scriptAngel of University Time Residency: Memories of the Dr. Amir Feli | यूनिवर्सिटी के समय (रेजीडेंसी) का एक और देवदूत : डॉ. अमिर फेली के जीवन की यादें | Patrika News

यूनिवर्सिटी के समय (रेजीडेंसी) का एक और देवदूत : डॉ. अमिर फेली के जीवन की यादें

दक्षिण-पश्चिम ईरान के एहवाज शहर स्थित इमाम अस्पताल में त्वचा विशेषज्ञ के प्रथम वर्ष की पढ़ाई के दौरान मैं (Dr. Amir Feli) इस कोर्स का गहन अध्यन करते हुए मरीजों का इलाज करने लगा। सर्दी के मौसम में रेजीडेंसी में इसी तरह शुरूआत के कुछ महीने बीत गए। इसी दौरान घर के मरम्मत की और गैस पाइप लाइन की जरूर आन पड़ी।

बस्सी

Published: December 25, 2021 10:36:49 pm

दक्षिण-पश्चिम ईरान के एहवाज शहर स्थित इमाम अस्पताल (Imam Hospital in Ehwaz City) में त्वचा विशेषज्ञ के प्रथम वर्ष की पढ़ाई के दौरान मैं (Dr. Amir Feli) इस कोर्स का गहन अध्यन करते हुए मरीजों का इलाज करने लगा। सर्दी के मौसम में रेजीडेंसी में इसी तरह शुरूआत के कुछ महीने बीत गए। इसी दौरान घर के मरम्मत की और गैस पाइप लाइन की जरूर आन पड़ी। इसके अलावा इसी के साथ ही मेरी मां की तत्काल सर्ज़री की भी जरूरत पड़ गई। अपनी मां की भारी भरकम डोज़ वाली गैस की खतरनाक कैप्सूल जिसके दुष्प्रभाव काफी खतरनाक हो सकते थे। इस बात ने मेरी चिंता और भी ज्यादा बढ़ा दी थी। पर इत्तेफाक से मेरी मां हर समय अपने सिलाई के काम में ही व्यस्त रहती थीं। यहां तक की मेरी रेजीडेंसी की तनख्वाह के एक हिस्से के साथ वो मुश्किल से अपना गुजारा कर पाती थीं। यहां तक की उस दौरान हम अच्छे से दैनिक जरूरतों का खर्च भी उठाने में सक्षम नहीं थे, क्योंकि उस दौरान रेज़ीडेंसी वेतन बेहद कम थी जो कि इतनी कम थी कि कोई भी स्टूडेंट अपने लिए किराए का कमरा तक नही ले सकता था।
यूनिवर्सिटी के समय (रेजीडेंसी) का एक और देवदूत : डॉ. अमिर फेली के जीवन की यादें
यूनिवर्सिटी के समय (रेजीडेंसी) का एक और देवदूत : डॉ. अमिर फेली के जीवन की यादें
तो वहीं रेज़ीडेंसी में रह रहे किसी भी निवासी को किसी भी तरह की प्राइवेट नौकरी करने की औपचारिक तौर पर इज़ाजत नहीं थी। किसी भी स्टूडेंट के ऐसा करने पर उसे रेज़ीडेंसी से बहिष्कृत कर दिया जाता। इसी वजह से स्टूडेंट को इसी तरह के बेहद कम वेतन में अपना गुजारा करने को मजबूर होना पड़ता। इसी नियम के अनुसार मुझे भी रेज़ीडेंसी से बाहर जाकर नौकरी करने की इजाजत नहीं थी। मै केवल अपनी मां और अपने परिवार को इसी तरह से परेशान और दुखी बस देख सकता था। मेरे नियंत्रण में कुछ भी नहीं था।
एक दिन ईमाम अस्पताल की लाइब्रेरी में मै अपने सामने एक किताब रखकर बैठा इधर- उधर देख रहा था। इसी दौरान मेरे करीब रेज़ीडेंसी के मेरे एक सहपाठी डॉ.दनेश पाजहू भी मेरे करीब आकर बैठ गए। उन्होंने मुझसे पूछा मै कैसा हूं, मैने बोला अच्छा नहीं हूं। मुझे याद है डॉ. दनेश पाजहू ने मुझसे कहा तुम ठीक कैसे नहीं हो? तुम एकदम स्वस्थ हो, युवा हो, अच्छे पढ़े-लिखे हो, त्वचा विशेषज्ञ हो अच्छा होने के लिए तुम्हें और क्या चाहिए? मैने कहा मेरे पास कई तरह की आर्थिक परेशानियां हैं। और वो मुझे कहीं भी कुछ भी नही करने देंगे और इतनी कम सैलरी में कुछ भी नहीं हो सकता।

डॉ. दनेश पाजूह ने कहा मैं करता हूं कुछ। बस इतना कहने के बाद वो वहां से चले गए। एक-दो दिन बीतने के बाद डॉ.दनेश पाजूह और इमाम हॉस्पिटल के इमरजेंसी विभाग पूर्वॆ हेड डॉ. अट्टारी की सहायता से यूनिवर्सिटी को एक पत्र भेजा गया, जिसमें लिखा गया कि मै इमाम अस्पताल का एक इमरजेंसी फीज़ीसियन हूं। जहां मैं पढ़ाई के साथ कुछ पैसे कमा रहा हूं। उस दौरान कोई भी रेज़ीडेंट या स्टूडेंट ने यूनिवर्सिटी को पत्र लिखकर इस समस्या को उठाने के बारे में विचार नहीं किया था, लेकिन डॉ. दनेश पाजूह मेरी बहन और डॉ अट्टारी की सहायता से स्टूडेंट पर बाहर जाकर काम करने पर लगा बैन हटा दिया गया। और मैं उस दौर में यूनिवर्सिटी का पहला स्टूडेंट था जो औपचारिक तौर पर, आर्थिक समस्याओँ के चलते इमरजेंसी रूम में काम करना शुरू किया था। मेरे बाद मेरे जैसे कई दूसरे स्टूडेंट ने जो आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे, उन लोगों ने भी लीगल तौर पर इमरजेंसी रूम में काम करना शुरू कर दिया। मैंने ईश्वर का शुक्रिया अदा किया कि डॉ. दनेश पाजूह उस दिन देवदूत बनकर आए।
और कई महीनों बाद घर की मरम्मत और गैस पाइप लाइन का काम भी अच्छी तरह से पूरा हो गया, मेरी मां की सर्जरी हो गई थी, मेरी जिंदगी में सुकून लौट आया था। एक बार फिर से शुक्रिया मेरी प्रिय बहन डॉ. दनेश पाजूह रेज़ीडेंसी के दौरान किए गए सभी तरह की सहायता के लिए।

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