प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ नहीं, इमरजेंसी में सेवाएं नहीं

बस्सी . सेटेलाइट अस्पताल जितना रूटीन आउटडोर। प्रसव के मामलों में भी अव्वल। समय-समय पर सीएमएचओ, एनएचएम निदेशक और मंत्री तक की विजिट। ये हालात हैं जमवारामगढ़ और बस्सी हैडक्वार्टर सीएचसी के। जहां औसतन ८०० से १००० तक प्रतिदिन की ओपीडी के बावजूद सर्जरी विशेषज्ञ नहीं है। इसका सीधा-सीधा खामियाजा इमरजेंसी में आने वाली प्रसूता और दुर्घटनाओं के गंभीर घायलों को उठाना पड़ रहा है।

जमवारामगढ़ में कैसे बढ़ेगी संस्थागत प्रसव की संख्या-विधानसभा क्षेत्र का राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जमवारामगढ़ सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है। समूचे विधानसभा क्षेत्र की आबादी ३ लाख ६४ हजार के आसपास है। सरकार और चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग संस्थागत प्रसव को बढ़ावा दे रहे हैं। फिर भी ब्लॉक के चार सीएचसी और ११ पीएचसी पर एक भी प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं है। ऐसे में यहां के सभी स्वास्थ्य केन्द्रों पर संस्थागत प्रसव सामान्य चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ के भरोसे हो रहे हैं। सीएचसी जमवारामगढ़ संस्थागत प्रसव के लिए काफ ी अच्छा माना जाता है, लेकिप प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ चिकित्सक के अभाव में संस्थागत प्रसव में गिरावट आ रही है। पद तो है, लेकिन कागजों में चल रहा है-कहने को तो जमवारामगढ अस्प्ताल में प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ चिकित्सक का पद भरा हुआ है, लेकिन यह कागजों में ही भरा हुआ है। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही कहें या लालफ ीताशाही, इसके चलते विशेषज्ञ चिकित्सक विभाग के आदेशों की परवाह ही नहीं कर रही हैं। लगभग एक वर्ष पहले यहां कार्यरत प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. सुनीता मीना को हटाया गया था। उसके बाद डॉ. रीमा गुप्ता ने कार्यभार ग्रहण किया। कार्यभार ग्रहण करते ही लम्बी छुट्टियों पर चलीं गई। फिर रीमा गुप्ता को हटाकर जनाना अस्पताल चांदपोल से प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. नमिता कंवर को लगाया। डॉ. नमिता ने तीन माह बाद तबादला आदेश निरस्त करवा लिया। अब जनाना अस्पताल जयपुर की डॉ. सुधा गुप्ता को लगाया गया। उन्होंने आज तक कार्यभार ग्रहण नहीं किया। ओटी पर लटका ताला-अस्प्ताल में सर्जरी विशेषज्ञ चिकित्सक के नहीं होने से अस्पताल का ऑपरेशन थिएटर भी बेकार साबित हो रहा है। सर्जरी चिकित्सक नहीं होने से प्रतिवर्ष ऑपरेशन के लिए आने वाले औजार और दवाईयां बेकार हो जाती हैं। अस्पताल में आपॅरेशन थियेटर को बने करीब एक दशक हो गया है। जननी शिशु सुरक्षा वार्ड की हालत भी खराब है। वार्ड के अधिकांश बैड खराब है। अधिकांश बेडों पर चद्दर नहीं बिछी हुई है। जच्चा-बच्चा के बैड पर रोजाना चादर नहीं बदली जा रही हैं। यहां भर्ती प्रसुताओं ने बताया कि वार्ड में मच्छरों की भरमार है। प्रसूता परेशान रहती हैं।
बस्सी- इमरजेंसी में आओ, तो सीधे जयपुर जाओ
राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र बस्सी में तो इमरजेंसी में चिकित्सा सेवा जैसे 'भगवान भरोसेÓ है। इमरजेंसी में आने वाले मरीज खुद इसकी पुष्टि करते हैं। यहां भी यहां कनिष्ठ विशेषज्ञ, सीनियर मेडिकल ऑफिसर और मेडिकल ऑफिसर सहित चिकित्सकों के कुल ११ पद और सभी भरे हुए हैं, फिर भी इमरजेंसी के अधिकांश केस एसएमएस जयपुर रैफर किए जाते हैं। इनमें से ज्यादातर मामले सिजेरियन प्रसव और दुर्घटना ग्रस्त मरीजों के होते हैं। यहां कनिष्ठ सर्जरी विशेषज्ञ का पद स्वीकृत नहीं होने से यह समस्या आ रही है। ओपीडी में अव्वल, फिर भी ऐसे हालमहिला मरीजों का कहना है कि यहां इमरजेंसी में महिला चिकित्सक की सेवा नहीं मिल पाती। इसका मुख्य कारण सीएचसी बस्सी में एक मात्र महिला चिकित्सक का होना है। वो भी बतौर एमओ। जानकारों की मानें, तो ओपीडी अधिक होने से इन महिला एमओ की ड्यूटी दिन में रहती है। देर शाम या रात को इनकी सेवाएं नहीं मिल पाती। वहीं, प्रसव के लिए आने वाली महिलाएं महिला स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ की मांग करती हैं। सीएचसी में खुद प्रभारी स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ हैं।

ये हालात हैं जमवारामगढ़ और बस्सी हैडक्वार्टर सीएचसी के। जहां औसतन ८०० से १००० तक प्रतिदिन की ओपीडी के बावजूद सर्जरी विशेषज्ञ नहीं है। इसका सीधा-सीधा खामियाजा इमरजेंसी में आने वाली प्रसूता और दुर्घटनाओं के गंभीर घायलों को उठाना पड़ रहा है।

ये हालात हैं जमवारामगढ़ और बस्सी हैडक्वार्टर सीएचसी के। जहां औसतन ८०० से १००० तक प्रतिदिन की ओपीडी के बावजूद सर्जरी विशेषज्ञ नहीं है। इसका सीधा-सीधा खामियाजा इमरजेंसी में आने वाली प्रसूता और दुर्घटनाओं के गंभीर घायलों को उठाना पड़ रहा है।

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