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सुजानगंगा: ऑक्सीजन लेवल शून्य, अब भी हो रही मछलियों की मौत

-एक वर्ष बाद इतनी तैयारी के बाद भी मछलियों की मौतगाह बनी ऐतिहासिक नहर, अफसरों का दावा...ऑक्सीजन लेवल कम व सर्दी से हो रही मछलियों की मौत

भरतपुर

Published: December 22, 2021 09:51:12 am

भरतपुर. 40 साल से चुनावी मुद्दा बनती रही ऐतिहासिक सुजानगंगा नहर पर अब दुबारा से सभी की नजर है। एक साल बाद फिर से मछलियों की मौत का मामला सामने आया है। नगर निगम का दावा है कि अभी तक 1100 से अधिक मृत मछलियां निकाली जा चुकी है। अभी मृत मछलियों को नहर से बाहर निकालने का काम दो-तीन दिन तक चलाया जाएगा। इसके साथ सुजानगंगा नहर के आसपास रहने वाले लोगों के घरों तक बदबू पहुंचने लगी है। उल्लेखनीय है कि पिछले करीब तीन दिन से सुजानगंगा नहर में मछलियों की मौत हो रही है। हकीकत यह है कि पहले दिन कम मछलियों की मौत हुई, अब वह बढ़ रही है। सर्वाधित मृत मछलियां मंशा देवी मंदिर के आसपास निकल रही हैं। इससे पहले नवंबर 2020 में भी दर्जनों टन मृत मछलियों को बाहर निकाला गया था। उस समय ऐसा प्रदेश का पहला मामला था। जहां किसी ऐतिहासिक नहर में इतनी बड़ी संख्या में मछलियों की मौत हुई है। उस समय भी यह मामला सीएमओ तक पहुंचा था।
सुजानगंगा नहर के पानी की जांच के लिए नमूने जलदाय विभाग की प्रयोगशाला भेजे गए थे। जहां जांच रिपोर्ट भी मंगलवार को नगर निगम भेज दी गई। इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि सुजानगंगा नहर का ऑक्सीजन लेवल शून्य प्रतिशत है। हालांकि अधिकारियों ने अभी सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की प्रयोगशाला से भी जांच कराने को कहा है। फिलहाल नगर निगम के अधिकारियों का कहना है कि मछलियां सर्दी में ऊपर आती हैं तो वापस नीचे जाती हैं। वहां पानी गर्म रहता है। इससे सर्दी के साथ ही उन्हें पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है। इससे मछलियों की मौत हो जाती है। कुछ दिन पूर्व ही नहर में 15 हजार मछलियों का बीज डाला गया था। अधिकारियों का दावा है कि मृत मछलियां पुरानी हैं। एक फ्लोटिंग फाउंटेन लग चुका है। अभी 30 और लगना बाकी है।
सुजानगंगा: ऑक्सीजन लेवल शून्य, अब भी हो रही मछलियों की मौत
सुजानगंगा: ऑक्सीजन लेवल शून्य, अब भी हो रही मछलियों की मौत
जिस विभाग की जिम्मेदारी, उसका काम सिर्फ नोटिस देना

सुजानगंगा नहर में मछलियों की मौत हो या सौंदर्यकरण कार्य, इन सभी के पीछे मुख्य कारण इसका पुरातत्व विभाग में होना है। क्योंकि पुरातत्व विभाग की ओर से आज तक कभी भी इसको लेकर प्रोजेक्ट तक नहीं बनाया। अगर किसी अन्य विभाग की ओर से काम कराने की कोशिश भी की गई तो काम रोकने अवश्य आ गए। मतलब यह है कि पुरातत्व विभाग ने अब तक नहर को लेकर खानापूर्ति ही की है। हाइकोर्ट ने स्पष्ट आदेश दे रखे हैं कि सुजानगंगा नहर में गंदे पानी को गिरने से रोका जाए व नहर की समुचित सफाई व्यवस्था पर ध्यान रखा जाए। इस पर भी अधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया।
इन बिंदुओं से जानिए मौत का कारण व क्या होना चाहिए

1. सुजानगंगा नहर के पानी का ऑक्सीजन लेवल शून्य प्रतिशत है। जबकि यह लेवल तीन से अधिक होना चाहिए। तभी जलीय जीव सुरक्षित रह सकते हैं।
2. कचरा डालने व गंदा पानी आने के कारण यह पानी बिल्कुल जहरीला हो चुका है। इसमें कार्बनडाइ ऑक्साइड व मिथेन गैस बन रही है। घरों में काम करने वाले लोग भी यहां कचरा फेंकते हैं। इससे पानी सड़ रहा है।
3. उदाहरण के बतौर यहां जितने भी लोग सुसाइड करने के लिए कूदते हैं। जब मृतक की बॉडी बाहर आती है तो उसका शरीर काला व नीला पड़ जाता है। इसका सीधा सा कारण है कि पानी जहर बन चुका है। इसमें मिलने वाले कैट फिश भी खाने योग्य नहीं होती है। क्योंकि यह मछली कार्बन डॉइऑक्साइड को सहन कर सकती है।
4. अचानक अधिक ठंड एवं ऑक्सीजन की कमी से मछलियों में अल्सरेटिव ङ्क्षसड्रोम वायरस रोग फैलना प्रारंभ हो जाता है। इसके फलस्वरूप मछलियों के शरीर पर लाल चकते पडऩा चालू हो जाते हैं। पंख के किनारे सडऩ पैदा होने लगता है। इससे मछलियों की मौत भी होती है और उनका विकास ठप हो जाता है। मछलियों की मौत की मुख्य वजह है पानी में ऑक्सीजन की कमी। बादल छाने पर प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया धीमी हो जाती है, जिसका असर पेड़ के जरिए बहने वाली हवा पर भी होता है। इन दिनों में नहर में हलचल न के बराबर होती है। दूसरी तरफ शहर के बीच स्थित सुजानगंगा नहर में लोगों की ओर से गंदगी डालने से तालाब का ऊपरी हिस्सा कचरे से पट जाता है, जबकि निचले तल पर तरह-तरह की धातुओं का जमावड़ा हो जाता है। इन सारी चीजों के चलते पानी में ऑक्सीजन धीरे-धीरे कम होने लगती है। ऑक्सीजन की कमी से तालाब में रहने वाले जीव ज्यादा दिन तक जिंदा नहीं रह पाते। सबसे ज्यादा परेशानी तल में रहने वाली मछलियों को होती है, क्योंकि वहां पर ऑक्सीजन न के बराबर होती है।
भ्रष्टाचार की स्कीम के बोझ तले दबी सुजानगंगा

यह सही बात है कि फिलहाल प्रशासन ने सुजानगंगा नहर को संवारने कोशिश की है, अगर पहले भी यह ध्यान दिया गया होता तो हालात बेहतर हो सकते थे। वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीनाथ शर्मा ने बताया कि वह वर्ष 1985 से सुजानगंगा नहर के संरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं। 1996 में हाइकोर्ट में रिट दायर की गई थी। उस समय शहर की जनता ने काफी आंदोलन किया था। खुद उस समय के विधायक स्व. आरपी शर्मा ने भी विधानसभा में तीन बार मुद्दा उठाया था। हालांकि राज्य सरकार की ओर से इस प्रकरण में हर बार लापरवाही की जाती रही है। वर्ष 2003 से लेकर अब तक करीब चार से छह बार हाइकोर्ट की ओर से सुजानगंगा नहर को प्रदूषित होने से बचाने के आदेश दिए जा चुके हैं। हकीकत यह है कि अधिकारियों के लिए यह नहर कमाई का साधन बनकर सामने आती रही।
गलत नाले के निर्माण पर ही खर्चे तीन करोड़ रुपए

हाइकोर्ट के आदेश के बाद सुजानगंगा नहर के चारों ओर एक नाला बनाया गया था, इस पर करीब तीन करोड़ रुपए व्यय हुए थे। इंजीनियरों ने नाले को भी सुजानगंगा नहर के लेवल से डेढ़ मीटर ऊपर बना दिया। हाइकोर्ट ने सात इंजीनियर को दोषी मानते हुए रिकवरी के आदेश दिए। तनख्वाह में से राशि जमा होना शुरू हो गई। फिर तय हुआ कि कौन कितना दोषी है। सरकार ने जांच कराई तो 16 सीसीए की जांच को 17 सीसीए में कर दिया। हाइकोर्ट ने दुबारा जांच की। आज तक कोई जांच नहीं हुई है। तीन करोड़ रुपए बर्बाद हुआ। तोडऩे में अलग व्यय हुआ। नगर निगम ने यह राशि आरएसआरडीसी को दी थी। इसके बाद सुजानगंगा नहर का पानी निकालने पर लाखों रुपए खर्च किए गए। तुलाई कर मिट्टी निकाली गई। वो भी काम बंद हो गया। मिट्टी व गंदा पानी जमा पड़ा है। इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से कहा कि बजट दिया जाए। एक-एक, दो-दो करोड़ रुपए आए। काम अधूरा ही रहा।
इनका कहना है

-मैंने प्रशासनिक व नगर निगम के अधिकारियों को निर्देशित कर दिया है। निरंतर सफाई के लिए भी काम कर रहे हैं। सुजानगंगा नहर की हालत सुधारने का काम हमने ही शुरू कराया है। मछलियों की मौत बेहत दुखद है। जल्द ही सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे।
डॉ. सुभाष गर्ग
राज्यमंत्री
-रिपोर्ट आ चुकी है। ऑक्सीजन लेवल बहुत कम है। अब अन्य उपाय भी कर रहे हैं। सर्दी में गर्म-ठंडा पानी भी मछलियों की मौत का बड़ा कारण है। एक फ्लोटिंग फाउंटेन लग चुका है। एक और जल्द लग जाएगा। 30 लगाए जाने हैं।
कमलराम मीणा
आयुक्त नगर निगम

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