PCC अध्यक्ष भूपेश बघेल के परिवार ने 38 साल तक सरकारी जमीन को बता दिया पुश्तैनी, 20 एकड़ पर किया था अवैध कब्जा

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल के परिवार पर सरकारी जमीन कब्जाने का आरोप सच साबित हुआ।

By: Dakshi Sahu

Published: 16 May 2018, 10:36 AM IST

दुर्ग . प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल के परिवार पर सरकारी जमीन कब्जाने का आरोप सच साबित हुआ। न्यायालय ने भूपेश बघेल के पिता नंदकुमार बघेल के उस परिवाद को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने 20 एकड़ सरकारी जमीन को पैतृक संपत्ति होने का दावा किया था। मंगलवार को इस परिवाद पर फैसला न्यायाधीश स्मिता रत्नावत ने सुनाया। प्रकरण के मुताबिक नंदकुमार बघेल ने परिवाद में जानकारी दी थी कि उनके दिवगंत पिता खोमनाथ बघेल ग्राम कुरुदडीह में पटवारी हल्का नंबर 64 के मालगुजार थे।

जब 1973 में उनका निधन हुआ तब विवादित जमीन उनके कब्जे में थी। इसके बाद से इस २० एकड़ भूमि का उपयोग वे करते आ रहे हैं। चकबंदी के दौरान हुई गड़बड़ी के कारण रिकार्ड से उनका नाम गायब हो गया। वर्तमान में यह जमीन उनके कब्जे में है। जिसका वे उपयोग वे कर रहे हैं। इसलिए रिकार्ड को सुधार कर जमीन को उनके नाम पर करने की अनुमति दी जाए।

नंदकुमार बघेल ने कहा था कि खसरा नंबर ८३ का टुकड़ा ८.२०२ हेक्टेयर (२० एकड़) भूमि वर्तमान में शासकीय भूमि के रुप में दर्ज है। मालगुजारी उन्मूलन के पहले इसमें कास्त होती थी। वर्ष१९६९ में चंकबंदी होने के पूर्व खसरा नंबर ८३ विभिन्नि खसरा नंबर ३७,३८,४०,४१,४२,४३,४४,४५,४६ व ५१-६ खसरा नंबर ८३ में बटा हुआ था। चकबंदी के बाद इन समस्त खसरा नंबर की भूमि खसरा नंबर ८३ में समाहित हुआ है। यह विवरण फेहरिस्त में उल्लेखित है। इसके बाद भी राजस्व अधिकारी रिकार्ड दुरुस्त नहीं कर रहे हैं।

1980 में जमीन अपने नाम करने दायर किया था परिवाद
नंदकुमार बघेल ने वर्ष १९८० में सरकारी जमीन को अपने नाम करने के लिए न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया था। यह प्रकरण ३८ साल से न्यायालय में विचाराधीन था। इस प्रकरण में परिवादी ने साक्ष्य परीक्षण कराया था, लेकिन प्रतिवादी ने प्रावधानों के अनुरूप निर्धारित समय पर साक्ष्य परीक्षण नहीं करवाया। इस पर न्यायालय ने १९ मार्च १९९७ को प्रतिवादी साक्ष्य अवसर समाप्त कर दिया था।

सरकारी जमीन पर कब्जे के मामले में जांच टीम ने तीन दिनों तक जांच की थी। पीसीसी अध्यक्ष भूपेश बघेल के परिजनों की कुरूदडीह स्थित जमीन की नापजोख किया था। जमीनों के नापजोख के बाद सभी पुराने रिकार्ड से मौजूदा स्थिति का मिलान किया था। इसके बाद रिपोर्ट शासन को भेजा गया था। विवादित भूमि शहर से लगा हुआ है। जानकारी की मुताबिक जमीन की कीमत करोड़ों में है। यही कारण है कि जमीन कब्जा कर रखने पर ग्रामीणों ने भी आपत्ति की थी। इस जमीन को अपने नाम करने नंदकुमार बघेल वर्षो से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। मामला २०१७ में सार्वजनिक हुआ।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल के पैतृक और सरकारी जमीन पर कब्जे को लेकर जमकर राजनीति हुई। जिला मुख्यालय से लेकर राजधानी में जोगी कांग्रेस ने पत्रकार वार्ता भी ली थी। ६ जनवरी २०१७ को जोगी कांग्रेस के नेता विधान मिश्रा जिले की तत्कालीन कलक्टर आर शंगीता को जमीन से संबंधित कई अहम दस्तावेज सौंपे। जिसमें खुलासा किया था कि कुरुदडीह की जमीन सरकारी जमीन है। जिस पर भूपेश बघेल के पिता नंदकुमार ने कब्जा कर रखा है।

इस मामले में राज्य शासन ने जांच का भी आदेश दिया था। तीन सदस्यीय टीम का गठन किया गया था। जांच टीम ने बघेल और उनके परिजनों के कुरूदडीह, बलौदी और भिलाई तीन में जमीन को नापजोख भी की थी। अतिरिक्त शासकीय अभिभाषक, नागेश्वर यदु ने बताया कि इस प्रकरण में परिवादी नंदकुमार बघेल ऐसा एक भी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाए जिससे यह सिद्ध हो कि वास्तव में जमीन उनके नाम की है। इसी बात को हमने प्रमुखता से रखा। जिसे न्यायालय ने सही ठहराया, और परिवाद को खारिज किया।

आजादी के बाद हुआ मालगुजारी का उन्मूलन

१९४७ में देश आजाद हुआ। तब देश में मालगुजारी चलती थी।
१९५० में मालगुजारी का उन्मूलन हुआ। कृषि योग्य भूमि (कब्जा) को उनके नाम पर किया गया। अन्य भूमि को शासन ने अपने अधीन ले लिया।
१९५५ में अधिकार अभिलेख तैयार किया। दस्तावेज में नाम चढ़ाया गया।
१९५९ में भूराजस्व तैयार किया गया। जमीन को खसरा नंबर पर विभाजन किया गया।

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Dakshi Sahu Desk/Reporting
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