ये हैं नेत्रहीन शिक्षक ओमप्रकाश, पिछले 13 साल से बिना छुट्टी मारे, बस में सफर करते, छड़ी के सहारे पहुंच जाते हैं स्कूल, ताकि गांव का हर बच्चा पढ़ सके

नेत्रहीन शिक्षक (Blind Teacher in Bemetara) के कार्यों की तारीफ साथी भी करते हैं। शिक्षक ओमप्रकाश ने दिव्यांगता (Disablity) को जीवन की बाधा मानकर निराश होने के बजाए चुनौती मानकर जीने की बात कही है।

By: Dakshi Sahu

Updated: 05 Sep 2019, 12:29 PM IST

संजय दुबे @बेमेतरा. जिले के कोदवा प्राथमिक स्कूल में असाध्य बीमारी से आंख खोने वाले नेत्रहीन शिक्षक ओमप्रकाश साहू बच्चों को पढ़ाकर शिक्षा की अलख जगा रहा है। 13 वर्षों से स्कूल में पदस्थ रहते हुए उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। शिक्षक के कार्यों की तारीफ साथी भी करते हैं। शिक्षक ओमप्रकाश ने दिव्यांगता को जीवन की बाधा मानकर निराश होने के बजाए चुनौती मानकर जीने की बात कही है। (Teachers Day 2019)

जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर दुर्ग-बेमेतरा मार्ग पर बसे कोदवा प्राथमिक स्कूल के शिक्षक ओमप्रकाश साहू नेत्रहीन होने के बाद भी दूसरे शिक्षकों की तरह रोजाना स्कूल पहुंच कर बच्चों को पढ़ाते हैं। दुर्ग से बस से आने के बाद गांव के चौक से लोगों की सहायता से स्कूल पहुंचते हैं और अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

आंख का 10 साल तक कराया उपचार
शिक्षक ओमप्रकाश साहू ने बताया कि वे 1994 में दसवीं में थे, तब उन्हें झटका आया अैार फिर धीरे-धीरे उनकी दोनों आंखों की रोशनी कम हो गई। बाद में पूरी तरह दिखना बंद हो गया। लाइलाज बीमारी रेटिना पिग मेल्ट टोसा होने की वजह से ऐसा हुआ। इस बीमारी का आज तक उपचार नहीं है।

साल 2004 के दौरान उन्होंने पत्राचार से दसवीं की परीक्षा पास की। फिर 2006 में कक्षा 12वीं की परीक्षा पास की। तभी उनकी नौकरी भी लग गई। पहली नियुक्ति कोदवा में ही हुई। तब से 13 साल हो गए वे यहीं पदस्थ हैं। जब उन्हें पूरी तरह दिखना बंद हो गया था वे पूरी तरह निराश हो चुके थे। पर 2004 के दौरान एक बार फिर कदम आगे बढ़ाया था जिसमें वे सफल हो गए।

ये हैं नेत्रहीन शिक्षक ओमप्रकाश, पिछले 13 साल से बिना छुट्टी मारे, बस में सफर करते, छड़ी के सहारे पहुंच जाते हैं स्कूल, ताकि गांव का हर बच्चा पढ़ सके

बस में सफर करके पहुंचे है रोजाना स्कूल
जिले के एकमात्र नेत्रहीन शिक्षक के कार्यों को लेकर पूर्व कलेक्टर महादेव कावरे ने उन्हें बुनियाद कार्यक्रम के तहत सम्मानित किया। इसके आलावा दुर्ग में 2015 के दौरान आयोजित कार्यक्रम में दुर्ग में दुर्ग रत्न से सम्मानित किया गया था। सम्मान मिलने के बाद भी आज भी उनके परिजन उन्हें दुर्ग बस स्टैंड छोडऩे आते हैं। बस का सफर कर कोदवा आने के बाद साथियों की मदद या फिर डंडे के सहारे वे स्कूल पहुंचते हैं। साथी शिक्षक गायत्री वर्मा, चंद्रकुमार मारकंडेय ने जानकारी दी कि शिक्षक को विषम समय में ही मदद की आवश्यकता पड़ती है। रोजाना अध्यापन के लिए स्कूल में सक्रिय रहते हैं।

ब्लैक बोर्ड पर लिखकर पढ़ाते हैं ओम
पत्रिका टीम के साथ अपने स्कूल में शिक्षक ओमप्रकाश ने कक्षा दूसरी में पहुंच कर बच्चों को ग्रीन बोर्ड में चाक से लिख कर पढ़ाया भी और चाक से लिख कर बच्चों से पूछकर जानकारी भी ली। इस दौरान आम शिक्षकों की तरह वे कक्षा में जाकर चाक से लिखते हैं। अध्यापन में दृष्टि बाधित होना उनके कभी आड़े नहीं आया। पूछे जाने पर बच्चों के पालकों ने भी बताया कि आंखों में रोशनी नहीं होने के बावजूद शिक्षक ओमप्रकाश बच्चों को भलीभांति पढ़ा लेते हैं।

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