youth : 8 साल से गौशाला में हर दिन दो घंटे, बदली तस्वीर

2 घंटे के प्रतिदिन श्रमदान से गोसेवा का नजारा देखते बनता, गायों के लिए आईसीयू क मरा भी किया तैयार

By: Gourishankar Jodha

Published: 12 Jul 2020, 08:40 PM IST

पावटा। अगर इंसान कुछ कर गुजरने की ठान ले तो क्या नहीं कर सकता, मानव अगर ठान ले तो, पत्थर पानी बन जाता है। यह पंक्ति कस्बे की करीब 70 साल पुरानी श्रीकृष्ण गौशाला पर सटीक बैठती है। करीब 8 साल पहले कस्बे के चंद युवकों ने इस गौशाला में रहने वाली गायों की दशा देखी तो उनके मन में गौशाला को बेहतर बनाने का संकल्प लिया, तभी से हर दिन 2 घंटे गौशाला में श्रमदान कर गायों की सेवा करने का बीड़ा उठाया, जिसके परिणाम स्वरूप गौशाला के दिन फिरने लगे, गायों की घरो में रहने वाली दुधारू गायो से भी बेहतर सेवा होने लगी।

5 सालों में तीगुनी हुई गायें
समाजसेेवी जगन्नाथप्रसाद गौड व नर्मदाशंकर मिश्र आदी के प्रयासों से शुरू हुई इस गौशाला में गायों की संख्या गत 5 सालों में तीगुनी 450 हो गई। गायों को बेहतर चिकित्सा सुविधा मिले, इसके लिए एक आईसीयू कक्ष का निर्माण किया गया। सुबह 5 बजने के साथ करीब २५ जनों की गौसेवा करने वालों की टीम गौशाला परिसर में पहुंच कर सबसे पहले को गौशाला परिसर में पड़े गोबर आदी को साफ करती है। गोसवामणी को चारे में आटे के साथ मिलाया जाता है व गायों को चरने के लिए खोला जाता है। चारा चरने के बाद गायों को पानी पिलाया जाता है।

जन सहयोग से चारागृह का निर्माण
गत डेढ़ साल पहले तत्कालीन सरपंच पूजा अग्रवाल ने प्रयास कर पूर्व विधायक डॉ.फूलचन्द भिण्डा से विधायक कोष से चारागृह निर्माण के लिए करीब ७.७५ लाख की राशि स्वीकृत करवाई थी, जिसका निर्माण कार्य गौशाला के कार्यकर्ताओं ने दौड़-धूप कर गत माह शुरू करवाया है। इस स्वीकृत राशि में चारागृह का निर्माण संभव नहीं होने के कारण जन सहयोग से शेष राशि का संग्रहण किया जा रहा है।

प्रतिदिन गोसवामणी करने का लेना पड़ता नंबर...
गौशाला में रोज गुड़, बाजरा, दलिया, तेल आदी डाल कर गोसवामणी के नाम से सुबह चारे साथ यह पौष्टिक आहार दिया जाता है। इसे गो सवामणी का नाम दिया गया है। एक दिन की गोसवामणी के लिए 2100 रुपए लिए जाते है, जिसके लिए गोसवामणी करने वाले का अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। इस सवामणी मेें 60किला दाना डाला जाता है। करीब ४ बीघा में फैली इस गौशाला में गायों के लिए पूरे लॉकडाउन काल में करीब डेढ़ लाख की हरी सब्जी जन सहयोग से गोवंश को खिलाई गई। कई भामाशाह हरा चारा भी गौशाला में भेजते है। जमीन के अभाव में गौशाला को हरा चारा पैदा करने में परेशानी आती है।

गुप्त दान को महत्व...
इस गौशाला में गायों की चिकित्सा के लिए एक ही जना पूरी दवा देता है, लेकिन उसका नाम गौशाला के स्वयं सेवकों तक ही समिति है। इसी प्रकार अनाज व दाना कब व किसके द्वारा आता है यह बात भी गुप्त ही है। हाले में एकबछड़ा गृह का निर्माण करवाया गया था, निर्माणकर्ता ने इसमें भी अपना नाम गुप्त ही रखा है। गौशाला में दुधारु गाये होने के कारण रोज करीब 30 किलो दूध बेचा जाता है। इस दूध में से यहां काम करने वाले श्रमिकों के बच्चों को भी दिया जाता है।

पत्रिका ने भी सहयोग किया था...
करीब ६ साल पहले पत्रिका के हरियालो राजस्थान कार्यक्रम के तहत गौशाला परिसर में कई पौधे लगाए गए थे जो आज बड़े हो गए है।

किसान-व्यापारियों व भामाशाहों के दम पर गौशाला संचालन...
इस गौशाला में चारे दाने आदी पर रोज 12 हजार रुपये का खर्चा आता है, जिसको किसान पावटा व्यापार मंडल व भामाशाह के सहयोग से वहन किया जाता है। राजकीय सहायता नहीं मिल पाती उल्टा राजमार्ग वाहनों में अवैध रूप ये गोवंश ले जाते हुए पुलिस द्वारा पकड़े जाने वाले वाहनों से बरामद गोवंश को गौशाला के हवाले कर दिया जाता है। इस गौशाला में लगे ये नवयुवक रोज भामाशाहों से सम्पर्क साध कर चारे पानी की व्यवस्था करते है। कई स्वयं सेवक बिना अपने साथियों को बताए हुए अत्यावश्यक परिस्थितियों मेें स्वयं की तरफ से चारे की व्यवस्था भी कर रहे है।

Gourishankar Jodha
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