जितने पेड़ डूबे उससे तीन गुना लगाना था पेड़, कागजों पर ला दी हरियाली

सरदार सरोवर बांध के पानी में लाखों पेड़ डूबे, 40 हजार हेक्टेयर भूमि जलमग्न, नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण और नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण को नहीं सुध

By: vishal yadav

Published: 01 Mar 2020, 11:08 AM IST

बड़वानी. सरदार सरोवर बांध के बैक वाटर से हरियाली से आच्छादित नर्मदा घाटी उजाड़ हो गई है। बांध के बैक वाटर में डूबे लाखों पेड़ सूखकर ठंूठ बन चुके हैं। बांध के कारण मप्र और गुजारात में 40 हजार हेक्टेयर भूमि भी जलमग्न होकर प्रभावित हुई है। डूब से जो लाखों पेड़ डूबकर सूख चुके हैं, उनके स्थान पर जिम्मेदारों को तीन गुना अधिक पेड़ नर्मदा के तटीय क्षेत्रों में लगाने थे। लेकिन हरियाली सिर्फ कागजों पर ही लहलहा रही है। जमीनी स्तर पर कहीं भी नए पेड़ लगे हुए नजर नहीं आ रहे हैं। इतना बड़ा पर्यावरणीय नुकसान होने के बाद भी इस पर न तो नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण कोई ध्यान दे रहा है और ना ही नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण इसकी सुध लेने को तैयार है। ऐसे में जिम्मेदार इतनी बड़ी पर्यावरणीय क्षति नजर अंदाज कर रहे हैं। जो आने वाले समय में विकट परिस्थितियां पैदा कर सकती है।
बांध के पर्यावरणीय असर व लाभ-हानि
नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर ने बताया कि सरदार सरोवर का 214 किमी लंबा और 40 हजार हेक्टर्स क्षेत्र का जलाशय है। 138.68 मीटर उंचाई क बांध, नर्मदा पर बनाए जा रहे 30 बड़े व 135 मझौले बांधों में से एक है। बांध से नर्मदा की गति रूकी हुई है और कभी सूखे की तो कभी बाढ़ की स्थितियां निर्मित हो रही है। निचले हिस्से में पर्याप्त पानी की मात्रा न छोड़ी जाने पर नर्मदा की धारा सूखी पड़ी है। इससे समुद्र का पानी गुजरात में 80 किमी तक अंदर घूस आया है। खेती, भूजल खारा होकर लाखों लोग, मछली और मछुआरों की आजीविका, किसान और छोटे-बडे उद्योग भी गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं। नर्मदा के जलग्रहण क्षेत्र में उपचार कार्य नहीं के बराबर हुआ, लेकिन परिपूर्णता का झूठा दावा जिम्मेदारों ने किया है। राहुल यादव ने बताया कि मप्र के गांवगांव में कोई कार्य न होकर नदी में गाद भरती जा रही है। गुजरात और महाराष्ट्र के पहाड़ी गावों में पौधारोपण हुआ था, लेकिन उसकी गुणवत्ता सही नहीं होने से वह सूख चुका है। मप्र में मात्र कुछ चेक डोस कार्यरत है। उनमें से कुछ राजीव गांधी मिशन के रेकॉर्ड पर भी है।
अवैध रेत खनन से हुआ बहुत नुकसान
नर्मदा के तटों पर हुए अवैध रेत खनन से बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। इससे नर्मदा के तट कमजोर हो गए हैं और पानी अधिक स्थान तक फैल रहा है। इससे नर्मदा का जलचक्र भी प्रभावित हुआ है। रेत खनन पर मप्र उच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना होती आ रही है। अभी भी नर्मदा और उसकी सहायक नदियों से बड़ी मात्रा में खनन हो रहा है, लेकिन भी इस पर ध्यान नहीं दे रहा है। ये अवैध रेत खनन आने वाले समय में गंभीर असर डालने वाला है।
पेड़ों का काटने का दावा भी झूठा
नर्मदा में आई डूब से पहले ही तीनों राज्यों मप्र, महाराष्ट्र और गुजरात में लाखों पेड़ों को काटने का झूठा दावा पर्यावरण उपदल, नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की बैठक में सन 2003 में किया गया। डूब प्रभावित क्षेत्रों में आज भी हजारों पेड़ सूखकर ठूंठ बने खड़े हुए हैं। इन पेड़ों को काटने का ठेका कुछ समय पहले ही दिया गया है। राहुल यादव ने बताया कि गांवों के पुनर्वास हुए बिना इन पेड़ों को बिना ग्राम सभा के काटना संभव नहीं हो पाएगा। उन्होंने बताया कि वैकल्पिक वनीकरण तीन गुना किए जाने का दावा भी झूठा है। वनीकरण के नाम पर जो पौधे लगाए थे, उनसे से मात्रा 10 प्रतिशत पेड़ ही जिंदा बचे हैं।
बना हुआ है भूकंप का खतरा
मेधा पाटकर ने कहा कि नर्मदा नदी सोन नर्मदा लिनामेंट जो भूकंप प्रवण क्षेत्र से उस पर बह रही है। बांध के रूके पानी के लिए कारण नर्मदा घाटी में भूकंप का खतरा लगातार बना हुआ है। इसके झटके कई बार महसूस भी किए जा चुके हैं। भूकंप मापन के लिए जो केंद्र बनाए गए हैं, उसकी जानकारी गांधी नगर भेजी जा रही है। उस पर न तो कोई विचार किया जा रहा है और ही विश्लेषण हो रहा है। ऐसे में भूकंपन की क्या स्थिति होने वाली है, इसकी जानकारी लोगों को नहीं मिल रही है।
नहीं रहेगा पीने लायक पानी
बांध के कारण नर्मदा के रूका हुआ पानी भी अब धीरे-धीरे प्रदूषित होते जा रहा है। इससे जलीय जीवों पर भी असर पड़ रहा है। वहीं ज्यादा समय तक ऐसा चला तो नर्मदा का पानी पीने लायक भी नहीं रह जाएगा। वर्तमान में नर्मदा के रूके हुए पानी का रंग भी परिवर्तित हो रहा है। इसमें फैल रही गंदगी के कारण ऐसा हो रहा है। उन्होंने बताया कि सरदार सरोवर से प्रतिदिन 600 क्युसेक्स पानी छोडऩे का निर्णय 1990 के दशक में एक आंतरराष्ट्रीय सलाहकार वॉलिंगफोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया था। लेकिन उसका भी पालन बांध की उंचाई बढऩे पर 2006 के बाद और विशेषत: 2014 के बाद नहीं किया गया।

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