किसानों को प्रति हेक्टेयर 51 रुपए अतिरिक्त डीजल पर करना पड़ रहा खर्च

पेट्रोल-डीजल के दाम में लगी आग ने किसानों की खेती से गणित गड़बड़ा दिया है। बीते ११ दिनों में डीजल के दाम ७ रुपए ३४ पैसे तक बढ़ गए हैं। प्रतिदिन डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी जारी है। किसानों को खेत में ट्रैक्टर से जुताई के लिए प्रति हेक्टेयर ५० रुपए ३८ पैसे अतिरिक्त डीजल पर खर्च करना पड़ रहे हैं।

By: Devendra Karande

Published: 24 Jun 2020, 05:04 AM IST

बैतूल। पेट्रोल-डीजल के दाम में लगी आग ने किसानों की खेती से गणित गड़बड़ा दिया है। बीते ११ दिनों में डीजल के दाम ७ रुपए ३४ पैसे तक बढ़ गए हैं। प्रतिदिन डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी जारी है। किसानों को खेत में ट्रैक्टर से जुताई के लिए प्रति हेक्टेयर ५० रुपए ३८ पैसे अतिरिक्त डीजल पर खर्च करना पड़ रहे हैं। जो स्थिति है उसमें इस साल कृषि विभाग ने खरीफ का रकबा ४ लाख १० हजार हेक्टेयर से बढ़ाकर ४ लाख १५ हजार हेक्टेयर कर दिया है। जिले में २ लाख हेक्टेयर क्षेत्र में भी यदि किसान ट्रैक्टर के माध्यम से बोवनी करते हैं तो इस हिसाब से १४ लाख ६८ हजार डीजल अतिरिक्त खर्चा आएगा। वर्तमान में डीजल के दाम ७९ रुपए २६ पैसे प्रति लीटर है। जबकि ग्यारह दिन पहले डीजल के रेट ७१ रुपए ९२ पैसे हुआ करते थे।
लॉक डाउन खत्म होते ही डीजल में हुई बढ़ोत्तरी
लॉक डाउन खत्म और अनलॉक वन शुरू होते ही डीजल की कीमतों में भी उछाल आने लगा। एक जून को जिले में डीजल के रेट जहां ६८.५० रुपए प्रति लीटर थे, जो २३ जून को बढ़कर ७९ रुपए २६ पैसे हो गए हैं। देखा जाए तो पिछले ११ दिनों के अंतराल में डीजल की कीमत में ७.३४ रुपए तक का उछाल आया है। १२ जून को डीजल की कीमत ७१ रुपए ९२ पैसे थी। जिसके बाद डीजल की कीमतों में प्रतिदिन उछाल आता जा रहा है। खरीफ सीजन में जब बोवनी का समय चल रहा है ऐसे में डीजल के दामों में आए इस उछाल ने किसानों के लिए परेशानी खड़ी कर दी है।
४.१५ लाख हेक्टेयर है खरीफ का रकबा
जिले में इस साल खरीफ सीजन में बोवनी का रकबा पिछले साल की तुलना में ४ लाख १० हजार हेक्टेयर से बढ़ाकर ४ लाख १५ हजार हेक्टेयर कर दिया गया है। बारिश शुरू होते ही जिले में बोवनी का काम भी शुरू हो चुका हैं। करीब ७५ फीसदी बोवनी का काम हो चुका है। बैतूल ट्रायवल जिला हैं इसलिए यहां के ज्यादातर किसान परंपरागत साधनों (बैलों)से खेती करते हैं। करीब सवा दो लाख हेक्टेयर क्षेत्र में परंपरागत साधनों से ही खेती की जाती है। जबकि शेष दो लाख हेक्टेयर में ट्रैक्टरों के माध्यम खेती होती है। मान लिया जाए प्रति हेक्टेयर जुताई में ७ लीटर डीजल लगता है तो २ लाख हेक्टेयर क्षेत्र की जुताई में १४ लाख लीटर डीजल की खपत होगी। पिछले ११ दिनों में प्रति लीटर डीजल में जो ७ रुपए ३४ पैसे की बढ़ोत्तरी हुई है उस हिसाब से १४ लाख लीटर डीजल की खपत में किसानों पर अतिरिक्त १ करोड़ २७ लाख ६ हजार रुपए का खर्च आएगा।
बड़ा सवाल: कैसे खेती बनेगी लाभ का धंधा
किसान रमेश गायकवाड़ का कहना था कि समर्थन मूल्य पर किसानों की उपज खरीदी में भारी गड़बड़ी की गई। किसानों को गेहूं-चने का पैसा तक नहीं दिया गया है। किसानों पर कर्ज का बोझ हर साल बढ़ते जा रहा है। मंडी में किसानों को उपज के सही दाम नहीं मिलते हैं। खाद-बीज भी महंगा हो गया है। डीजल के रेट भी सरकार बढ़ते जा रही है। ऐसे में जिले के किसानों से खेती को लाभ का धंधा बनाए जाने की उम्मीद लगाना बेमानी होगा। सरकार के आर्थिक पैकेज में भी किसानों के लिए ढेरों घोषणाएं की गई और लंबे-चौड़े दावे किए गए लेकिन यह सब दूर के ढोल सुहाने जैसे ही प्रतीक हो रहा है। आज डीजल की बढ़ती कीमतों को लेकर न तो कोई बोल रहा है और न ही प्रदर्शन किए जा रहे हैं। सारी तकलीफे किसानों तक आकर थम जाती है।
दो बार होती है डीजल की खपत
किसानों को खेती के लिए दो बार टै्रक्टर को उपयोग करता पड़ता है। बोवनी के लिए पंजा और एक बार सीडड्रिल के लिए ट्रैक्टर चलाना पड़ता है। इससे दो बार डीजल की खपत होती है। मान लिया जाए कि जिले में २ लाख हेक्टेयर में बोवनी का काम ट्रैक्टर के माध्यम से होता है तो प्रति हेक्टेयर ७ लीटर डीजल खपत के आधार पर कुल १४ लाख लीटर डीजल की खपत होती। यानि ११ करोड़ ९६ लाख ४ हजार रुपए का डीजल अकेले जलेगा। जिस तरह से डीजल के रेट में पिछले ११ दिनों में ७ रुपए ३४ पैसे तक का उछाल आया है उस हिसाब से किसानों पर खेती का बोझ दिन व दिन बढ़े जा रहा है। यह हिसाब तो सिर्फ खेत में जुताई का हैं यदि किसान गोदाम से उवर्रक ट्रैक्टर में लाता है तो उस हिसाब से खर्चा कहीं दोगुना होगा।

Devendra Karande Reporting
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