साहब...जेब में सिर्फ 150 रुपए थे, मिन्नतें भी की फिर भी लिया 100 रुपए किराया

1. देर रात तक करीब 20 हजार से ज्यादा बेघर यात्रियों को उत्तरप्रदेश बॉर्डर तक छोड़ा
2. शहर के एक दर्जन से अधिक लोग खुद के स्तर पर ही कर रहे भोजन की व्यवस्था

By: Meghshyam Parashar

Published: 29 Mar 2020, 07:13 PM IST

भरतपुर. भइया...जयपुर के सीतापुरा में एक फैक्ट्री में दो भाइयों के साथ काम करता हूं। मकान मालिक ने परिवार सहित घर से निकाल दिया। फैक्ट्री मालिक से कुछ रुपए देने की गुजारिश की, लेकिन 150 रुपए देकर भगा दिया। जयपुर से परिवार सहित बस में बैठा तो 100 रुपए किराया ले लिया। पहले कहा था कि उत्तरप्रदेश बॉर्डर तक निशुल्क छोड़ा जाएगा। यह कहना था बिहार के नालंदा के माड़ी गांव निवासी सुकलेश झा का। ऐसे और भी कुछ यात्रियों ने अपना दर्द बयां किया। हालांकि इनमें से हर कोई भरतपुर की तारीफ करता नजर आया। रविवार तड़के से ही जयपुर-आगरा हाइवे पर रोडवेज व निर्धारित निजी बसों का आवागमन शुरू किया गया। ताकि प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए श्रमिकों को उत्तरप्रदेश बॉर्डर तक छोड़ा जा सके। ऊंचा नगला पुलिस चौकी के सामने एसडीएम संजय गोयल की ओर से वाहनों के नंबर व यात्रियों की संख्या नोट करने के बाद भेजा गया। शहर के एक दर्जन से भी अधिक लोगों की ओर से वहां पर श्रमिकों के भोजन की व्यवस्था की गई। देर रात तक 204 से भी अधिक बसों के माध्यम से उत्तरप्रदेश व बिहार के 20 हजार से अधिक श्रमिकों को यूपी बॉर्डर तक छोड़ा गया था। बता दें कि जिला प्रशासन के निर्देश पर रोडवेज बस प्रबंधन ने अपने घरों से दूर मजदूरी कर लौट रहे लोगों को बस से ऊंचा नगला बोर्डर से जयपुर और जयपुर, रतनगढ़, जोधपुर, बाड़मेर, अजमेर आदि स्थानों से भरतपुर में राजस्थान-उत्तर प्रदेश सीमा स्थित चौमा बार्डर और रारह बोर्डर पर छोड़ रहे हैं। वहीं रोडवेज में इनकी यात्रा को नि:शुल्क कराया जा रहा है।

लाइव...मानो युद्ध के हालात में जान बचाकर भाग रही हो जनता

जयपुर-आगरा हाइवे पर रविवार को माहौल कुछ इस कदर नजर आया कि हर कोई जान बचाने के लिए दौड़ लगा रहा है। हर किसी के चेहरे पर डर और कोरोना का खौफ साफ नजर आ रहा था। बिहार जा रहे परवेज आलम ने कहा कि पता ही नहीं कि जिंदा परिवार के पास पहुंच भी पाऊंगा या नहीं, दो दिन से घर पर बात तक नहीं हुई है। मोबाइल की चार्जिंग खत्म हो चुकी है। वहीं बनारस के पास के रहने वाले चित्रांशु ने बताया कि वह बाड़मेर में नौकरी करता है। सैकड़ों किलोमीटर चलने के बाद बालोतरा से जयपुर के लिए बस मिली। अब भीड़ को देखकर लगता है कि मानो युद्ध के हालात में हर किसी को जान बचाने की जल्दी है। कानपुर के रमेश बताते हैं कि पिछले 10 साल से जयपुर के मुरलीपुरा में किराए के मकान पर रहकर परिवार का गुजारा कर रहा था। अब नौकरी और घर दोनों ही नहीं रहे तो पैतृक गांव जाने के लिए जंग लडऩी पड़ रही है। 58 वर्षीय चंपालाल निवासी जगदलपुर बताते हैं कि जीवन में इतने दशक में ऐसा माहौल कभी नहीं देखा। 16 साल से चूरू में जिस मकान में रह रहा था, उस मकान मालिक का भी कोरोना ने विश्वास उठा दिया।

वाहनों के अभाव में ट्रकों में किया हजारों ने सफर

कोरोना को लेकर जहां देशभर में सोशल डिस्टेंसिंग की बात की जा रही है, वह लॉकडाउन के बाद भी ऊंचानगला पुलिस चौकी के सामने मखौल बनती नजर आई। पलायन कर आए लोगों को जैसे ही कोई ट्रक या कोई भी वाहन आता दिखता वह उसमें चढ़ जाते। ऐसे में उनमें बीमारी का भी खतरा बना हुआ था। हालांकि राजस्थान इलाके में इनकी कोई स्क्रीनिंग भी नहीं की गई है।

चार दिन का सफर तय कर पहुंचे यूपी बॉर्डर

पुष्पेंद्र, उसकी पत्नी शोभा देवी दो बच्चों के साथ जयपुर से पैदल ही सफर कर ऊंचानगला पहुंचे। पुष्पेंद्र ने बताया कि वह जयपुर में ही नौकरी करता है। जब मकान मालिक ने घर से निकाल दिया और काम बंद पड़ा था। ऐसे में बच्चों को लेकर पैदल ही चल पड़ा। दो दिन तक भोजन भी नहीं मिला। हालांकि उसके बाद जगह-जगह लोग भोजन कराने लगे हैं।

Meghshyam Parashar Bureau Incharge
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