scriptDead fish removed 10 times compared to two days | सुजानगंगा: दो दिन की तुलना 10 गुना निकाली मृत मछलियां | Patrika News

सुजानगंगा: दो दिन की तुलना 10 गुना निकाली मृत मछलियां

-और भी डाली जाएगी दवाइयां, आसपास के मोहल्लों में बदबू से बढ़ी परेशानी

भरतपुर

Published: December 24, 2021 09:27:40 am

भरतपुर. सुजानगंगा नहर में भले ही अब पिछले तीन दिन से नगर निगम की ओर से मृत मछलियां निकालने का काम किया जा रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि जब भी सुजानगंगा नहर की सफाई कराई जाती है, उसके कुछ दिन बाद ही उतना ही कचरा एकत्रित हो जाता है। चूंकि नहर के आसपास स्थित मोहल्लों के लोग नहर में ही कचरा डालते हैं। कुछ स्थानों पर नगर निगम के सफाई कर्मियों की ओर से भी कचरा डालने की शिकायत सामने आती रही है। ऐसे में अब नगर निगम की ओर से लोगों को जागरूक करने का भी प्रयास किया जा रहा है। ताकि सुजानगंगा को प्रदूषण रहित किया जा सके। इसके साथ ही अब एक-दो दिन में और भी दवाइयां डाली जाएंगी। ताकि ऑक्सीजन टेबलेट के माध्यम से पानी का ऑक्सीजन लेवल बढाया जा सके। उल्लेखनीय है कि सुजानगंगा नहर में नवंबर 2020 में लाखों मछलियों की मौत ऑक्सीजन के अभाव में हो गई थी। अब दुबारा से तीन दिन पहले नहर में मछलियों का मौत सिलसिला शुरू हो गया है। हालांकि गुरुवार को पिछले दो-तीन दिन की तुलना 10 गुना मृत मछलियां निकाली गई हैं। इससे आसपास के मोहल्लों में बदबू से लोगों का हाल बेहाल है।
नगर निगम आयुक्त कमलराम मीणा ने बताया कि दवाइयों डाली गई हैं। और भी सुझाव सामने आए हैं। एक-दो दिन में उनको भी डलवाया जाएगा। अब कुछ स्थानों पर रस्सी डालकर मृत मछलियों को एकत्रित किया गया है। साथ ही नावों की संख्या भी बढ़ाई है। इससे मृत मछलियां अधिक निकलवाई गई हैं। इधर, सुजानगंगा नहर के संरक्षण को लेकर हाइकोर्ट में लंबे समय से कानूनी लड़ाई लड़ रहे वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीनाथ शर्मा ने बताया कि प्रशासन को हाइकोर्ट के आदेश के अनुसार कार्य करना चाहिए। सुजानगंगा कोई छोटा प्रोजेक्ट नहीं है। इसे गाइडलाइन व कुशल इंजीनियरों की देखरेख में प्रस्ताव तैयार कराकर काम कराना चाहिए। तभी जाकर पानी के ऑक्सीलन लेवल बढ़ाया जा सकता है और मछलियों की मौत को रोका जा सकता है।
सुजानगंगा: दो दिन की तुलना 10 गुना निकाली मृत मछलियां
सुजानगंगा: दो दिन की तुलना 10 गुना निकाली मृत मछलियां
पहले मिल चुकी सैद्धांतिक सहमति, लेकिन हालात जस के तस

नहर की मोटवॉल कई जगह से टूटी है। इसमें चौबुर्जा, धोबीघाट, गोपालगढ़, सफेद कोठी के सामने, केतन गेट, पाई बाग और खिरनी घाट प्रमुख हैं। जबकि 38-40 से ज्यादा स्थानों पर मोटवॉल की मरम्मत कराए जाने की जरुरत है। एएसआई के अधीन आने वाले पुरातात्विक महत्व के स्मारकों के एक सौ मीटर की परिधि में कोई निर्माण या सुधार कार्य नहीं कराए जा सकते। नियमों में यह भी प्रावधान है कि दो सौ मीटर की दूरी पर भी काम कराने के लिए एएसआई से अनुमति लेनी होगी। कुछ साल पहले एएसआई ने सुधार के लिए सैद्धांतिक सहमति दे दी, लेकिन काम अब तक नहीं हो सका है।
आसपास के मोहल्लों की जा रही है नहर में गंदगी

1743 से 1751 के बीच राजा सूरजमल ने भरतपुर में किले का निर्माण करवाया। कुछ का मानना है कि गहराई का कोई पता नहीं, वही कुछ लोग कहते है कि 10 से अधिक हाथियों की लंबाई के बराबर है। नहर में पानी के भरने और गंदे पानी के निकास के लिए जमीन के अंदर से व्यवस्थाएं थी। शहर से 10 किलोमीटर दूर स्थित अजान बांध के पानी से नहर को भरा जाता था। आज दोनों ही व्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो गई है। इसके साथ ही शहर भर की गंदगी अब नहर के हवाले की जाने लग गई है। इस गंदगी को रोकने के लिए तीन करोड़ की लागत से एक नाला भी चारों ओर बनाया जा चुका है जो पूरी तरह से बेकार पड़ा हुआ है। किले की सुरक्षा के लिए 1733 ईस्वी में सुजान गंगा नहर का निर्माण शुरू हुआ था। यह आठ साल में बनकर तैयार हुई। इसमें 650 कारीगरों ने रात-दिन काम किया। नहर 2.4 वर्ग किलोमीटर में फैले किले के चारों ओर करीब 2.9 किलोमीटर लंबी है। यह करीब 200-250 फुट चौड़ी और करीब 30 फुट गहरी है। किले की दीवार को फोर्ट वॉल और दूसरी दीवार को मोट वॉल कहा जाता है।

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