...करोड़ों की जमीन की फाइल ही गायब

17 साल से सिसक रही शिकायत, निगम से फाइल ही गायब

-अब समिति ने खटखटाए न्यायालय के द्वार, संभागीय आयुक्त के रिपोर्ट मांगने के बाद नगर निगम भेज चुका रिपोर्ट

By: Meghshyam Parashar

Published: 11 Jan 2021, 01:17 PM IST

भरतपुर . शहर के हीरादास बस स्टैण्ड के सामने खादी ग्रामोद्योग समिति की ओर से निर्मित 100 दुकानें मनमर्जी की नींव पर खड़ी हो गई हैं। बिना मंजूरी और गैर अनुमति के बनी यह दुकानें पिछले 17 साल से 'विवादÓ में हैं। खास बात यह है कि इससे पहले समिति की 61 दुकानों को जिला प्रशासन अवैध निर्माण मानकर तोड़ चुका है, लेकिन अब 30 दुकानों के मामले में 17 साल से कागज इधर से उधर दौड़ रहे हैं, लेकिन अब तक नतीजा सिफर ही है।
शहर के हीरादास बस स्टैण्ड के सामने खादी ग्रामोद्योग समिति की ओर से तीस दुकानों के अवैध निर्माण का मामला जिला सतर्कता समिति एवं तत्कालीन संभागीय आयुक्त के पास पहुंचा था, लेकिन इस मामले में न तो समिति के आदेशों की पालना हुई और न ही संभागीय आयुक्त के निर्देश माने गए। पूर्व में खादी समिति की ओर से बिना अनुमति के निर्मित की गईं 61 दुकानें के टूटने का खामियाजा कर्मचारियों को भुगतना पड़ा था। जानकार बताते हैं कि उस दरिम्यान खादी समिति के कार्मिकों का वेतन भी बंद हो गया था। शिकायत पर मामले के तूल पकडऩे पर समिति को अवैध निर्माण रोककर अनुमति लेकर ही निर्माण की बात कही थी, लेकिन इसके बाद भी बिना अनुमति के ही दुकानें बना ली गईं। खास बात यह है कि नगर निगम के कार्मिकों की दरियादिली के चलते यह निर्माण सहज रूप से हो गया। अधिकारियों तक पहुंची श्किायतों में आरोप है कि औद्योगिक क्षेत्र की इस जमीन को न तो कॉमर्शियल में रूपांतरण कराया और न ही निर्माण संबंधी अनुमति ली गई। सूत्रों का दावा है कि खादी समिति की ओर से इस निर्माण के लिए न तो कोई आवेदन किया गया और न ही अनुमति ली गई। ऐसे में नगर निगम की नाक के नीचे अवैध निर्माण होता चला गया। अब इस कथित अवैध निर्माण को लेकर नगर निगम ने चुप्पी साध रखी है।

दुकानदार भी कर चुके हैं शिकायत

इस प्रकरण में वर्ष 2003 में जिला खादी ग्रामोदय समिति की दुकानों में किरायेदार रहे लोगों ने भी जिला कलक्टर को शिकायत की थी। शिकायत में दुकान आवंटन में धोखाधड़ी आरोप लगाते हुए कहा था कि खादी समिति ने वर्ष 1996 में औद्योगिक प्रयोजनार्थ भूमि पर स्थानीय प्रशासन की बिना अनुमति प्राप्त किए नगरपरिषद की सड़क सीमा में दुकानों का निर्माण किया था। इस दुकानों को वर्ष 2001 में स्थानीय प्रशासन ने ध्वस्त कर दिया। इन सभी दुकानों केा 50 हजार रुपए एडवांस राशि लेकर समिति ने उन्हें 500 रुपए मासिक किराये पर दिया था।

यह है मामला

जिला सतर्कता समिति में इस मामले की शिकायत वर्ष 2003 में दर्ज हुई। समिति ने इस मामले की जांच के आदेश नगरपरिषद को दिए। जांच में खादी ग्रामोद्योग समिति के संचालकों को नगरपरिषद की बिना अनुमति के 30 दुकानों का अवैध निर्माण करने का दोषी मानते हुए रिपोर्ट समिति को सौंप दी। इस पर समिति ने खादी समिति के संचालकों को निर्माण नहीं करने को पाबंद कर प्रकरण को समाप्त कर दिया। इस मामले की दूसरी शिकायत वर्ष 2004 में तब की गई जब खादी समिति के संचालकों ने निर्माण जारी रखा। समिति ने एक बार फिर से नगरपरिषद को आदेश दिए, लेकिन नगरपरिषद ने निर्माण स्थल नगर सुधार न्यास के अधिकार क्षेत्र में होना बताया। मामला तूल पकडऩे पर इस मामले में न्यास ने स्पष्ट किया कि वह क्षेत्र नगरपरिषद का ही है। यह स्थिति स्पष्ट होने के बाद नगरपरिषद ने निर्माण स्थल पर अदालत से स्थगन आदेश होना बता दिया। इधर निर्माण कार्य चलता रहा। खास बात यह है कि जब समिति ने स्थगन आदेश संबंधी दस्तावेज मांगे तो वह उपलब्ध नहीं कराए गए। इसके बाद फिर से मामला संभागीय आयुक्त तक पहुंचा, लेकिन उसके बाद यह मामला अधरझूल में ही है।

निगम के पास नहीं फाइल

दुकान निर्माण संबंधी शिकायत दर शिकायत के बाद निगम प्रशासन के कान पर जूं रेंगी तो कार्यालय में फाइल तलब की गई, लेकिन खासी मशक्कत के बाद भी फाइल नहीं मिली। ऐसे में शिकायकर्ता से भी शिकायत संबंधी दस्तावेज मांगे गए, जो उनकी ओर से निगम को उपलब्ध कराए गए। अब उसी फाइल के आधार पर शिकायत का जवाब देने के लिए निगम ने अधिवक्ता के पास फाइल भेजी है। इस मामले में मौका कमिश्नर भी नियुक्त किया गया है, जो मौका रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगा।

यह है समिति का दावा

इस मामले में खादी समिति का कहना है कि नगरपरिषद को आवेदन, नक्शा आवश्यक शुल्क व स्वामित्व के दस्तावेज प्रस्तुत किए थे। इसके बाद ही निर्माण किया गया था। आयुक्त ने 18 जनवरी 1992 को जमीन के साक्ष्य मांगे थे। सभी दस्तावेज अपने नोटिस 23 जनवरी 1992 के साथ पेश किए थे। निर्माण के संबंध में 10 जून 2004 से निर्माण स्वीकृति तथा भू स्वामित्व के दस्तावेज मांगे थे। जिसका लिखित जवाब 21 जून 2004 को पेश किया था। अब निगम ने 2 नवम्बर 2020 को निर्माण स्वीकृति की मांग की है, जबकि निर्माण करीब 50 साल पुराना है। ऐसे में समिति ने दावा निरस्त करने की बात कही है।


इनका कहना है
-यह दुकानें खादी समिति की पुरानी जायदाद हैं। यह निर्माण भी करीब 20 से 25 साल पुराना है। नगर निगम ने हमसे कागज प्रस्तुत करने को कहा है। समिति की ओर से उस समय के दस्तावेज निगम को दे दिए हैं। हमने इसके लिए कोर्ट में दावा भी किया है कि यह हमारी पुरानी जायदाद है। ऐसे में नोटिस देना गलत है।

राजेन्द्र शर्मा, मंत्री खादी ग्रामोद्योग समिति

-हाल में ही ज्वॉइन किया है। मेरे समय में इससे संबंधित कोई कागज नहीं आया है। बाकी संबंधित शाखा से जानकारी कर पड़ताल की जाएगी।

डॉ. राजेश गोयल
आयुक्त नगर निगम

Meghshyam Parashar Bureau Incharge
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