निरोगी रहने के लिए प्राचीन भारत की संस्कृति को अपनाना होगा

आचार्य काष्र्णि लक्ष्मीनारायण शास्त्री ने कहा:

रुदावल. विश्व गुरू कहे जाने वाले भारत में कोरोना जैसी विदेशी बीमारी का आगमन एक विचित्र विडम्बना है। ऋषि मुनियों की ओर से निर्देशित आचरण की पथ भ्रष्टता भारतीय संस्कृति का ह्वास, भोजन कीसात्विकता में बदलाव ही इस महामारी के आगमन के कारण हो सकते है, लेकिन इस महामारी पर विजय पाने के लिए हमें एक बार फिर प्राचीन भारतीय संस्कृति के अनुसार जीवन जीने की शुरुआत करनी होगी। यह विचार रुदावल के आचार्य काष्र्णि लक्ष्मीनारायण शास्त्री ने व्यक्त किए। उन्होने कहा कि
एतहेश प्रसूतस्म सकाशाद ग्रजन्मन:।
स्वं स्वं चरित्रम शिक्षरेन,पृथिव्यां सर्व मानव:।।
इस देश के महापुरुषों ने प्राचीनकाल से ही विश्व को अपने चरित्र की शिक्षा से प्रेरित एवं लाभान्वित किया है आज कोरोना जैसी महामारी को दूर करने के लिए स्वच्छता का ध्यान, बार बार हाथों का धोना, मास्क लगाना, एकान्तवास करना, दूर से अभिवादन आदि उपाय बताएं जा रहे है वो सब पहले से ही भारतीय संस्कृति के अंग हैं। उन्होंने कहा कि जैन ऋषि तो बिना मास्क के कभी भ्रमण नहीं करते हैं। यदि भारतवासी अपने आध्यात्म एवं योग का साधन अपनाएं तो आज भी ऐसी महामारी पर विजय प्राप्त की जा सकती है। महामृत्युंज्जय मंत्र से हमारे ऋषि मुनि आरोग्यता प्राप्त करके दीर्घायु जीवन व्यतीत करते थे एवं मंत्रोच्चारण व यज्ञों के माध्यम से वायुमण्डल का शुद्धिकरण करते थे। उन्होंने कहा कि आज भारत की धरा पर संकट के बादल छाए हैं। संयोगवश वर्तमान में शक्ति उपासना का नवरात्रि पावन पर्व समय चल रहा है। व्यस्तता के जीवन में आज हमें घर पर रहने का अवसर अनायास मिल गया है ऐसे में हमें इस भागदौड़ की जिन्दगी से घर पर रहने का मौका मिला है तो एकांत साधना कर नवरात्रि मेंं शक्ति की उपासना को स्वयं को निरोग एवं भारत देश को एक बार फिर से शक्तिशाली बना सकते है। उन्होने बताया कि श्रीराम 14 वर्ष वन में रहे, पाण्डव 12 वर्ष वनवास व एक वर्ष अज्ञातवास में रहे किन्तु संकट के क्षणों में उन्होने कर्तव्यपथ को नहीं छोड़ा। उन्होंने बताया कि आज देश का राजा अपनी प्रजा से बार बार घरों में रहने का अनुरोध कर रहा है ऐसे में हमें अपने अन्तर्विद्वेष, राजनीति व धर्म से ऊपर उठकर अपने देश के लिए एकजुट होकर कर्तव्यपथ पर अग्रसर होने की जरुरत है। हम घर पर रहकर शक्ति की पूजा करें, अष्टांग योग जैसे अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, पवित्रता, संतोष, स्वाध्याय का पालन करते हुए आध्यात्म चिन्तन करें। मंगल मंत्रोच्चारण एवं यज्ञ के माध्यम से अपने वातावरण को सैनेटाइज करें यदि संस्कृत मंत्र नहीं जानते तो हिन्दी महामंत्र -

हरे राम, हरे राम,राम राम हरे हरे।

हरे कृष्ण,हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।

का उच्चारण करके भी हम वायुमंडल को सैनेटाइज करने में सक्षम है क्योंकि विज्ञान के अनुसार भी वायुमण्डल में शब्द कभी नष्ट नहीं होता है। मैं सभी से अनुरोध करता हूं कि अपनी संस्कृति का पालन करते हुए भारतीय चिकित्सकों की सलाह को प्राथमिकता दें ताकि ऐसी महामारी का हमारे देश से उन्मूलन हो सके।

Meghshyam Parashar Bureau Incharge
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