धार्मिक ही नहीं पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ा है गोवर्धन पूजा का महत्व

-पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक गोवर्धन पूजा पर्व, पांच हजार वर्ष की इस परम्परा का आज भी होता है ब्रज में निर्वाह

By: Meghshyam Parashar

Updated: 15 Nov 2020, 11:16 AM IST

भरतपुर. दीपावली से अगले दिन ब्रज चौरासी कोस सहित पूरे विश्वभर में मनाया जाने वाला वाला गोवर्धन पूजा का पर्व पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक पर्व कहा जा सकता है। आज से पांच हजार वर्ष पहले योगीश्वर श्रीकृष्ण ने इंद्र को बलि देने की प्रथा को तोड़कर उसके स्थान पर गिरिराज पर्वत की पूजा कराकर पर्यावरण संरक्षण का बिगुल बजा दिया। अष्टछाप के कवि और श्रीकृष्ण के अष्टसखा सूरदास, नंददास, परमानंददास, कृष्णदास, छीतस्वामी, गोविन्दस्वामी, चतुर्भुजदास व कुम्भनदास आदि ने गोवर्धन पूजा का साक्षात्कार कर अपने पदों में पर्यावरण संरक्षण का प्रभावी संदेश दिया है। परमानन्ददास लिखते हैं "हमारौ देव गोवर्धन रानौ। जाकी छत्र छांह हम बैठे ताकों त्यज औरें क्यों मानों। नीकौ तृण सुन्दर जल नीकौ नीकौ गोधन रहत अघानौ।।"
साहित्यकार डॉ. भगवान मकरंद ने बताया कि ब्रज चौरासी कोस स्थित गोवर्धन गिरिराज पर्वत पर्यावरण के विपुल भंडार के रूप में देखा जाता था। द्वापर युग में नंद बाबा की आजीविका का प्रमुख साधन का गौचारण था। मुद्रा के रूप में भी गाय का ही प्रयोग किया जाता था। जिसके पास जितनी अधिक गाय होती थी वह उतना ही संपन्न व्यक्ति माना जाता था। गाय का दूध, माखन, दही, गोरस, आदि संपन्नता के प्रतीक माने जाते थे। गौचारण के लिए सघन वन प्रदेश की आवश्यकता थी, इसके लिए सात कोस में फैला हुआ गिरिराज पर्वत गौचारण के लिए विपुल भंडार उपलब्ध कराता था, जहां गाय गिरिराज पर्वत पर उत्पन्न घास, पौधे, लता-पता आदि को खाकर अपना पेट भरतीं थी। गिरिराज पर्वत उसके आसपास के निवासियों की जीवन रेखा व प्राणशक्ति था, परन्तु ब्रजवासी गिरिराज पर्वत समेत पर्यावरण के विभिन्न उपादानों यथा गाय, वृक्ष, सरोवर, कूप, नदी, आदि का महत्व नहीं जानते थे।
नन्दबाबा अपने ग्वाल-बालों के साथ प्रतिवर्ष इन्द्र की पूजा कर उसे बलि देते थे। जब भगवान कृष्ण मात्र सात वर्ष की अवस्था के थे तो उन्हें इस पूजा प्रथा की जानकारी लगी और उन्होने इस बलि प्रथा को पूरी तरह नकारते हुए पर्यावरण के संरक्षण, संवर्धन व उन्नयन का पक्ष लेते हुए जनमानस को गिरिराज पर्वत की पूजा के लिए तैयार किया। उन्होंने बलि प्रथा के स्थान पर पर्यावरण से प्राप्त पदार्थों यथा दूध, दही, घी, शहद, शर्करा अर्थात पंचामृत से गिरिराज पर्वत का अभिषेक कर पर्यावरण के सम्मान का शुभारम्भ किया था जिसका निर्वहन आज भी पुष्टिमार्गीय वल्लभ सम्प्रदाय की विभिन्न हवेलियों (मंदिरों) में आज भी किया जाता है। जहां गाय के गोबर से निर्मित गिरिराज पर्वत का पंचामृत अभिषेक कर उसकी विधिवत पूजा की जाती है और पर्यावरण के संवाहक गायों के चरवाहों अर्थात ग्वारियाओं का पगड़ी (फैंटा) दुपट्टा आदि पहनाकर व प्रसाद देकर तिलक लगाकर सम्मान किया जाता है। इसके साथ ही गायों को विशेष रूप से सजाकर और मेहंदी आदि से उनको रंगकर उनके सींगों पर मोरपंख का मुकुट बांधकर उनकी विशेष प्रकार की पूजा अर्चना भी गायों के प्रति सम्मान की परम्परा के रूप मे आज भी विद्यमान है।

Meghshyam Parashar Bureau Incharge
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