बार-बार हो रही बारिश से खेती पर असर, इस बार नहीं लग सकी डंगरबाड़ी

पारंपरिक खेती से किसानों का हो रहा मोह भंग

By: yashwant janoriya

Published: 11 Feb 2020, 11:11 PM IST

सारनी. जनवरी माह में लगाई जाने वाली डंगरबाड़ी इस साल किसानों ने फरवरी माह में भी नहीं लगाई। वजह हर माह हो रही बरसात और नदियों में पानी होना व बाढ़ आना है।किसान नितिन कहार बताते हैं कि नदी में पानी कम नहीं होने व बार-बार आ रही बाढ़ के चलते डंगर, तरबूजबाड़ी नहीं लगाई है।
हालांकि इस माह के अंत तक मौसम साफ रहा और बरसात नहीं हुई तो डंगरबाड़ी लगा सकते हैं। मार्च माह के बाद मुश्किल से ही फसल लगाई जा सकती है। उन्होंने बताया अमूमन दिसंबर माह में खेत तैयार किए जाते हैं और जनवरी माह में अंकुरित बीज लगाते हैं। नदी में बाढ़ और पानी की वजह से इस साल फसल दो माह देरी से लगाने की तैयारी है।
करीब 60 वर्षों से तवा और दूधिया नदी में आसपास के किसान पारंपरिक खेती करते आ रहे हैं। वैसे तो यह खेती जोखिम भरी होती है, लेकिन पारंपरिक होने की वजह से आज भी किसान नदियों में डंगरबाड़ी लगाते हैं। तवा और दूधिया नदी में 58 किसान अधिकृत रूप से डंगरबाजी की खेती करते हैं। इस वर्ष किसी भी किसान ने डंगरबाड़ी नहीं लगाई।
नदी में बाढ़ आने से फसल हो रही बर्बाद
डंगरबाड़ी लगाने वाले किसान बताते हैं कि बीते पांच वर्षों से लगातार नदी में बाढ़ आने के चलते नुकसान हो रहा है। हालांकि बीज के रुपए निकल जाते हैं। मुनाफा नहीं हो पाता। वहीं मेहनत बेकार हो जाती है। किसी साल मौसम ने साथ दिया तो 1-1 लाख रुपए तक मुनाफा भी होता है। बीते कुछ सालों से लगातार मौसम की मार और नदी में बाढ़ आने से फसल बर्बाद हो रही है। इस साल दिसंबर, जनवरी और फरवरी माह में लगातार बरसात होने से डंगरबाड़ी नहीं लगाई। दरअसल एक बाड़ी लगाने में करीब 30 हजार रुपए खर्च आता है।
डंगरबाड़ी के साथ लगाते हैं सब्जी
सतपुड़ा की पहाडिय़ों से निकलने वाली तवा और दूधिया नदी में कहार समाज के लोग तरबूज, डंगरा, खीरा, टिंडे, गिलकी, लौकी और कद्दू की खेती करते हैं। डंगरबाड़ी बहने पर सब्जियों से खर्च निकाल लेते हैं। दरअसल, तरबूज के बीज 20 हजार रुपए किलोग्राम तक रहते हैं। यह महंगे होते हैं, जबकि बाढ़ में बाड़ी बहने पर मुआवजे के रूप में 2 से 5 हजार तक ही मिलते हैं। यही वजह है कि इस साल किसानों ने जोखिम नहीं उठाया। प्रतिमाह बरसात और बाढ़ आने का असर देनवा नदी में दिखा। खेती करने वाले किसानों ने इस वर्ष तरबूज, डंगरबाड़ी नहीं लगाई।

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