scriptThe blow of failure on the strings of breath | सांसों की डोर पर मुफलिसी की मार | Patrika News

सांसों की डोर पर मुफलिसी की मार

- दोनों किडनी फेल, रामआसरे पर जिंदगानी

भरतपुर

Published: January 10, 2022 05:05:10 pm

भरतपुर . पिता का साया सिर से उठा तो मुसीबतों ने बिजेन्द्र के घर को अड्डा ही बना लिया। सांसों की डोर पर भी मुसीबत की खूब मार है। मां और पत्नी को मिलने वाली मजदूरी से घर का गुजारा तो चल रहा है, लेकिन 'भविष्यÓ रोशनी के कतरे-कतरे को तरसता नजर आ रहा है। हम बात कर रहे हैं झील का बाड़ा बयाना के गांव नावली निवासी बिजेन्द्र प्रजापत की।
नावली निवासी बिजेन्द्र (33) के सिर से तीन साल पहले मजदूर पिता का साया उठ गया। पत्थर का काम करने वाले बिजेन्द्र को इस बीच पता चला कि उसकी दोनों किडनी फेल हो चुकी हैं। यह खबर सुनकर उसके सारे अरमान आंसुओं में धुल गए। अब बिजेन्द्र की जिंदगी डायलसिस के सहारे है। बिजेन्द्र ने बताया कि उसके घर में बिजेन्द्र के साथ उसकी मां, पत्नी महावीरी एवं तीन बच्चे हैं। परिवार गुजारा मां और पत्नी को मिलने वाली मजदूरी से ही चल रहा है। बिजेन्द्र ने बताया कि उसकी जिंदगी दवाओं के सहारे है। ऐसे में हर माह करीब साढ़े तीन हजार रुपए खर्च होते हैं, लेकिन आमदनी के नाम पर महज मजदूरी का पैसा है। मां और पत्नी गांव में खेतों पर ही काम करने जाती हैं, उन्हें भी कभी मजदूरी मिल पाती और कभी नहीं। सरकारी मदद इस परिवार से कोसों दूर है। बिजेन्द्र ने बताया कि उसके पिता भी मजदूरी करते थे। उनका श्रम विभाग में पंजीयन था। पिता की मौत के बाद उन्हें कुछ पैसा तो मिल गया, जिससे काम चल गया, लेकिन उनका शेष पैसा अभी तक नहीं मिला है। इस पैसे के लिए बीमार बिजेन्द्र ने कई बार विभाग के चक्कर लगाए हैं, लेकिन अभी तक नतीजा सिफर ही रहा है।
सांसों की डोर पर मुफलिसी की मार
सांसों की डोर पर मुफलिसी की मार
उम्मीद लिए पहुंचा, मिला राशन

बिजेन्द्र की अब सप्ताह में दो दिन डायलसिस होती है। इसके लिए उसे भरतपुर आना पड़ता है। शनिवार को भी वह आरबीएम अस्पताल आया। भरतपुर आकर उसने परिवार की दयनीय हालत से स्वास्थ्य मंदिर संस्थान को अवगत कराया। इस पर स्वास्थ्य मंदिर की ओर से उसे कंबल, आटा, दाल, तेल, बच्चों के कपड़े एवं अन्य राशन सामग्री मदद के रूप में दी गई। बिजेन्द्र ने बताया कि मजदूरी से इतना ही मिल पाता है कि उसके परिवार का बमुश्किल रोटी का जुगाड़ हो पाता है। बीमारी पर पैसे खर्च करने के लिए उसके पास कोई जरिया नहीं है। बिजेन्द्र की एक बेटी सरकारी स्कूल में पढऩे जाती है, जबकि दो बच्चों का अभी छोटे होने के कारण एडमिशन नहीं हुआ है। स्वास्थ्य मंदिर ने एक बच्चे की पढ़ाई की जिम्मेदारी भी ली है। साथ ही अन्य भामाशाह नहीं मिलने तक राशन पहुंचाने की बात कही है।
इनका कहना है

बिजेन्द्र के परिवार की स्थिति काफी दयनीय है। दोनों किडनी फेल होने के बाद दवाओं पर खूब पैसा खर्च हो रहा है। यदि प्रशासन मदद करे तो दवाओं की व्यवस्था फ्री हो सकती है। फिलहाल राशन आदि की व्यवस्था स्वास्थ्य मंदिर की ओर से की गई है।
- डॉ. वीरेन्द्र अग्रवाल, संस्थापक स्वास्थ्य मंदिर संस्थान भरतपुर

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