सिमटा विदेशी व्यापार तो सुधरी सरसों की सेहत

- खाद्य तेलों का आयात रुकने से बढ़ी कीमतें, शुद्धता ने भी दिया सम्बल

By: Meghshyam Parashar

Updated: 11 Jun 2021, 03:25 PM IST

भरतपुर. सरसों भावों को लेकर सुर्खियों में है। पहली मर्तबा किसान भी भावों से विभोर है। सरसों से गुलजार मंडी में आढ़तिए भी भावों के उछाल को अन्नदाता के अरमान पूरे करने वाले बता रहे हैं। दामों की कहानी पर की पड़ताल में सामने आया है कि इस बार विदेश से आने वाला आयातित तेल यहां नहीं पहुंचा। ऐसे में सरसों के भाव उछाल मार गए। कोरोना काल में खरी शुद्धता और अन्य तेलों के मुकाबले सेहतमंद माने जाने वाली सरसों ने इस बार खास मुकाम हासिल कर लिया।
देश में खाद्य तेलों की आपूर्ति विदेशों से होती रही है। भारत में करीब 110 लाख टन सोयाबीन, रिफाइंड एवं पाम ऑयल की आपूर्ति होती है। इस बार यह आपूर्ति यहां नहीं हुई है। ऐसे में खाद्य तेल के रूप में सरसों ही शेष रही। साथ ही अन्य वर्षों की बात करें तो पाम ऑयल और सोयाबीन तेल 30 से 40 रुपए प्रति किलो सरसों से नीचे रहता था, जो इस बार महज 10 से 15 रुपए ही है। ऐसे में शुद्धता के लिहाज से लोग सरसों के तेल को प्राथमिकता दे रहे हैं। यदि आयातित तेल सस्ते होते तो सरसों के भावों में कुछ गिरावट आ सकती थी। विदेशों से खाद्य तेल की आपूर्ति के लिए करीब 67 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं, जो इस बार सरकार ने किसानों को ही देने का मन बनाया है। इसके चलते इस बार सरसों के भाव बुलंदियां छू रहे हैं।

इस बार रकबा बढऩा तय

सरसों उत्पादन में राजस्थान के सिरमौर है। वहीं भरतपुर अव्वल दर्जे की सरसों उपज करता है। प्रति वर्ष जिले में करीब 68 से 70 लाख हैक्टेयर में सरसों की बुवाई की जाती है। इस बार भावों ने किसानों की बल्ले-बल्ले कर दी है। ऐसे में अनुमान है कि इस बार सरसों की बुवाई सौ से सवा सौ लाख हैक्टेयर में हो सकती है। सरसों तेल उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि किसानों की आय दोगुनी करने की मंशा के बीच यदि विदेशी आयातित तेलों से नाता तोड़ लिया गया तो सरसों के भाव फिर से अच्छे रहेंगे। इसके अलावा यदि सरसों की ज्यादा हैक्टेयर में बुवाई होती है तो निश्चित रूप से गेहूं का रकबा कम होगा। गेहूं की कम खेती होने से उसकी भी कद्र बढ़ेगी। इसका भी लाभ किसान को मिलेगा।

शुद्धता के साथ सेहत का रखवाला

कोरोना काल में लोग सेहत के प्रति बेहद फिक्रमंद रहे हैं। खास तौर से खाद्य पदार्थों के मामले में किसी भी प्रकार का समझौता नहीं हुआ है। यही वजह रही है कि लोगों ने सरसों की शुद्धता परखने के बाद इसे सेहत के लिए बेहतर मानते हुए अन्य तेलों के मुकाबले अपनी रसोई में जगह दी। तेल उद्योग से जुड़े लोग बताते हैं कि पहले अन्य तेलों के सस्ता होने के कारण इसमें मिलावट की गुंजाइश रहती थी, लेकिन अब सरसों का तेल पूरी तरह से शुद्ध मिल रहा है। अन्य तेलों के करीब-करीब यही भाव रहने के कारण इसमें अब मिलावट नहीं हो रही है। इसके अलावा अन्य खाद्य तेलों के मुकाबले इसे सेहत के लिए अच्छा माना जा रहा है। ऐसे में सरसों के भाव स्थिर बने हुए हैं।

90 लाख टन सरसों का उत्पादन

जिले में इस बार करीब 90 लाख टन सरसों का उत्पादन हुआ है, जो पिछले वर्ष से करीब 15 लाख टन अधिक है। इस उत्पादन ने तेल उद्योग की बांछें खिला दी हैं। भरतपुर में हर रोज करीब 50 हजार क्विंटल सरसों की पिराई हो रही है। यह तेल उद्योग के लिए खासी राहत दे रही है। इस बार सरसों की फसल समर्थन मूल्य से भी ऊंचे दामों पर बिक रही है। समर्थन मूल्य 4625 रुपए तय किया गया था, जबकि इस बार सरसों के दाम साढ़े छह हजार रुपए प्रति क्विंटल से अधिक हैं। इसका भरपूर फायदा किसानों को मिल रहा है। यदि पाम ऑयल और रिफाइंड के दामों में कमी आती है तो सरसों के भाव भी गिर सकते हैं, लेकिन अंतराष्ट्रीय बाजार में इनके दामों में कमी की कोई संभावना फिलहाल नजर नहीं आ रही।

देश के पटल पर अमिट छाप

भरतपुर के तेल उद्योग ने देश के पटल पर अमिट छाप छोड़ी है। तेल उद्योग जहां स्थानीय लोगों के लिए जीवनरेखा है। वहीं आला दर्जे की साख ने इसे अव्वल मुकाम दिया है। भरतपुर की सरसों से बना तेल देश के विभिन्न प्रांतों के लोगों की जुबां पर है। भरतपुर में सरसों पिलाई का प्रतिवर्ष का करीब 10 हजार करोड़ रुपए का व्यापार है। ऐसे में यह उद्योग देशभर में भरतपुर मॉडल के नाम से पहचान बना रहा है। मुख्य रूप से बिहार, बंगाल, आसाम, त्रिपुरा, छत्तीसगढ़ एवं झारखंड की रसोई भरतपुर के तेल से महकती हैं। इसकी खास वजह यह है कि इन प्रदेशों में मछली और चावल बड़े चाव से खाए जाते हैं। मछली से आने वाली दुर्गंध का भरतपुर में तैयार होने वाला झागदार सरसों का तेल खात्मा करता है।

यह चल रहे खाद्य तेलों के भाव

सोयाबीन तेल 150 रुपए प्रतिकिलो

सरसों तेल 160 रुपए प्रति किलो

पाम ऑयल 135 रुपए प्रति किलो

चावल तेल 130 रुपए प्रति किलो

आंकड़ों में सरसों

- 75 ट्रक प्रतिदिन सरसों का तेल जाता है बाहर

- 10 हजार करोड़ की होती है पिलाई प्रतिवर्ष

- 50 हजार क्विंटल सरसों प्रतिदिन होती है क्रश

- 30 करोड़ प्रतिदिन की होती है पिलाई

- 17500 क्विंटल तेल प्रतिदिन बनता है भरतपुर में

पांच वर्षों की आवक एवं भाव

वर्ष आवक न्यूनतम दर अधिकतम दर

2016-17 580119 3550 4881

2017-18 959578 3600 4010

2018-19 885091 3355 4075

2019-20 1017764 3400 4600

2020-21 881506 3600 6400

2021-22 180114 5400 7400

(नोट: आवक क्विंटल में एवं 2021-22 के भाव मई माह तक)


इनका कहना है

खाद्य तेलों का जो पैसा विदेशों को जाता था। वह इस बार किसानों को मिल रहा है। अन्य खाद्य तेलों के भाव भी नहीं गिरे हैं। यही वजह है कि इस बार सरसों के भाव बढ़े हैं। सरसों के गुणों के सामने यह भाव कतई ज्यादा नहीं हैं। एक परिवार का पांच किलो तेल का खर्च होगा। यदि सरसों का तेल दस रुपए भी महंगा है तो एक माह का चालीस से पचास रुपए होता है। इतने कम पैसों के लिए कोई भी व्यक्ति इससे समझौता नहीं करेगा। इस बार सरसों की बम्पर आवक ने तेल उद्योग को बड़ी राहत दी है। बरसों से बंद पड़ी तेल मिलें अब फिर से चलने लगी हैं।

- कृष्ण कुमार अग्रवाल, अध्यक्ष भरतपुर ऑयल मिलर एसोसिएशन।

सरसों के भाव किसानों के हित में हैं। हर रोज घटते-बढ़ते भावों की बजाय मंडी में सरसों के भाव स्थिर कर देने चाहिए। इससे किसानों को और लाभ मिलेगा। आगे भी सरसों सहित अन्य फसलों के भाव बढऩे चाहिए, इससे किसानों को राहत मिल सके।

- ललित पला, किसान

हमारे यहां विदेशों से तेल आता है। इनके भाव बढ़े हुए हैं। इस कारण यहां भी तेजी है। कोरोना काल में सरसों के तेल को खासा महत्व मिला है। यह स्वास्थ्य के लिहाज से अच्छा है। सोयाबीन इस बार महंगा है। इसके चलते सरसों के भावों में तेजी आई है।

- भूपेन्द्र गोयल, सरसों व्यापारी

Meghshyam Parashar Bureau Incharge
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