जीरो जीव रो बेरी... मौसम की मार, मंडी का अभाव और जिंदगी पर दांव

- बाड़मेर में 11 अरब की पैदावार- मौसम की मार पर किसान बुवाई के वक्त सहने परेशानी, मंडी के अभाव में गुजरात जाता जीरा

- गुजरात में किसानों के साथ मारपीट, लूट की घटनाएं भी हो रही

By: Dilip dave

Published: 11 Jan 2021, 07:46 PM IST

दिलीप दवे बाड़मेर. ११ अरब के जीरे की पैदावार करने वाले सीमावर्ती बाड़मेर जिले के किसानों के लिए यह जीव का बेरी बना हुआ है। बुवाई से लेकर बिकवाली तक किसानों की जान आफत में रहती है कहा जाए तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगा। बुवाई के वक्त मौसम की मार से जीरे को नुकसान होने पर किसानों का आर्थिक बोझ सहना पड़ता है तो पक कर तैयार होने पर बिकवाली की चिंता, क्योंकि बाड़मेर में जीरा मंडी नहीं है। वहीं, जब जीरे बेचने गुजरात जाते हैं तो वहां पर भी लूट, मारपीट के चलते जान दांव पर रहती है। बाड़मेर जिले में पिछले करीब दो-ढाई दशक से रबी की बुवाई के तहत जीरा बोया जा रहा है।

जीरे की फसल यहां के गांव-गांव में हो रही है। करीब सात हजार से ज्यादा गांवों में दो लाख से ज्यादा हैक्टेयर में जीरा बोया जाता है। जीरे का उत्पादन होने पर किसानों को ११ अरब की आय होती है। अरबों की आय देने वाला जीरा किसानों के लिए जीव का बेरी भी है।

कई कठिनाइयां सहने यहां तक लूटपाट की घटनाओं के डर के बीच किसानों को जीरा बेचना पड़ता है। मौसम की मार के बीच बुवाई- बाड़मेर में जीरे की बुवाई के साथ किसानों की चिंता शुरू हो जाती है।

अक्टूबर-नवम्बर में बुवाई शुरू होती है, लेकिन सर्दी नहीं पडऩे पर कई बार बीज जमीदोज हो जाता है, जिस पर किसानों को दुबारा बुवाई करनी पड़ती है।

हर साल कई किसानों को एेसा करना पड़ता है। इसके बाद जब जीरा पकता है तब कई बार बेमौसम की बारिश, ओलावृष्टि किसानों की मेहनत पर तुषारापात करती है।

अरबों का जीरा, मंडी का अभाव- जिले में ११ अरब का जीरा पैदा हो रहा है, लेकिन यहां जीरे की खरीद नहीं होती। जिला मुख्यालय पर निजी जीरा मंडी का निर्माण जरूर हो रहा है, लेकिन लम्बे समय से यह कार्य भी गति नहीं पकड़ पा रहा है। सरकारी मंडी में जीरे की खरीद नहीं होती। व्यापारी वर्ग जीरा जरूर खरीदता है, लेकिन अरबों की उपज पर व्यापारी भी ज्यादा नहीं है जो मोटी रकम खर्च कर जीरा खरीद सके।

गुजरात की राह, लूटपाट का डर- जीरे की उपज बाड़मेर के किसान सीधे गुजरात ले जाते हैं। वहां की ऊंझा मंडी में जीरा बिकता है। बाड़मेर के जीरे की वहां डिमांड है तो दाम भी अच्छे मिलते हैं। इसके चलते अधिकांश किसान ऊंझा जाते हैं, लेकिन वहां भी पिछले कुछ सालों में मारपीट कर रुपए छीनने, जीरा लूट कर ले जाने की घटनाएं हो रही है। एेसे में किसानों की जिंदगी भी जीरे के चलते दांव पर रहती है।

जीरा मंडी खुलने से फायदा- जिले में जीरा मंडी खुले तो न केवल बाड़मेर, जैसलमेर व जालोर के किसान भी यहां जीरा बेचने आ सकते हैं। ऊंझा मंडी के भाव के अनुसार दाम मिलने पर किसानों को फायदा होगा तो सरकार को भी कर के रूप में आय प्राप्त होगी।- सवाईसिंह राठौड़, प्रगतिशील किसान भिंयाड़

किसानों की जान जोखिम में- किसानों की जान जीरे की बुवाई से लेकर बिकवाली तक जोखिम में ही रहती है। मौसम की मार की चिंता के बीच बुवाई होती है और लूटपाट की घटना के डर के साथ बिकवाली। किसानों की हिफाजत का प्रबंध होना चाहिए।- बाबूलाल विश्नोई, किसान नेता गुड़ामालानी

११ अरब का होता जीरा- जिले में ११ अरब का जीरा होता है। अधिकांश जीरा ऊंझा मंडी बिकने जाता है। बाड़मेर में निजी जीरा मंडी बन रही है।- डॉ. प्रदीप पगारिया, कृषि वैज्ञानिक केवीके गुड़ामालानी

दुकानों का हो रहा निर्माण- जीरा मंडी में दुकानों का निर्माण हो रहा है जिसमें करीब डेढ़ साल लगने का अनुमान है। वैसे कृषि उपज मंडी में जीरे की खरीद की जा रही है।- सुरेश मंगल, सचिव कृषि उपज मंडी बाड़मेर

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