scriptAdministration, government and mafia responsible for my baba's death | मेरे बाबा की मौत का जिम्मेदार प्रशासन, सरकार और खनन माफिया | Patrika News

मेरे बाबा की मौत का जिम्मेदार प्रशासन, सरकार और खनन माफिया

- गम और गुस्से के बीच बोली बाबा विजयदास की पोती दुर्गा
- बरसाना में गुरु भाई दीनदयाल दास ने दी संत की पार्थिव देह को मुखाग्नि

भरतपुर

Updated: July 24, 2022 01:51:22 pm

भरतपुर. तीन साल की उम्र में मम्मी-पापा की हादसे में मौत के बाद बाबा और राधा-रानी ही मेरा सहारा रही। आज 14 वर्ष की उम्र हो चुकी है। अब बाबा दुनियां छोड़कर चले गए, लेकिन उनके जाने का कारण अच्छा नहीं था। मेरे बाबा की मौत का जिम्मेदार वहां का प्रशासन, सरकार और खनन माफिया है। इतना कहते ही गांव पसोपा में आत्मदाह करने वाले साधु बाबा विजयदास की पौत्री दुर्गा बिलखने लगी। उल्लेखनीय है कि आदिबद्री व कनकांचल पर्वत को खनन मुक्त कराने की मांग को लेकर 552 दिन से गांव पसोपा में चल रहे धरने में बाबा विजयदास ने शरीर पर पेट्रोल छिड़ककर आत्मदाह का प्रयास किया था। भरतपुर से उन्हें जयपुर रैफर किया गया था। दूसरे दिन उन्हें जयपुर से दिल्ली के सफदरगंज अस्पताल में भर्ती कराया गया। जहां उन्होंने शनिवार तड़के अंतिम सांस ली।
सुबह बाबा विजयदास की मौत की सूचना के बाद डीग के गांव पसोपा में धरनास्थल पर ग्रामीण एकत्रित हो गए। बृज पर्वत संरक्षण समिति के अध्यक्ष राधाकांत शास्त्री ने जिला कलक्टर आलोक रंजन से बात की। गांव पसोपा के ग्रामीणों ने गांव में ही बाबा विजयदास का अंतिम संस्कार करने की बात कही। इसमें तर्क दिया गया कि बाबा पसोपा के ही पशुपतिनाथ मंदिर के महंत रहे हैं। इसको लेकर करीब ढाई से तीन घंटे तक गतिरोध बना रहा। क्योंकि प्रशासन को पसोपा में भीड़ एकत्रित होने की आशंका थी। साथ ही गुप्तचर एजेंसियों से भी कुछ इनपुट मिलने के कारण प्रशासन पसोपा में अंतिम संस्कार के पक्ष में नहीं था। अंत में समिति के अध्यक्ष राधाकांत शास्त्री व मानमंदिर के सुनील सिंह ने बरसाना के माताजी गौशाला में ही अंतिम संस्कार की सहमति दी। इसके बाद अंतिम यात्रा को कामां होकर ले जाने पर भी गतिरोध की स्थिति बन गई। हालांकि बाद में समझाइश कर तीर्थराज विमल कुंड पर जल स्पर्श कराने पर सहमति बनी। वहीं कामां, डीग, पहाड़ी के अलावा विभिन्न गांवों से बड़ी संख्या में लोग बरसाना स्थित माताजी गौशाला पहुंचे। इससे पहले संत की अंतिम यात्रा दिल्ली से कोसीकलां, नंदगांव, कामां से होकर बरसाना पहुंची।
मेरे बाबा की मौत का जिम्मेदार प्रशासन, सरकार और खनन माफिया
मेरे बाबा की मौत का जिम्मेदार प्रशासन, सरकार और खनन माफिया
सिसक-सिसक कर गम में सूख गये आंखों के आंसू

जिसने बचपन में मां-बाप का साया खो दिया हो। अब उसके सर से बाबा का भी साया उठ गया। विजय दास बाबा अपना सब कुछ छोड़कर रमेश बाबा के आश्रम की शरण में आ गये थे। आंदोलन से जुडऩे के बाद वे ब्रज क्षेत्र के पर्वतों के खनन से दुखी थे। उन्होंने सरकारी तंत्र की नाकामयाबी से तंग आकर आत्मदाह का प्रयास किया और इलाज के दौरान मौत हो गई। इस घटना के बाद उनकी पोती दुर्गा का रो-रोकर बुरा हाल था। उसकी आंखे गम में सूख गई। वह किसी से कुछ बोलना नहीं चाहती थी। उसकी सिसकन पर हर कोई दुखी हो गया।
अंतिम दर्शन को पहुंचे ये नेता और अफसर

बाबा विजयदास के अंतिम दर्शन करने के लिए राजस्थान सरकार से कैबिनेट मंत्री विश्वेद्र सिंह, शिक्षा मंत्री बीडी कल्ला, उत्तरप्रदेश के कैबिनेट मंत्री लक्ष्मीनारायण चौधरी, सांसद रंजीता कोली, अलवर सांसद बाबा बालकनाथ, जिला कलक्टर आलोक रंजन, एसपी श्याम सिंह, पूर्व मंत्री प्रभुलाल सैनी, भाजपा के प्रदेश महामंत्री भजनलाल शर्मा, पूर्व विधायक गोपी गुर्जर, भाजपा जिलाध्यक्ष डॉ. शैलेष सिंह, किसान नेता नैमसिंह फौजदार, डांग विकास बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष जवाहर सिंह बेढम, भाजयुमो के जिलाध्यक्ष सौरव ताखा आदि पहुंचे।
साधु-संतों व प्रशासन बीच हुई तकरार, तब माने कलक्टर

गांव धिलावटी में बाबा विजयदास की अंतिम यात्रा को कामां में प्रवेश करने से रोक दिया। इससे अंतिम यात्रा की अगुवाई कर रहे गोपेश्वरशरणदास बाबा नाराज हो गए। उन्होंने कहा कि दिवंगत संत को कामां के तीर्थराज विमल कुंड का जल स्पर्श कराए बिना अंतिम यात्रा नहीं जाएगी। जिला कलक्टर आलोक रंजन ने उन्हें समझाया कि कामां में यात्रा के प्रवेश से माहौल खराब हो सकता है। इस पर उन्हें विमल कुंड जाने के लिए पांच मिनट का समय दिया गया। कामां के बाइपास चौराहे पर बड़ी संख्या में एकत्रित नेताओं व आमजन ने बाबा की अंतिम यात्रा पर पुष्प वर्षा कर श्रद्धांजलि दी।
बाबा विजयदास के जीवन पर एक नजर

विजयदास बाबा ने हरियाणा के फरीदाबाद जिले के गांव बड़ाला के ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया था। इनका नाम साधु बनने से पहले मधुसूदन शर्मा था। जो साधु बनने से पहले फरीबाद की कपड़ा फैक्ट्री में ड्राइंगमैन के पद पर कार्यरत थे। वहां सालों तक काम करते रहे। इस दौरान उन्होंने अपने पुत्र का विवाह कर दिया। इसके एक पुत्री भी हो गई। इसी दौरान किसी हादसे में उनके पुत्र और पुत्रवधु की मौत हो गई। जो अपने पीछे दो-तीन साल की पुत्री को बाबा मधुसूदन (विजयदास) के भरोसे छोड़ गए। बेटे और पुत्रवधु की मौत ने उन्हें तोड़ दिया। इसके बाद वह पौत्री दुर्गा को लेकर करीब 12-13 वर्ष पहले मानमंदिर पहुंचे। पौत्री मान मंदिर में ब्रज की आस्था से जुड़कर भजन कर रही है। उसके दस्तावेजों में भी मूल पता मान मंदिर का है।
डेढ़ साल पहले पहुंचे थे गांव पसोपा

अवैध खनन के विरोध में पसोपा में 16 जनवरी 2021 से शुरू हुए धरने के दौरान बाबा विजय दास पसोपा पहुंचे थे। उससे पहले पसोपा के पहाड़ पर बने मंदिर के महंत बाबा श्यामदास का निधन होने से मंदिर पर कोई महंत नहीं था। ग्रामीणों ने आपसी सहमति के बाद बाबा विजय दास को गांव के वीर बाबा मंदिर का महंत बना दिया।
बाबा कहते थे...जिंदगी भी ड्रॉइंग की तरह, सिर्फ दिखती सुंदर है ...

गुरु भाई दीनदयालदास ने बताया कि विजयदास बहुत खुशमिजाज और संघर्ष करने वाले थे। जिंदगीभर उन्होंने परिस्थितियों से संघर्ष किया। ऐसे में वह हर चुनौती का सामना करना जानते थे। कई बार जब मानमंदिर पर कोई कार्यक्रम होता और भीड़-भाड़ होती तो वे कहते थे कि जिंदगी भी एक ड्राइंग है और जो इस ड्राइंग को समझ गया, मान लो वो जिंदगी को समझ गया। भगवान उस ड्राइंग पर सबकी जिंदगी लिखता है। इसके बाद ड्राइंग को बनाने और मिटाने का काम इंसान खुद करता है। बाबा हरिबोलदास ने बताया कि बाबा विजयदास इतने सरल स्वभावी थे कि कुछ समय के अंदर ही उन्होंने बाहर का होने के बाद भी पसोपा के ग्रामीणों को अपना बना लिया।

ऐसे रहा घटनाक्रम

-20 जुलाई की दोपहर करीब 12 बजे बाबा विजयदास ने खुद को आग लगाई।
- शाम पौने पांच बजे आरबीएम अस्पताल से जयपुर रैफर कर दिया।
-21 जुलाई को जयपुर से दिल्ली रैफर किया गया।
-22 जुलाई को हालत गंभीर बनी रही।
-23 जुलाई को तड़के करीब दो बजे अंतिम सांस ली।

पहाड़ वन विभाग में, लेकिन स्टोन क्रशर तो चलेंगे
अब भले ही राज्य सरकार की ओर से आदिबद्री व कनकांचल पर्वत को वन विभाग के सुपुर्द कर दिया है, लेकिन अब साधु-संतों की मांग स्टोन क्रशरों को हटाने की रहेगी। क्योंकि यह स्टोन क्रशर विभिन्न दलों के नामचीन नेताओं व रसूखदारों के हैं। इसलिए साधु-संतों का आरोप है कि इस मामले में अब भी सरकार का रुख स्पष्ट नजर नहीं आ रहा है। दोनों ही पर्वतों पर आवंटित लीजधारक हाइकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में राज्य सरकार की ओर से कैविएट लगाने की बात कही जा रही है। अब साधु-संतों का कहना है कि लीज भले ही निरस्त मानी जाएगी, लेकिन स्टोन क्रशर अभी भी कानूनी रूप से बंद नहीं है। ऐसे में अगर स्टोन क्रशर स्थानीय लीजों से अवैध खनन कर माल पिसाई करेंगे और दूसरी जगह से रवन्ना लगाएंगे तो उन्हें रोकना प्रशासन के लिए मुश्किल होगा। इसलिए जल्द से जल्द इनको भी बंद किया जाना चाहिए। काफी संख्या में क्रशर तो लीजों पर ही संचालित है।
...............
इनका कहना
- अभी कोई निर्णय नहीं हुआ है। दो-तीन बाद गांव पसोपा में बैठक की जाएगी। क्योंकि आंदोलन स्थल वहीं पर था। इसलिए अभी आगामी रणनीति तय की जाएगी।

राधाकांत शास्त्री
अध्यक्ष, बृज पर्वत संरक्षण समिति

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