यहां मजदूरी के लिए हर रोज बनते हैं जान के दुश्मन...

-मजदूर परेशान, गांवों में काम न शहर में रोजगार, कोरोना के चलते छाई मंदी से शहर में भी छूटा काम
-मजदूरी के लिए आपस में भिड़ जाते हैं मजदूर

By: Meghshyam Parashar

Published: 13 Sep 2021, 08:52 AM IST

भरतपुर. कोरोना संक्रमण के दौर में जहां मजदूरों को काम के लिए परेशानी उठानी पड़ी थी, वहीं अब बरसात के मौसम में भी मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। शहर के लक्ष्मण मंदिर चौराहे पर हर दिन सैकड़ों की संख्या में मजदूर आते हैं लेकिन आधे से अधिक मजदूर काम नहीं मिलने के चलते खाली हाथ घरों को लौट जाते हैं। हर दिन काम नहीं मिलने की वजह से मजदूरों के सामने परिवार के पालन पोषण का संकट खड़ा हो गया है। पत्रिका की टीम ने दो घंटे तक मजदूरों की मजबूरी के बारे में जानकारी ली तो मजदूरों की मजबूरी इतनी है कि अपने परिवार को पालने के लिए आपस में लड़ जाते हैं कई तो हाथापाई की नौबत भी आ जाती है।
मजदूर सर्वसुख पुत्र श्रीराम निवासी माढौनी जब मजदूरी नहीं मिली तो आपस में लडऩे के बाद रो पड़ा। मजदूरी के लिए दिहाड़ी मजदूर जैसे ही कोई मजदूरों को लेकर आने के लिए आता है एकदम भाग कर उसे घेर लेते हैं और उसके वाहन पर बैठ जाते हैं और एक दूसरे को धक्का देते हैं। इन मजदूरों में से अधिकाशं निर्माण का कार्य करते हैं। इनको कोरोनाकाल से पहले मिल रहा था, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर का असर हुआ तो लॉकडाउन को लेकर पाबंदियां लग गई। इस पर शहर में काम बंद हो गया। इधर, शादी समारोह स्थगित हुए तो टेंट मजदूर भी बेकार हो गए। करीब तीन माह तक यह स्थिति रही। इसके बाद सरकार ने पाबंदी हटा दी, लेकिन कोरोना के चलते मंदी की मार बाजार पर पड़ी। इसका असर निर्माण कार्यों पर हुआ और मजदूरी कम हो गई। ऐसे में गांवों से आने वाले मजदूरों को रोजगार भी नहीं मिल रहा।

सरकार के स्तर पर भी नहीं कोई मदद

असल में कहानी यह भी है कि भले ही सरकार और प्रशासन की ओर से मजदूरों की स्थिति सुधारने को लेकर कितने भी दावे किए जाएं, लेकिन भ्रष्ट सिस्टम के कारण उन्हें योजनाओं तक का लाभ नहीं मिल पाता है। चूंकि श्रम विभाग में बगैर रिश्वत दिए कोई काम नहीं होता है तो मजबूरी में मजदूर भी लाभ की उम्मीद छोड़ देते हैं। उनसे जुड़ी प्रत्येक योजना की जिम्मेदारी संभालने वाले विभाग का यही हाल है।

फैक्ट्रियां बंद और बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ा

पिछले कुछ दशक में रोजगार को लेकर शहर समेत आसपास के इलाकों से युवाओं ने अन्य शहरों को पलायन किया है। मजदूरी से लेकर बड़े तबके तक के लिए यहां रोजगार नहीं है। क्योंकि ज्यादातर बड़ी फैक्ट्रियां बंद हो चुकी है। अगर कोई चालू भी है तो वह सिर्फ दिखावा मात्र है। ऐसे में रोजगार की आशा भी नहीं रह जाती है।


बगैर सब्जी खानी पड़ती है रोटी

-जब से कोरोना आया है। कुछ काम नहीं मिला है। स्थिति बद से बदतर है। किराए के मकान में रह रहे हैं। यहां कभी कभी कुछ काम मिल जाता तो कर आते हैं, लेकिन अधिकतर दिन घर खाली हाथ लौटना पड़ता है। बिना सब्जी के ही सूखी रोटी खानी पड़ती है।

विनोद कुमार कोली पुत्र मंगलराम कोली, निवासी तिलक नगर

मकान का किराया तक नहीं दे पा रहा

-स्थिति इतनी खराब है कि दो साल से बच्चों की स्कूल की फीस व मकान का किराया तक जमा नहीं कर पाए हैं। यहां आते हैं। भीड़ इतनी हो जाती है कि काम मिलता ही नहीं है। एकाध दिन मिल भी जाता है तो गुजर-बसर नहीं हो पाती है। पैरों से चलने में भी समस्या होती है।

परशुराम पुत्र भीलू, कैला देवी झील हाल निवासी सुभाष नगर

बेटी की शादी करूं या परिवार चलाऊं

-काम के लिए आपस में झगड़ा तक हो जाता है। बड़ी लड़की शादी के लिए तैयार है। कहां से शादी करें। पेट भरने का तो कोई साधन नहीं है। आखिर शादी कहां से करेंगे। हाथ में दर्द रहता है मजदूरी करने में भी समस्या रहती है। पहले तो कोरोना ने हमारी मजदूरी बंद कर दी। अब बारिश होने के कारण कोई काम नहीं मिल पा रहा है।

देवी सिंह पुत्र मानसिंह, निवासी हलैना

50 रुपए लाया और 30 किराए में गए

-यहां पर मजदूरों को मजदूरी नहीं मिल पाती है। इससे पालन पोषण नहीं हो पा रहा है। घर से 50 रुपए लेकर आया था। 30 रुपए किराए में खर्च हो गए। 20 रुपए बचे हैं। अब जाने के लिए पैसे भी नहीं है। मजदूरी नहीं मिलती है तो जाने में भी समस्या होगी। एक कमरा है जो भी बारिश में टपकता है।

दुलीचंद पुत्र विशंभर दयाल, कौंरेर जाट वामन नगला रूपबास

पत्नी दिव्यांग और भूखे मरने की नौबत

-बारिश होने से खेतों में पानी भरा हुआ है। गांव में भी कोई मजदूरी नहीं मिल रही। यहां पर बेरोजगारी होने के कारण भीड़ अधिक होती है। इससे आपस में विवाद भी हो जाता है। पत्नी दिव्यांग है। सूखी रोटी खाकर परिवार को पाल रहा हूं।

शब्बो सिंह पुत्र रामबाबू, कल्याणपुर रूपवास

चार दिन से नहीं मिला कोई काम

-पहले तो कोरोना दंश को झेल रहे थे। बारिश से कोई काम नहीं मिल रहा है। शहर में भी आते हैं तो यहां पर भी अधिकतर काम बारिश की वजह से बंद पड़े हुए हैं। चार दिन हो गए अभी तक कोई काम नहीं मिला है। वापस लौट कर जाना पड़ता है।

सजमी चंद पुत्र विशाल, चक एक्टा

10 दिन बगैर मजदूरी जा रहा घर

-आज 10 दिन हो गए। कोई काम नहीं मिला है। पहले कोरोना के संकट में थे, लेकिन अब गांव में पानी भरा होने से शहर में मजदूरों की संख्या अधिक बढ़ गई है। इससे बेरोजगारी होने पर रोजगार नहीं मिल रहा है। आस-पड़ोस से मांग कर गुजारा करना पड़ रहा है।

अजय सिंह पुत्र भजनलाल, बजरंग नगर

उधार मांग कर चला रहे काम

-त्यौहार आने के कारण काम की अति आवश्यकता है, लेकिन शहर में आते हैं तो यहां काम नहीं मिल पा रहा है। लोगों से उधार मांग कर काम कर रहे हैं। पहले कोरोना अब बारिश से परेशान हैं। गांव में काम नहीं है। शहर में काम के लिए आते हैं लेकिन यहां से भी मायूस होकर लौटना पड़ता है।

वेदराम पुत्र बदले सिंह, इकरन

इनका कहना है

-कौन मजदूर कहां से आ रहा है। इसकी सूचना एकत्रित करनी चाहिए। किस मजदूर को नरेगा या किसे अन्य योजना से जोड़ा जा सकता है। इसका प्लान प्रशासनिक स्तर पर तैयार होना चाहिए। अगर 500 श्रमिकों को भी योजना से जोड़ा जाता है तो एक बड़ा वर्ग बेरोजगार से होने से बच जाएगा। खुद मैं भी काोर्डिनेटर को लक्ष्मण मंदिर भेजकर सूचना एकत्रित कराता हूं कि हम स्थानीय स्तर पर ही उन्हें रोजगार या किसी भी तरह मदद किस स्तर तक करा सकते हैं।

सीताराम गुप्ता, अधिशाषी निदेशक लुपिन फाउंडेशन

Meghshyam Parashar Bureau Incharge
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