कोरोना से जंग: साहब...आए थे कमाने, अब आ गया जान पर संकट

-किसी के परिवार ने घर गिरवी रखकर राशि भेजी तो किसी ने उधार लेकर
-यूपी, बिहार जा रहे कामगारों की निकल कर आई दर्दभरी कहानियां

By: Meghshyam Parashar

Published: 10 May 2020, 04:35 PM IST

भरतपुर. किसी को एक हजार किमी चलना है तो किसी को 500, रोजी रोटी का संकट सिर पर है। नंगे पैर, भूखे प्यासे समूहों के समूह इस आस में चले जा रहे हैं कि वे किसी भी तरह अपने घर पहुंच जाएं। फूटे हुए छालों पर पसीना लगने से दर्द उठता है। तपती दोपहर में बिना किसी सहारे 42 डिग्री तापमान के बीच इनका सफर भी बहुत खौफनाक होता है। जहां पशु-पक्षी भी गर्मी के कारण दोपहर को नजर नहीं आते, वहां ये मजबूर मजदूर जिंदगी बचाने की कोशिश और घर जाने की आस में पैदल सफर करते नजर आ रहे हैं। पत्रिका ने शनिवार दोपहर 12 बजे से तीन बजे ऐसे ही मजदूरों के

समूहों से बात की तो उनका दर्द निकल कर सामने आया।

दोपहर 12.15 बजे बहनेरा गांव के पास छांव देखकर कुछ देर के लिए जयपुर से आए कामगार के परिवार का समूह ठहर गया। गर्मी और भूख से बेहाल मजदूर जैसे ही जमीन पर बैठे पैरों से चप्पल और जूता निकालकर छाले देखने लगे। पैर के फूटे छालों पर पसीने का पानी लगने से दर्द से कराहते मजदूरों से जब सवाल किया कि वे जयपुर में ही क्यों नहीं रुक गए?। पैर के दर्द को भूलकर मजदूरों ने कहा वहां दो वक्त खाना नहीं मिल रहा था। बिना खाए तो हम वहां भी मर जाते। इससे तो अच्छा है कि राह चलते हुए कम से अपने घर या रास्ते में दम तोड़ेंगे तो आत्मा को सुकून मिलेगा। जब मरना ही है तो यहां गैरों के बीच क्यों, अपने घर जाकर अपनों के पास मरेंगे। उत्तरप्रदेश के बलिया निवासी कौशल्या देवी अपने तीन बेटे, पुत्रवधु, दो पोते व दो पोतियों के साथ रोते हुए जा रही थी। तीन साल की बिटिया अस्मिता बिलखते हुए कह रही थी कि अम्मा अब गाड़ी बुला लो...पांव में दर्द हो रहा है। बहुत प्यास लग रही है। यह अकेला एक परिवार नहीं था जो कि भूख-प्यास से बेहाल नजर आ रहा था। ऐसे कितने ही समूहों में लोग मजबूरी का सफर करते नजर आ रहे थे।

मकान गिरवी रखकर मां ने भेजे 70 हजार रुपए, साइकिल खरीद जा रहे गांव

दोपहर 01.34 बजे ऊंचा नगला बॉर्डर के पास गोरखपुर जा रहे 16 साइकिल सवारों को देखकर पुलिस ने उन्हें रोका। उनसे पूछा तो वह रो पड़े। बोले कि साहब जयपुर में फर्नीचर का काम करते थे, वहां सेठ भी परेशान हो गया था, क्योंकि जब काम ही नहीं चल रहा तो वो भी कब तक हमें बैठे-बैठे खिलाता रहेगा। सेठ का भी परिवार था। हमारे पास भी इतने रुपए नहीं थे। पिताजी सालों से पहले ही दुनिया को छोड़कर जा चुके थे। परमेश्वर सिंह ने बताया कि जब कोई उपाय नहीं हुआ तो मां को फोन कर कहा कि मकान को पड़ोसी को गिरवी रख दे। पड़ोसी ने ही उनके खाते 70 हजार रुपए डाले। फिर 4400 रुपए के हिसाब से 16 साइकिल खरीदने के बाद हम परिवार के 21 सदस्य जयपुर से निकल पड़े। डेढ़ दिन में ही जयपुर से भरतपुर का सफर तय कर लिया, लेकिन पांव में इतने बड़े छाले हो चुके हैं कि अब साइकिल चलाने की हिम्मत भी शेष नहीं रही है।

पहले रोजगार गया अब भूख-प्यास ने तोड़ी हिम्मत

जोधपुर से आगरा जा रहे जयसिंह ने बताया कि वह पत्नी व भाई के परिवार के साथ पिछले नौ दिन से पैदल चल रहा है। रास्ते में कहीं खाने को मिल जाता है तो कभी भूखे ही सफर करने की मजबूरी होती है। एक कंपनी में दोनों भाई चौकीदारी का काम करते थे, लेकिन जब लॉकडाउन शुरू हुआ तो कंपनी ने भी साफ कह दिया कि अब तनख्वाह नहीं दी जाएगी। इसलिए एक महीने तक काफी इंतजार करने के बाद पैदल ही सफर कर गांव जाने का निर्णय लिया। गर्मी के कारण पैदल चलना बहुत मुश्किल हो रहा है।

तीन दिन में नौ हजार प्रवासी पहुंचे बॉर्डर

पिछले तीन दिन में करीब नौ हजार प्रवासियों को सीमा तक पहुंचाया गया है। अब तक यह आंकड़ा 15 हजार तक पहुंच गया है। पिछले तीन में राजस्थान में फंसे उत्तरप्रदेश व अन्य राज्यों के लगभग 8849 प्रवासी मजदूरों को जाजम पट्टी यूपी बॉर्डर पर छोड़कर विदा किया है। इससे पहले भी सात हजार प्रवासियों को रारह स्थित बॉर्डर पर छोड़ा था। राजस्थान रोडवेज ने अब तक करीब 15 हजार प्रवासियों को सीमा पार करवाई है। वहीं उत्तरप्रदेश प्रशासन ने भी 3 हजार प्रवासियों को राजस्थान सीमा में प्रवेश कराया है। रोडवेज चालक नीरज दाहिना ने बताया कि 7 मई को 118 बसों में 3750 प्रवासी, 8 व 9 मई को सुबह तक 103 बसों से 3824 प्रवासियों को सीमा पार कराई है। रात 12 बजे से सुबह सात बजे तक 33 बसों से 1275 प्रवासियों को छोड़ा गया। इन दिनों से पहले एक बार और बसें चलाई गई। इनसे करीब 7 हजार प्रवासियों को उनके राज्य की सीमा के पास रारह बॉर्डर छोड़ा गया। दूसरी ओर कई दिनों से बस स्टैण्ड में खड़ी पश्चिमी राजस्थान की करीब 130 बसों को रिलीव कर दिया है। शेष 15 बसों को स्थिति देखने के बाद रिलीव किया जाएगा।

बालाजी में पुलिस ने दिखाई दया और हमारे यहां उन्हें नीचे उतारा

भुसावर . कुछ मजदूर एनएच 21 जयपुर-भरतपुर पर बाछरैन के पास पहुंचे तो इन्होंने बताया कि बालाजी पर पुलिस वालों ने एक ट्रक में बिठाया तो सोचा कुछ राहत मिलेगी, लेकिन जैसे ही भरतपुर की सीमा में ट्रक घुसा तो भरतपुर के पुलिस प्रशासन ने मजदूरों को उतार दिया। भरतपुर प्रशासन की ओर से ऐसे पैदल चलने वाले पुरुष-महिला व छोटे-छोटे बच्चों के लिए कोई साधन उपलब्ध नहीं कराए गए।

बगैर पास आने वालों को वापस भेज रहे हरियाणा

पहाड़ी. हरियाणा बॉडर से श्रमिकों का आने-जाने का सिलसिला जारी है। शनिवार को अलवर, दिल्ली एवं फरीदाबाद से प्रवासी आए। कोई पैदल तो कोई साइकिल से अपने घर जा रहा था। विहार के पूर्णिमा निवासी मोहम्मद जियाउल हक ने बताया कि हम फिरोजपुर झिरका हरियाणा में मजदूरी करते थे। काम बंद होने से हमें खाने-पीने की समस्या हो गई। साइकिल खरीदकर चार जने विहार के लिए रवाना हुए। बॉर्डरों पर जांच के बाद आगे भेज रहे हैं, जबकि, बॉर्डर पर तैनात कर्मियों का कहना है कि बिना पास के आने वाले को वापस हरियाणा भेज दिया जाता है।

Meghshyam Parashar Bureau Incharge
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