डीजे के दौर में विलुप्त होने के कगार पर कजरी दंगल

डीजे के दौर में विलुप्त होने के कगार पर कजरी दंगल

Mohd Rafatuddin Faridi | Publish: Sep, 04 2018 09:33:13 PM (IST) Bhadohi, Uttar Pradesh, India

आजादी के समय देशभक्तों में जोश भरने के लिये भी कजरी का हुआ करता था इस्तेमाल।

महेश जायसवाल

भदोही. हमारे देश के अलग अलग हिस्सों में कई तरह के लोकगायन होते आ रहे है लेकिन अब आधुनिकता के दौर में यह खत्म होने की कगार पर है। डीजे के प्रचलन ने कजरी की परंपरा को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया हो। अब शादी हो या धार्मिअ और लोक परंपरा के कार्यक्रम हर जगह कानफोड़ू डीजे परंपरागत गीत-संगीत की जगह लेता जा रहा है। ऐसे ही पूर्वांचल का लोकगायन है कजरी, जो अब बहुत ही कम सुनने को मिलता है कुछ ग्रामीण इलाकों में ही अब कजरी की परंपरा बची है एक समय था कि जब कजरी लिखने ,सुनने और गाने वालो की कमी नही थी देश की आजादी के समय तो देशभक्तो में जोश भरने के लिए देश भक्ति पर कई तरफ की कजरी लिखी गयी थी। लेकिन अब इसे गाने वाले भी कम है और सुनने और समझने वालों में भी बड़ी कमी आई है। इस गायन शैली को बढ़ाने के प्रयास आजादी के बाद कुछ जरूर हुए लेकिन जैसे कदम उठाने चाहिए थे वह नही हो पाए। एक समय था सावन और भादो के महीनो में कजरी सुनने को मिल जाती थी लेकिन अब इस आधुनिकता के दौर में इस तरह के कजरी लिखने, गाने और सुनने वालो में भारी कमी आई है।

 

 

कहते हैं की पूर्वांचल से ही कजरी की शुरुवात हुई थी और एक समय था की कजरी की धुन इतनी लोकप्रिय हुई की शास्त्रीय संगीत के घरानो ने इसे अपना कर वाहवाही लूटी, कजरी मात्र एक लोकगायन नहीं बल्कि यह एक गायन की ऐसी शैली है जो देश भक्ति ,सामाजिक एकता, परम्परा ,वीर रस, श्रृंगार, विरह वेदना का अनोखा संगम है। एक जमाना था जब सावन का महिना शुरू होते ही कजरी की धुन सुनाई पड़ने लगती थी, जिसे सुनने आवारा बादल भी रुक जाते थे और ना चाहते हुए भी विरह वेदना से व्यथित काले कजरारे नैनो से बारिश के रूप में आंसू टपकाने लगते थे। कजरी में एक तरफ जहां विरह वेदना है तो दूसरी तरह कजरी में वीर रस भी है।

 

कहा जाता है की आजादी के समय कजरी ऐसा माध्यम था जब कजरी सुनने एक जगह कई गांवों के लोग आते थे और कजरी गाने वाले महिला पुरुष देशभक्तों में जोश व जज्बा भरने के लिए देशभक्ति पर गायन करते थे। पर अब बड़े अफसोस की बात है की लोकगायन कजरी की परम्परा धीरे धीरे लुप्त होती जा रही है। जाने माने कवि कृष्णावतार राही बताते है की सावन आते ही उन्होंने अपनी माँ मां बहनों को गांव में कजरी गाते सुना था, लेकिन अब नई पीढ़ी गांवों की इस परम्परा से दूर होती जा रही है। कजरी की शुरुवात सैकड़ो वर्षो पहले हुई थी। पूरी तरह ग्रामीण क्षेत्रों का लोकगायन रहा है।

 

सावन के आते ही घर की महिलाएं लड़कियां झूले डालकर कजरी गाती रही है। कुछ नामचीन गायको ने इसे शहरों तक पहुँचाया और कई बेहतरीन कजरी गाकर लोगों को बताया की इसमें कितना दम है। ऐसा नहीं कि कजरी अकेले हमारे देश में ही सुनी गयी। विदेशो में भी इसे सुना गया है, जिस कजरी का इतना विशाल रूप रहा हो अब आधुनिक युग की चकाचौध में कजरी की धुन गम हो रही है।

 

देश की माटी से उपजी परम्परा व पारम्परिक गीतों को हम भुलाते जा रहे हैं। ऐसा नहीं की कजरी के लिए प्रयास नहीं हुए और अभी नहीं हो रहे हैं, लेकिन जैसे प्रयास की जरुरत थी उस तरह के प्रयास नहीं हो पाए है। आज भी ग्रामीण और शहरी इलाकों में रहने वाले बहुत लोग कजरी के दीवाने हैं। भदोही जिले के गोपीगंज में सालाना कजरी महोत्सव होता है जहां दूर दूर से लोग आते है और कजरी गाने वाले भी इस महोत्सव में अपनी लोकगायकी की बेहतरीन प्रस्तुति देते हैं।

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