Deepawali Special: अनूूठी परम्परा, जब तक कोआ भोग में चोंच नहीं भरता बैठे रहते लोग

200 साल पुराने तालाब किनारे सामूहिक रूप से एकत्र होकर पाल पर बड़ के पत्तों को तोड़कर तालाब के पानी के समीप सामूहिक रूप से करते बुजुर्गों का श्राद्ध

By: Gourishankar Jodha

Published: 13 Nov 2020, 10:18 PM IST

रेनवाल मांजी। मीणा समाज की वर्तमान पीढ़ी आज भी अपने बुजुर्गों की वर्षा पुरानी परम्परा को निभा रहे हैं। जब तक कौआ भोग में से चोंच भरकर नहीं खाता, लोग तालाब की पाल पर बैठे रहते हैं।
समाज के करीबन 100 परिवार हर दीपावली को 200 साल पुराने तालाब किनारे सामूहिक रूप से एकत्र होकर तालाब पाल पर बड़ के पत्तों को तोड़कर तालाब के पानी के समीप सामूहिक रूप से बुजुर्गों का श्राद्ध निकालते हैं।

तालाब की पाल पर बैठे रहते लोग
परम्परानुसार एक व्यक्ति के घर पर आदा क्विंटल दूध में खीर बनाकर एक बड़े मटके में डालकर तालाब पर पहुंचते है। वहां एक व्यक्ति बड़ के पेड़ पर बैठे कौअे के सामने सब लोगों द्वारा अपने पूर्वजों के लिए निकाले गए भोग को रखा जाता हैं। जब तक कौआ भोग में से चोंच भरकर नहीं खाता, लोग तालाब की पाल पर बैठे रहते हैं। ज्यों ही कौआ खीर में से चोंच भरकर खाने लगता है तो मीणा समाज के लोग सामूहिक रूप से मटके से खीर लेकर सामूहिक भोजन करते हैं।

घरों ने महिलाएं नहीं लगाती झाडू
यह परम्परा समाज के द्वारा पिछले कई वर्षा से निभाई जा रही हैं। मीणा समाज के घरों में दीपावली के दिन श्राद्ध निकालकर भोग नहीं लगाने तक महिलाओं के द्वारा अपने घरों में झाडू नहीं निकालती हैं। सब के घरों में तालाब के पानी का छिड़काव होने के बाद ही लोग एक-दूसरे के गले मिलकर दीपावली व अपने पूर्वजों की ओर से राम-राम कर अपने-अपने घरों की ओर निकलते हैं।

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