो जाना अब गांव के सकून को चौराहे पर ले आया है। जहां कई गुट है और वे एक दूसरे की अनगिनत शिकायतें लेकर प्रतिदिन कचहरी पहुंच जाते है और यही द्वेष गांव-गांव में अपराध को बढ़ा रहा है। फिर एक हौड़ चलती है कि जैसे-तैसे पैसा कमाएं, सामने वाले को नीचा दिखाएं और कोई सच बोलने की हिम्मत करें तो फिर उसका अंजाम...अमराराम।
सरकार इस मामले में ही गंभीरता तो दिखाए ही बल्कि भय, भ्रष्टाचार और आंतक की जो फसल रेगिस्तान में बोई जा रही है उसको उखाडऩे के लिए भी कड़े कदम उठाए। हो सकता है आने वाले तीन-चार साल में रिफाइनरी, तेल, गैस और बड़े उद्योग यहां आकर यहां का भूगोल बदल दे और विकास की बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी कर दे। बाड़मेर को दुबई बनाने का सपना तो सरकार देख रही है लेकिन दुबई में कानून तोडऩे वाले का वो हश्र होता है कि दुबारा वह हिमाकत नहीं कर पाता है। दुबई में 123 देशों के लोग इस सकून से रहते है कि यह दुनियां के सुरक्षित मुल्कों में से एक है। हम यहां दुबई बनाने की राह तो चल पड़े है लेकिन इमारतें और उद्योग दुबई हो जाएंगे लेकिन उस पर अपराध का राज हो गया तो जड़ें गाड़ रहे अपराध से आम आदमी कैसे लड़ेगा? कौन अपनी हड्डियां तुड़वाएगा...?
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