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पिछवाई चित्रकारी के बढ़े कद्रदान पर घट गए चित्रकार

पिछवाई चित्रकारी में ब्यावर का नाम था- कभी 250 चित्रकार थे, अब 50 भी पूरे नहीं- चित्रकारों को खल रही है आर्ट गैलेरी की कमी

ब्यावर

Published: November 28, 2021 09:07:41 pm

ब्यावर. दो दशक पूर्व तक पिछवाई चित्रकारी में ब्यावर का नाम था लेकिन चित्रकारी का पर्याप्त मेहनताना नहीं मिलने के कारण चित्रकारों का अब मोहभंग होने लगा है। इस बात का अन्दाज इसी से लगाया जा सकता है कि दो दशक पूर्व तक यहां पर करीब ढाई सौ चित्रकार थे लेकिन आज पचास भी पूरे नहीं है। ऐसा नहीं है कि चित्रकारी की डिमांड नहीं है या मांग घटी है लेकिन सीधा ग्राहक का चित्रकार से जुड़ाव नहीं होने के कारण ऐसी स्थितियां बनी है। मुगल चित्रकारी के साथ पिछवाई चित्रकारी 1976 से सन 2000 तक खूब चली। बताया जाता है कि सालों पहले जयपुर राजघराने एवं उदयपुर राजघराने के चित्रकारों ने तिलकायत के बताए अनुसार पहली पिछवाई चित्रकारी की थी। बाद में यह परम्परा आगे नियमित रुप से चलती रही। पहले पिछवई चित्रकारी को भगवान के मंदिर में ही लगाई जाती थी। लेकिन अब यह घर, होटल, सराय एवं कार्यालय तक पहुंच गई। इस चित्रकारी के विविध रुपों को लगाने की प्रति लोगों की ललक बढी है। लेकिन चित्रकारों तक सीधे ग्राहकों का जुडाव नहीं होने से चित्रकारों को नियमित रुप से आय नहीं मिल पाती है। यहीं कारण कि पहले करीब ढाई सौ से ज्यादा चित्रकार थे लेकिन अब मार्केट में डिमांड तो है लेकिन दाम वाजिब नहीं मिल पाते। ऐसे में धीरे धीरे इनकी संख्या घट गई। आज पचास भी नहीं है। चित्रकारों का मानना है कि अगर शहर में कोई आर्ट गैलेरी हो तो वहां पेन्टिंग का प्रदर्शन कर सीधे ग्राहक से जुड़ा जा सकता है और इसमें उनको चित्रकारी का पूरा मेहनताना भी मिलने के आसार है। आर्ट गैलेरी बनने पर इधर से गुजरने वाले इसके कद्रदान उसको देख सके एवं पसंद के अनुरुप खरीदारी कर सके।
यह है पिछवाई चित्रकारी
वल्लभ संप्रदाय के उद्भव के साथ ही पिछवाई चित्रकारी का चलन बढ़ा जो 500 से अधिक वर्षों से अब तक चल रही है। पिछवाई चित्रकारी ठाकुर जी के विग्रह की पृष्ठभूमि में लगने वाले इन चित्रों से विभिन्न ऋतुओं, उत्सवों का प्रभाव भांति भांति के रंगों के माध्यम से पैदा करने का काम करती हैं। महारास शरद ऋतु के आगमन पर गोपियों संग भगवान कृष्ण का अलौकिक नृत्य है।
ऐसे बनती पिछवाई पेंटिंग
वैष्णव मंदिरों में भाव स्वरूप सुसज्जित होने वाले पिछवाई चित्रण के लिए सबसे पहले हाथ से बुना मोटा व खुरदरा सूती वस्त्र लेते हैं। फिर अरारोट को उबालकर लेई तैयार की जाती है। इस वस्त्र पर लेई लगाई जाती है। इसे कलफ या मांड लगाना कहते हैं। कपड़ा सूखने के बाद चिकना बनाने के लिए हकीक पत्थर से रगड़ा जाता है। इसपर चित्रकारी करने से पहले मां सरस्वती की वंदना की जाती है। ब्रश के साथ हल्के गेरू रंग से विभिन्न आकारों की कच्ची लिखाई रेखांकित की जाती है। इसके लिए रंग खनिज मिट्टी, देशी गोंद व पानी मिलाकर तैयार किए जाते हैं। गेरू, सिंदूर, प्यावड़ी, नील, सिंदूर, हरा दाना, काजल और सफेदा (खडिय़ा) का इस्तेमाल किया जाता है। चित्रण में भराई के लिए स्वर्ण रंग लेते हैं।
पाठयक्रम में नहीं, चल रही गुरु-शिष्य परम्परा
पिछवई कला को लेकर किसी पाठयक्रम में शामिल नहीं है। यह परम्परा सालों से गुरु-शिष्य परम्परा के अनुरुप ही चली आ रही है। इसमें जिनकों इस कला को सीखना होता है। वों चित्रकार के साथ रहकर सीखते है। इस काल को बचाने के लिए पाठयक्रम में शामिल किया जाए तो इस कला को मजबूती मिल सकती है।
राष्ट्रपति ने किया सम्मान
वर्ष 2011 में ब्यावर के चित्रकार कल्याणमल साहू को श्री कृष्ण के महारास की पेन्टिंग के लिए राष्ट्रपति ने सम्मानित किया था। इस पेंटिंग में 250 गोपियां हैं और सभी के चेहरे अलग-अलग हैं। इन सब के बीचो-बीच भगवान श्रीकृष्ण हैं। गोपियों और भगवान कृष्ण के वस्त्रों पर सोने की बारीक डिजाइन बनाई गई है। पेंटिंग में पारंपरिक देशी प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया गया है।
आर्ट गैलेरी बनाई जानी चाहिए
हमारे से पेन्टिंग सीधे ग्राहक नहीं खरीदते बल्कि व्यापारियों के जरिए बेची जाती है। व्यापारी मनमर्जी से दाम तय करते है और कलाकार को पूरा मेहनताना नहीं मिल पाता। ऐसे में कलाकार या तो कलाकारी छोड़ देता है या फिर मजबूर होकर जो दाम व्यापारी तय करता है, बेचनी पड़ती है। सीधे ग्राहक चित्रकारों को मिल सके, इसके लिए पेन्टिग गैलेरी बनाई जानी चाहिए।
-कल्याणमल साहू, चित्रकार
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