छत्तीसगढ़ का एक ऐसा गांव, जहां बेटियां भी हैं एक से बढ़कर एक मूर्तिकार

छत्तीसगढ़ का एक ऐसा गांव, जहां बेटियां भी हैं एक से बढ़कर एक मूर्तिकार

Satya Narayan Shukla | Publish: Sep, 06 2018 11:51:49 PM (IST) Bhilai, Chhattisgarh, India

जिला मुख्यालय दुर्ग से लगा थनौद गांव, जहां हर घर में मूर्तिकार। पीढिय़ों से मूर्तिकला की परंपरा को आगे बढ़ा रहे इन लोगों के साथ अब बेटियां भी आगे आ रही हैं।

भिलाई. जिला मुख्यालय दुर्ग से लगा थनौद गांव, जहां हर घर में मूर्तिकार। पीढिय़ों से मूर्तिकला की परंपरा को आगे बढ़ा रहे इन लोगों के साथ अब बेटियां भी आगे आ रही हैं। राधेश्याम चक्रधारी की चार बेटियां अपने गांव में अब मिसाल बनने जा रही हैं। मूर्तिकार पिता से ही मूर्ति बनाना सीख अब वे उनका हाथ बंटा रही हैं। पिता भी चाहते हैं कि उनकी चारों बेटियां इस पुश्तैनी काम को टेक्नोलॉजी के साथ सीखें। वे अपनी बेटियों को खूब पढ़ा रहे हैं क्योंकि वे खुद नहीं पढ़ पाए इसलिए वे चाहते हैं कि बेटियां फाइन आर्ट में ही डिग्री लेकर इस कला को और बेहतर तरीके से निखार सकें। पिता कहते हैं कि उनकी चार बेटियां बेटों से कम नहीं है खासकर इन दिनों जब वर्कशॉप में काफी काम होता है। उनका साथ देने बेटियां बेटे की तरह बराबरी में खड़ी होती है।

स्कूल में बनाया मॉडल तो पता चला
थनौद के शासकीय उमा स्कूल से पढ़ाई कर चुकी शिल्पा, वर्षा अब कॉलेज में हैं, लेकिन उनकी प्रतिभा स्कूल में उस वक्त निखरकर आई जब वे बेटी बचाओ अभियान के लिए मिट्टी का एक मॉडल लेकर राज्य स्तरीय प्रतियोगिता तक पहुंची। शिल्पा और वर्षा अब गल्र्स कॉलेज दुर्ग की छात्राएँ है और तीसरी बेटी पूनम अभी 11 वीं में है। पूनम कहती है कि उसने आट्र्स सबजेक्ट ही इसलिए चुना कि वह फाइन आर्ट में स्पेशलाइजेशन कर सकें। वह कहती है कि जब उनकी कला को तकनीक का साथ मिलेगा तो वह और भी निखर जाएगी। राधेश्याम चक्रधारी की सबसे छोटी बेटी शालिनी अभी 9 वीं में है, पर मूर्ति बनाने में वह भी पीछे नहीं। जब भी वक्त मिलता है वह गीली मिट्टी को लेकर बैठ जाती है और अपने क्रिएशन को उस पर उकेरती है।

 

Bhilai patrika

मिले बराबरी का मौका
राधेश्याम चक्रधारी बताते हैं कि कुंभकार समाज की अधिकांश बेटियां मूर्ति बनाना जानती है,लेकिन कभी वे खुलकर सामने नहीं आई। पर वे चाहते हैं कि उनकी बेटियां उनके इस काम को आगे लेकर जाएं। हालांकि उनका बड़ा बेटा लव इस जिम्मेदारी को अच्छी तरह निभा रहा है,लेकिन वे चाहते हैं कि बेटे और बेटी में फर्क खत्म कर वे सभी को बराबरी का मौका दें।

पहले तोडऩा सीखा, फिर जोडऩा
पिता बताते हैं कि उनकी बेटियां जब छोटी थी तो अक्सर गणपति की मूर्ति बनाने वक्त वे वहां आती। कभी मूर्ति के कान तोड़ देती तो कभी सूंढ़। पर वे नाराज होने की बजाए उन्हें यह कहकर वापस भेज देते कि उसे वापस जोड़ दो। वे किसी तरह उसे जोड़ते और धीरे-धीरे उन्हें इसमें मजा आने लगा। उनका पूरा बचपन मिट्टी के बीच बीता और वे धीरे-धीरे सब सीखने लगी।

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