१३वां ज्योर्तिलिंग निखिल पारद्वेश्वर मंदिर बैतूल में बन रहा

पंचधातुओं से निर्मित और वैदिक मंत्रों से प्राण-प्रतिष्ठत २१ किलो वजनी पारद युक्त शिवलिंग की स्थापना बैतूल में १३वें ज्योर्तिलिंग निखिल पारद्वेश्वर के रूप में की गई है। २७ साल पहले इस शिवलिंग का निर्माण गुरुधाम जोधपुर में सद्गुरुदेव डॉ नारायण दत्त श्रीमाली द्वारा किया गया था। उन्होंने दो शिवलिंग बनाए थे। जिसमें से एक १९९५ में राष्ट्रपति को भेंट किया गया था। जबकि दूसरा मध्य भारत का केंद्र बिंदु होने के कारण १९९७ में बैतूल में स्थापित किया गया।

By: Devendra Karande

Published: 03 Aug 2020, 04:02 AM IST

बैतूल। पंचधातुओं से निर्मित और वैदिक मंत्रों से प्राण-प्रतिष्ठत २१ किलो वजनी पारद युक्त शिवलिंग की स्थापना बैतूल में १३वें ज्योर्तिलिंग निखिल पारद्वेश्वर के रूप में की गई है। २७ साल पहले इस शिवलिंग का निर्माण गुरुधाम जोधपुर में सद्गुरुदेव डॉ नारायण दत्त श्रीमाली द्वारा किया गया था। उन्होंने दो शिवलिंग बनाए थे। जिसमें से एक १९९५ में राष्ट्रपति को भेंट किया गया था। जबकि दूसरा मध्य भारत का केंद्र बिंदु होने के कारण १९९७ में बैतूल में स्थापित किया गया। वर्तमान में पारद शिवलिंग ग्राम चिखलार के गुरुआश्रम में स्थापित है। शिवलिंग की विधिवत स्थापना के लिए यहां भव्य मंदिर का निर्माण कराया जा रहा है। जिसका नक्शा उड़ीसा के शिल्पकारों द्वारा तैयार किया गया है।
२१ पंडि़तों ने की थी प्राण-प्रतिष्ठा
गुरुधाम जोधपुर में सद्गुरुदेव डॉ नारायण दत्त श्रीमाली द्वारा २१-२१ किलो वजनी दो पारद शिवलिंगों का निर्माण किया गया था। इसके साथ 501 छोटे पारद शिवलिंग भी बनाए गए थे। महाकाल की नगरी उज्जैन में सद्गुरुदेवजी डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली का तीन दिवसीय शिविर का आयोजन किया गया था। जिसमें इन शिवलिंगों को लाया गया था। सर्वप्रथम गुरुदेव द्वारा २१ किलो पारद शिवलिंग पर अभिषेक किया उसके पश्चात 21 पंडितों द्वारा शिवलिंग की विशिष्ट मंत्रों से सद्गुरुदेव के सानिध्य में प्राण-प्रतिष्ठा विधि विधान से की गई।
बैतूल को १३वां ज्योतिर्लिंग निखिल पारद्वेश्वर घोषित किया
साधक कमलाकर धाड़से ने बताया कि 1993 से 1997 तक यह शिवलिंग भोपाल में रहा। फिर अचानक नया मोड़ आया 21 अप्रैल 1997 भोपाल शिविर में सद्गुरुदेव डां.नारायण दत्त श्रीमाली द्वारा उनके जन्मदिन पर रात्रि 8 बजे के लगभग इस शिवलिंग को स्थापित जगह से बुलवाया गया और इस शिवलिंग को बैतूल के वरिष्ठ गुरू भाई जनकलाल मवासे के सिर पर एक थारी में रखकर बैतूल जाने का आदेश दिया गया। सदगुरुदेव ने भारत का नक्शा बुलाकर बैतूल को सिद्धाश्रम जिला घोषित किया और पारद शिवलिंग को 13 वां ज्योतिर्लिंग निखिल पारद्वेश्वर घोषित किया । बैतूल के शिष्यों ने सोलह एकड़ जमीन सन् 2000 में खरीदी और उस जमीन पर भारत का ऐतिहासिक मंदिर 13 वां ज्योतिर्लिंग निखिल पारद्वेश्वर का निर्माण प्रारम्भ किया।इसका नक्शा उड़ीसा के शिल्पकारो द्वारा प्राचीणतम मंदिरों को देखकर बनाया गया।
बैतूल को पारद शिवलिंग स्थापना के लिए ऐसे चुना
चूंकि यह मंदिर मध्य भारत वर्ष के केन्द्र बिन्दु पर स्थापित हो रहा है एवं रामेश्वर से उज्जैन होते हुए एक सीधी रेखा खिंची जाए तो एक ही लाइन पर स्थापित है। शायद इन्हीं सब कारणों से सदगुरुदेव डां नारायण दत्त श्रीमाली द्वारा इस शिवलिंग को यहां स्थापित किया गया। यहां मंदिर निर्माण का काम भी शुरू हो गया है। जब नींव का कार्य प्रारंभ हुआ था ,तब गुरूधाम जोधपुर से गुरूदेव के मार्गदर्शन में नींव में 128 यंत्र गुरू धाम जोधपुर से मंगा कर स्थापित किए गए। जिसमें मुख्य यंत्र श्री यंत्र -64 ,वास्तु कृत्या यंत्र , कनकधारा यंत्र , कुबेर यंत्र ,काली यंत्र ,दसमहाविधा यंत्र एंव भैरव यंत्र प्रमुख हैं। यह सभी यंत्र दक्षिण के बालाजी मंदिर के नींव में भी स्थापित है।

Devendra Karande Reporting
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