पुलवामा हमले की बरसी पर शहीद की वीरांगना का छलका दर्द, बोली... सरकार से आर्थिक मदद तो मिली, सम्मान नहीं मिला

सरकार ने जल्द घोषणाएं पूरी नहीं की तो 50 लाख भी लौटा देंगे


-शहीद के परिजन को नौकरी मिली न विद्यालय का नामकरण हुआ, शहीद स्मारक भी नहीं बना


शाहपुरा/गढटकनेत।


जम्मू कश्मीर के पुलवामा में 14 फरवरी 2019 को हुए आत्मघाती आतंकी हमले को एक वर्ष बीत गया, लेकिन उस आतंकी हमले के जख्म अभी तक हरे है। पुलवामा हमले का नाम सुनते ही आज भी देश के लोगों का खून खोल उठता है।

जयपुर जिले के गोविन्दपुरा बासड़ी गांव में तो युवा, बुजुर्ग और महिलाओं से लेकर बच्चों तक में पुलवामा का नाम लेते ही बदले की आग दिखाई देती है। उस आतंकी हमले में देश के 40 वीर जवान देश के लिए कुर्बान हुए थे। प्रदेश के पांच शहीदों में जयपुर जिले के गोविन्दपुरा बासड़ी गांव के जवान रोहिताश लाम्बा भी इस शहादत में शामिल थे।

पुलवामा अटैक की पहली बरसी पर पत्रिका संवाददाता शहीद रोहिताश लाम्बा के घर पहुंचा और शहीद के परिजनों से बातचीत की, तो देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले अपने लाल की शहादत को लेकर माता-पिता में गर्व था, वहीं जवान बेटे की याद आने पर आंखों से दर्द भी छलक पड़ा।

पिता बाबूलाल लाम्बा बोले कि बेटे की शहादत पर गर्व है, जवानों की शहादत कभी भुली नहीं जा सकती, लेकिन लगता है सरकार शहीद की शहादत भूल गई है। सरकार की ओर से की गई घोषणाएं आज भी पूरी नहीं हुई है।

बातचीत के दौरान अपने पति को याद करते हुए शहीद की वीरांगना पत्नी मंजू देवी की आंखों से भी आसूं बह निकले। बोली इंसान तो गया, अब सरकार भी सुध नहीं ले रही। सरकार से आर्थिक मदद तो मिली, लेकिन सम्मान नहीं मिला।

सरकार ने अभी तक न तो किसी परिजन को सरकारी नौकरी दी और न ही शहीद के नाम पर विद्यालय का नामकरण किया। अभी तक शहीद स्मारक भी नहीं बनाया गया। यदि सरकार ने सुध नहीं ली तो वे सरकार से मिले 50 लाख रुपए भी वापस लौटाने को तैयार हैं।

पोते धु्रव में नजर आता है बेटे का अक्स


शहीद के पिता बाबूलाल लाम्बा व माता घीसी देवी बोले कि बेटे रोहिताश के शहीद होने के समय उसका बेटा धु्रव मात्र डेढ माह का था। अब धु्रव 14 महिने का हो गया है। अब उसी में बेटे रोहिताश को देखते हैं। जब भी धु्रव को देखते हैं तो बेटे रोहिताश के बचपन की यादें जेहन में जिंदा हो आती है। रोहिताश अंतिम बार ध्रुव के जन्मोत्सव पर ही छुट्टियां लेकर आया था। वह दोस्तों और परिजनों से एक ही बात कहा करता था कि काम ऐसा करो कि दुनिया याद रखें और ऐसा ही काम कर गया।

एक भी दिन ऐसा नहीं जाता जब वो याद नहीं आते

अपने पति को याद करते हुए शहीद की वीरांगना पत्नी मंजू देवी की आंखों के आंसू सूख चुके हैं। वीरांगना बोली कि एक -एक दिन एक साल जैसा गुजरता है। एक भी ऐसा दिन नहीं जाता, जब वो याद नहीं आते हो। पल-पल उनकी याद सताती है। ऐसा लगता है कि अभी ड्यूटी पर है और आज-कल में घर वापस आ जाएंगे। अब बेटा ध्रुव ही उनकी निशानी है, उसे भी पालपोशकर देश सेवा के लिए बड़ा करना है।


सरकार को शहीद परिवारों की पीड़ा समझनी चाहिए


शहीद के छोटे भाई जितेन्द्र ने कहा कि सरकार को शहीद परिवारों की इस पीड़ा को समझ कर घोषणाएं समय पर पूरी करनी चाहिए।

उसने बताया कि सरकार से आर्थिक सहायता तो मिल चुका, लेकिन अभी तक परिवार में किसी को सरकारी नौकरी नहीं मिली। परिवार भाई पर ही आश्रित था, अब जो आर्थिक पैकेज मिला है उसी से घर का खर्च चला रहे हैं। परिवार को छोड़कर कहीं दूर कमाने भी नहीं जा सकता। ऐसे में घर चलाने के लिए नौकरी चाहिए। नौकरी के लिए अधिकारियों से लेकर मंत्री तक सभी से मिल चुके, लेकिन अभी तक फाइल अटकी हुई है। शहीद स्मारक के लिए भी विधायक कोटे से मात्र 4 लाख स्वीकृत हुए हैं, जिससे मात्र चारदीवारी ही हो सकेगी।


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शहीद का छोटा भाई ही सहारा


पुलवामा आतंकी हमले में शहीद हुए रोहिताश लांबा का जन्म 14 जून 1991 को गोविंदपुर बासड़ी गांव में हुआ था। रोहिताश लांबा 2011 में सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे। वर्ष 2013 में प्रशिक्षण के बाद ड्यूटी ज्वॉइन की। शहीद रोहिताश के 14 माह का बेटा धु्रव है। अब छोटे भाई जितेंद्र पर ही पूरे परिवार की जिम्मेदारी है।

Satya Desk
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