script...means the city government just left these voiceless people to die | ...मतलब शहरी सरकार ने बेजुबानों को सिर्फ मरने छोड़ा! | Patrika News

...मतलब शहरी सरकार ने बेजुबानों को सिर्फ मरने छोड़ा!

-इकरन की नंदी गौशाला बन रही गायों की कब्रगाह, हर रोज एक दर्जन गायों की मौत, छाया, पानी और खाने के नहीं पर्याप्त इंतजाम, भूसा की जगह तूड़ी खाने की विवशता

भरतपुर

Published: April 09, 2022 07:52:49 am

भरतपुर . छाया के नाम पर तपते आधे-अधूरे टिनशैड। खाने के नाम पर तूड़ी मिला भूसा। पानी के लिए लड़ामनी में तपती दुपहरी के बीच भरा गर्म पानी। हरा चारा दर्शन मात्र को नहीं। इन सरकारी बदइंतजामी के बीच यहां गाय महज सांसें पूरी कर रही हैं। भोजन के अभाव में सांसें कब छोड़ दें यह खुद उनको भी नहीं पता है। वजह, हर रोज एक दर्जन गायों की मौत यहां हो रही है, लेकिन गाय को गौमाता का दर्जा देने वालों का कहीं अता-पता नहीं है। यह हाल है इकरन स्थित नंदी गौशाला का।
गौशाला का संचालन नगर निगम कर रही है, लेकिन यहां व्यवस्थाएं अब बदहाली में बदलती नजर आ रही हैं। भूखा गौवंश चारे को सिर्फ मुंह मारता नजर आता है। चाव से खाने के लिए यहां चारा है ही नहीं। चालीस डिग्री से ऊपर चढ़ते पारे के बीच यहां ऊंचे टिनशैड हैं। इनकी छाया गौवंश को सुकून देने की बजाय तपाती नजर आ रही है। इस बीच गौवंश छितरी पड़ी छाया के बीच कहीं दीवारों से चिपककर तो कहीं अवशेषों के नाम पर बचे पेड़ों के ठूंठों के बीच तन को झुलसने से बचाने के जतन करता नजर आता है। इसी बदहाली का नतीजा है कि शहर के गौवंश खूब पहुंच रहा है, लेकिन इनकी मौतों का सिलसिला नहीं थमने के कारण गौवंश का आंकड़ा गौशाला में हर बार जितना ही रहता है। मौत के कारणों पर नगर निगम प्रशासन का एक ही तर्क रहता है कि यहां गौवंश शहर से पहुंच रहा है, जो पॉलीथिन खाकर आता है और कमजोर होने के कारण यहां इनकी मौत हो जाती है, लेकिन यह सरकारी बयान महज खुद को बचाने के लिए है। गायों को बचाने के लिए उम्दा इंतजामात यहां कतई नजर नहीं आ रहे हैं।
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वल्चरों ने भी बना लिया ठिकाना

गायों की मौत का ही नतीजा है कि अब वल्चर गौशाला के हिस्से में ठिकाना बनाने लगे हैं। पहले ये मवेशियों की खाल उतारने वाले हिस्से तक सीमित थे, लेकिन अब दुधारू गाय और बछड़ों को रखने वाले स्थान तक जा पहुंचे हैं। शायद इन्हें भी भान हो गया है कि गायों की मौत यहां थम नहीं रही है। ऐसे में यह भी यहां गिद्ध दृष्टि जमाए रहते हैं और मौका लगते ही मांस को मुंह मारने के प्रयास में रहते हैं।
अन्य गौवंश भी गिन रहा सांसें

नंदी गौशाला के हाल यह हैं कि यहां गौवंश हड्डियों के ढांचे में तब्दील होता जा रहा है। कमजोर गौवंश सूखे भूसे में मुंह तो मार लेता है, लेकिन इससे केवल वह जिंदा ही है। आलम यह है कि यदि एक बार गौवंश कमजोर अवस्था के चलते बैठ गया तो वह फिर उठ नहीं पा रहा है। उसका मृत शरीर फिर जेसीबी से ही उठाया जा रहा है, लेकिन नगर निगम इसकी अनदेखी करता नजर आ रहा है। मौत के आंकड़े यहां की अव्यवस्था के साक्षी बन रहे हैं, लेकिन फिर भी बेहतर इंतजाम नहीं हो पा रहे हैं।
नहीं रुक रहे श्वान

नगर निगम के तमाम प्रयासों के बाद भी यहां श्वानों का आवागमन नहीं रुक सका है। तारबंदी के बाद भी यहां श्वान खुलेआम विचरण करते देखे जा सकते हैं। कार्मिकों के अभाव में यहां इन्हें देखने वाला कोई नहीं है। मवेशियों की खाल उतारने वाले स्थान के पास से श्वान अभी भी तारों के नीचे से निकलकर यहां तक पहुंच पाते हैं। इनसे हर समय बछड़ों को जान का खतरा बना रहता है। हालांकि बछड़े एवं दुधारू गाय जाली के अंदर महफूज रहते हैं, लेकिन यदि भूलवश कोई बछड़ा बाहर आ जाए तो यह मौका लगते ही उसे अपना शिकार बनाने में देर नहीं करते।
टिनशैड में नहीं जगह, ठूंठों का सहारा

नंदी गौशाला में वर्तमान से 1500 से ऊपर गौवंश हैं, लेकिन इनके लिए छाया के इंतजाम अधूरे हैं। टिनशैड में इतनी जगह नहीं बचती कि सभी गौवंश आराम से इसमें छाया पा सके। ऐसे में तन झुलसाने वाली गर्मी में भी गौवंश खुले आसमां तले खड़ा रहता है। तेज गर्मी के बीच कई बार वह दीवारों के सहारे चिपककर छाया को समेटने की कोशिश करते हैं तो कभी महज पेड़ों के नाम पर बचे ठूंठों के ओट में आकर छाया तलाशते हैं, लेकिन यह ठूंठ भी उनको आराम नहीं दे पाते।
फैक्ट फाइल

1500 से ऊपर गौवंश है नंदीशाला में
10 से अधिक गायों की रोज हो रही मौत
145 क्विंटल चारा पहुंचता है प्रतिदिन
120 क्विंटल करीब चारा है गोदाम में

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