साधन मिले ना मिले, बस घर जाने की जिद

कोरोना : लोगों को घरों में रहने की सलाह दी गई है लेकिन बाहर अटके लोग अपने घर जाने के लिए चल रहे है पैदल

By: Bhagwat

Published: 10 May 2020, 12:52 PM IST

ब्यावर. लोग बड़ी उम्मीदों के साथ अपनी जन्मभूमि को छोड़कर कर्मभूमि की ओर बढ़े थे। ताकि वों कुछ कमाकर अपने एवं अपने परिवार के लिए बेहतर कर सके। कोरोना के चलते लॉक डाउन ने उनके सारे सपनों को ही धूमिल कर दिया। कुछ दिन सोचा कि रुके तो काम मिलेगा। काम नहीं मिलने पर एवं समस्याएं बढ़ी तो अपनों तक पहुंचना ही सही समझा। यहीं कारण है कि लोगों को साधन नहीं मिला तो पैदल ही अपने घरों की ओर रवाना हो गए। यह सिलसिला करीब सवा माह से चल रहा है। अब भी यह सिलसिला नियमित रुप से चल रहा है। हालात यह है कि कंधे अपना बैग, तपती दोपहरी, पसीने की टपकती बूंदों के साथ एक ही लक्ष्य है। जिसको जिद बना लिया है कि साधन मिले या नहीं मिल। बस घर तक पहुंचना है। शहर के बाइपास पर ऐसे ही सात-आठ लोगों का एक दल जाता हुआ नजर आया। इन लोगों से चलते-चलते बात की तो इनका कहना था कि गुजरात से आए है। सोचा कि साधन मिलेगा। साधन नहीं मिला तो पैदल ही निकल दिए। यहां तक आने में करीब बीस दिन का समय लग गया है। अपने घर तक पहुंचने में कितना समय लगेगा लेकिन इसके अलावा कोई चारा भी तो नहीं है। उद्योग चलाने की अनुमति मिली तो श्रमिक नहीं...अब उद्योग चलाने की अनुमति मिली। लॉक डाउन के चलते अधिकांश श्रमिक अपने-अपने गांवों की ओर कू  ंच कर गए है। जिन कठिन परिस्थितियों को देखा। ऐसे में हालत सामान्य होने तक वापस आने की हिम्मत नहीं होगी। अब एक बार हर व्यक्ति इस वैश्विक महामारी का रुख को देखेंगे। इसे बाद ही जाने या नहीं जाने का निर्णय कर सकेंगे। काम मिला न वापस जाने को साधनउतरप्रदेश के फरुखाबाद निवासी सत्येन्द्र शर्मा, रणवीरसिंह कुशवाह, प्रमोद शर्मा एवं शानू कुशवाह लॉक डाउन के कुछ दिन पहले ही राजकोट काम की तलाश में पहुंचे। यह काम की तलाश ही कर रहे थे कि लॉक डाउन ने सब कारोबार पर ही लॉक लगा दिया। ऐसे में राजकोट में पहचान नहीं होने एवं रहने व खाने की व्यवस्था नहीं होने पर वापस आने के लिए साधनों की तलाश की। कोई साधन इन युवकों को अपने घर तक जाने के लिए नहीं मिला। इन युवकों ने वहां से पुरानी सी साइकिल खरीदी। उस पर सवार होकर अपने गांव की माटी के लिए रवाना हो गए। सात दिन में करीब साइकिल पर सात सौ किलोमीटर का फासला तय कर तीन दिन पहले ब्यावर पहुंचे। यहां से भी साधन नहीं मिलने पर आगे भी साइकिल पर ही रवाना हो गए।

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