महापौर के दिग्गज दावेदार दौड़ से बाहर, CM के गृहजिले में मंत्री और सांसद के करीबी तक जुगाड़ नहीं पाए पार्षद का टिकट

नगर निगम चुनाव के पैटर्न में बदलाव ने महापौर के कई दावेदारों के गणित को बिगाड़ दिया। स्थिति ऐसी हो गई कि मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, सांसद व संगठन के बड़े नेताओं से करीबी के बाद भी टिकट तक नहीं जुगाड़ पाए। (Bhilai News)

By: Dakshi Sahu

Published: 08 Dec 2019, 04:43 PM IST

दुर्ग. नगर निगम चुनाव (CG nagar nigam Election) के पैटर्न में बदलाव ने महापौर के कई दावेदारों के गणित को बिगाड़ दिया। स्थिति ऐसी हो गई कि मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, सांसद व संगठन के बड़े नेताओं से करीबी के बाद भी टिकट तक नहीं जुगाड़ पाए। महापौर से पहले ही पार्षदी की दौड़ से बाहर हो गए। कई दावेदारों का समीकरण आरक्षण के कारण बदल गया। उन्हें आरक्षण के कारण जहां वार्ड छोडऩा पड़ा वहीं दूसरे दावेदारों के दबाव के कारण शिफ्टिंग का जुगाड़ भी काम नहीं आया।

राज्य शासन इस बार नगरीय निकाय एक्ट में बदलाव कर नगर निगम के महापौर के चुनाव के पैटर्न को बदल दिया है। इसके तहत अब महापौर का चुनाव सीधे मतदाताओं द्वारा नहीं कराया जाएगा। जनता द्वारा चुने गए पार्षद महापौर का चुनाव करेंगे। इस पैटर्न के तहत महापौर से पहले पार्षद के लिए चुनावी परीक्षा से होकर गुजरना पड़ेगा। पार्षदों के आरक्षण में कई दावेदार पहले ही बाहर हो चुके थे। वही अब टिकट नहीं मिलने से कई दावेदार दौड़ से बाहर हो गए हैं।

कांग्रेस के ये दावेदार दौड़ से हो गए बाहर
आरएन वर्मा, पूर्व महापौर, सीएम भूपेश बघेल वोरा के करीबी
शंकर लाल ताम्रकार, पूर्व महापौर, सांसद मोतीलाल वोरा के नजदीकी
राजेन्द्र साहू, प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रतिनिधि, सीएम भूपेशबघेल के करीबी
जितेंद्र साहू, प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मीडिया प्रभारी, सांसद ताम्रध्वज साहू के बेटे
संदीप वोरा, यूथ कांग्रेस के प्रदेश पदाधिकारी (विधायक वोरा के बेटे व सांसद वोरा के नाती)

भाजपा में ये पार्षद नहीं कर पाए टिकट की जुगाड़
चंद्रिका चंद्राकर, मौजूदा महापौर, सांसद सरोज पांडेय की करीबी
दिनेश देवांगन, लोककर्म प्रभारी व पूर्व सभापति, सांसद सरोज पांडेय के समर्थक
देवेंद्र चंदेल - संगठन में अहम जिम्मेदारी, सांसद विजय के करीबी
शिव चंद्राकर, पिछड़ा वर्ग आयोग के पूर्व सदस्य
ऊषा टावरी, जिला भाजपा अध्यक्ष
शिवेंद्र परिहार, राजस्व विभाग प्रभारी
चैनसुख भट्टड़, संगठन के पदाधिकारी

आरक्षण मुक्त इसलिए थी लंबी कतार
महापौर का पद इस बार आरक्षण मुक्त है। इसलिए चुनाव की प्रक्रिया से पहले ही दावेदारों की कतार लग गई थी। इनमें लंबे समय से अवसर की प्रतीक्षा कर रहे दावेदार भी शामिल थे, लेकिन पहले आरक्षण और बाद में महापौर का अप्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव की घोषणा ने दावेदारों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।

मंत्री-विधायक के बेटे दिग्गजों के करीबी थे दावेदार
दुर्ग महापौर का पद आरक्षण मुक्त होने से दिग्गजों के अपनों ने भी मौके का फायदा उठाने जुगत लगानी शुरू कर दी थी। कांग्रेस में मंत्री व विधायक के बेटों के साथ सीएम के आधा दर्जन करीबी नेता अप्रत्यक्ष रूप से दावेदारी कर रहे थे।वहीं भाजपा के सांसदों से जुड़े संगठन के नेता और निगम सरकार के आधा दर्जन से ज्यादा मंत्री कतार में लग गए थे।

जिन्हें टिकट मिली उनकी भी चुनौती कम नहीं
बदले पैटर्न पर महापौर के चुनाव के लिए दावेदारों को दोहरे चुनौती का सामना करना पड़ेगा। महापौर से पहले उन्हें वार्ड में पार्षद का चुनाव जीतने की बड़ी चुनौती है। वहीं पार्षदी मिल भी गई तो महापौर के लिए बाद में अपनों की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।

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