कंधे पर दिव्यांग दोस्त, 1200 किमी का पैदल सफर और चेहरे पर साफ दिख रहा पलायन का दर्द

-करीब 300 किमी तक पैदल आया फिर वाहन बैठाकर बॉर्डर तक छोड़ा

By: Meghshyam Parashar

Published: 16 May 2020, 01:03 PM IST

भरतपुर. तपती सड़क पर पैदल चलकर पांव काले पड़ चुके हैं, भूख-प्यास बेहाल हो चुका था, चेहरे पर पलायन का दर्द साफ झलक रहा था..., 300 किमी का सफर दिव्यांग दोस्त को कंधे पर लेकर तय किया, यह उस मजदूर की हिम्मत ही तो है जो उसे गांव पहुंचने के लिए पैदल चलने की ताकत दे रही है। 28 वर्ष का विजय वैसे तो इलाहाबाद का रहने वाला है, लेकिन गंगा मैया के जयकारे के साथ वह अपने 31 वर्षीय दिव्यांग दोस्त प्रेमशंकर को लेकर निकल पड़ा है। वह किसी भी कीमत पर अब जल्द से जल्द इलाहाबाद पहुंचना चाहता है। उनकी यह कहानी भी पलायन कर रहे कामगारों के लिए प्रेरणा बनी हुई है।
हुआ यूं कि इलाहाबाद निवासी विजय पुत्र लालबिहारी अहमदाबाद में पानी की बोतल बनाने वाली फैक्ट्री में काम करते थे। वहां लॉकडाउन के बाद जब फैक्ट्री बंद हो गई तो भामाशाहों के माध्यम से राशन किट व भोजन मिलने लगा, लेकिन अब स्थिति ऐसी हो गई कि कोई मदद करना तो भोजन भी नहीं खिला रहा है। फैक्ट्री मालिक ने एक महीने सिर्फ तीन-तीन हजार रुपए देकर घर जाने के लिए कह दिया। जिस मकान में एक कमरा किराये पर ले रखा था उसके मालिक ने भी किराया नहीं मिलने व कोरोना संक्रमण के भय से जाने को कह दिया। वह बताते हैं कि ऐसे में इलाहाबाद के हम सभी 14 लोग पैदल ही गांव के लिए निकल पड़े, अब दिक्कत यह थी कि दिव्यांग प्रेमशंकर पुत्र लालमणि को लेकर कौन जाएगा। उसे कंधा पर रखकर ले जाना तय किया। क्योंकि अगर वो वहां अकेला रहता तो भूख से ही मर जाता, कम से कम अब गांव भी नहीं पहुंच पाए तो यह मलाल तो नहीं रहेगा कि हमने घर जाने के लिए कोई कोशिश नहीं की।

किडनी की बीमारी से पीडि़त पति और बच्चों को लेकर पैदल निकली सुशीला

-गुजरात के कच्छ से बिहार के लिए जा रहा परिवार

भरतपुर. एक परिवार गुजरात के कच्छ इलाके से पैदल ही बिहार के गया जिले के लिए रवाना हो गया। करीब 750 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद यह परिवार गुरुवार को भरतपुर जिले में जयपुर-आगरा हाई-वे के कमालपुरा बॉर्डर पर पहुंचा। लेकिन इस परिवार को घर पहुंचने के लिए अभी करीब 6 50 किलोमीटर का सफर और तय करना है। पैदल चल रहे परिवार के सदस्य थकान से चूर हो चुके हैं और कई किलोमीटर चलने के बाद रास्ते में कुछ देर सुस्ता कर यह वापस अपनी मंजिल की ओर से निकल पड़ते हैं। बिहार के गया जिला निवासी कलुआ यादव का परिवार कच्छ से 14 दिन का सफर तय करने के बाद गुरुवार को भरतपुर पहुंचा है। कलुआ के साथ उसकी पत्नी सुशीला यादव है जो रास्ते पति व बच्चों की हिम्मत बंधा रही हैं। कलुआ का कहना है कि साहब...कुछ दिन में लॉक डाउन खत्म होने की उम्मीद से रूके हुए थे, लेकिन अब तो पता नहीं कब खत्म होगा। जमा पूंजी धीरे-धीरे खत्म हो गई और कोई उधार देने को भी तैयार नहीं था, फिर ऐसे में घर लौटना ही एक उपाय था। इस सफर में पत्नी सुशीला परिवार की हिम्मत बांध रही है। पति कलुआ लम्बे समय से किडनी की बीमारी से पीडि़त है जो ज्यादा पैदल चलने में असमर्थ है। ऐसे में रास्ते में पत्नी हिम्मत दिला और पति के पैर दबा कर दर्द को कम कर घर लौटने की हिम्मत जुटाती है।

आठ माह की गर्भवती बोली...यह पाक माह खुद खुदा दे रहा ताकत

जयपुर से रोजगार खत्म होने के बाद आठ माह की गर्भवती रंजभान पत्नी असमुद्दीन अलीगढ़ जाने के लिए बहन रवीना पत्नी आस मोहम्मद व अन्य परिजनों के साथ पैदल ही सफर कर रही है। दौसा के पास एक ट्रक चालक ने उन्हें देखकर बैठाने की कोशिश की, लेकिन ट्रक पर चढऩे में परेशानी हुई तो पैदल चलना ही उचित समझा। कुछ देर पैदल चलने के बाद एक बस चालक ने उन्हें बैठाया, जहां उन्हें कमालपुरा बॉर्डर लाकर छोड़ दिया। यहां बॉर्डर से लुपिन ने उन्हें निजी बस से यूपी बॉर्डर तक लाकर छोड़ा।

मकान मालिक ने घर से निकाला, पैदल ही सफर पर निकले

पंजाब से छत्तीसगढ़ जा रहे गौरीशंकर बताते हैं कि वह 200 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से बठिंडा में मजदूरी करते थे। मकान के लिए किराया था न खाने के लिए कुछ। 1800 रुपए महीने का कमरा किराये पर था। मकान मालिक ने घर से निकाल दिया। अब दो बेटी, पत्नी के साथ जुगाड़ से बने बाइक के रिक्शे से ही सफर पर निकल पड़े हैं। इसी तरह भरतपुर शहर के कोतवाली के पास मजदूरी करने वाला परिवार भी मध्यप्रदेश के लिए रवाना हुआ। वह पिछले कई दिन से परिवहन सेवा का इंतजार कर रहे थे। परिवार को लेकर राजेश 15 मई को रवाना हो गया।

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Meghshyam Parashar Bureau Incharge
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