दुष्कर्म पीडि़त बेटी के सरकारी नौकर पिता को इलाज के लिए भी 8 महीने से नहीं मिला वेतन

बच्ची से दुष्कर्म और फिर खेत में फेंक दिए जाने का दर्द परिवार ने सिर्फ उसी वक्त नहीं झेला, अब यह जख्म नासूर की तरह परेशान कर रहा है।

By: Satya Narayan Shukla

Published: 09 Dec 2017, 11:44 PM IST

राजनांदगांव. ढाई साल की बच्ची से दुष्कर्म और फिर उसे खेत में फेंक दिए जाने का दर्द उसके परिवार ने सिर्फ उसी वक्त नहीं झेला था, अब तक यह जख्म नासूर की तरह पूरे परिवार को परेशान कर रहा है। अब इस परिवार को एक और लड़ाई लडऩी पड़ रही है।

चिकित्सकों ने ऑपरेशन करने कहा
यह लड़ाई उस सरकारी संस्था के प्रमुख से लडऩी पड़ रही है, जहां इस मासूम के पिता नौकरी करते हैं। पिछले ८ महीने से उसे वेतन नहीं मिला है। पीडि़त पिता का कहना है कि ढाई साल की उम्र में बच्ची के साथ हुई घटना के बाद उसके जख्म ऐसे हो गए हैं कि चिकित्सकों ने ऑपरेशन करने कहा है लेकिन आर्थिक दिक्कतों के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा है।

बच्ची को मृत समझकर खेत में फेंक दिया था

जिला मुख्यालय के एक मोहल्ले में रहने वाले रमेश (बदला हुआ नाम) की ढाई साल की बेटी के साथ मोहल्ले के ही एक युवक ने अक्टूबर २०१४ में दुष्कर्म किया था। आरोपी ने इस घटना को अंजाम देने के बाद बच्ची को मृत समझकर खेत में फेंक दिया था। घर में बच्ची के खेलकर नहीं लौटने पर जब परिजनों ने खोजबीन की तो बच्ची घायल अवस्था में मिली। इसके बाद पूरे घटनाक्रम का पता चला। बाद में आरोपी पकड़ा गया लेकिन इस परिवार के ऊपर जो कहर टूटा था, उससे ये परिवार अब तक नहीं उबर पाया है।

मानवता हो रही तार-तार
मासूम बच्ची के साथ कम उम्र में इस तरह की घटना होने के बाद डाक्टरों ने उसके बच्चेदानी का ऑपरेशन करने कहा है। अभी भी इस बच्ची का इलाज आम्बेडकर अस्पताल में चल रहा है। ऑपरेशन के लिए रुपयों की जरूरत है लेकिन सरकारी नौकरी में होने के बाद भी पिता अपनी बेटी का इलाज नहीं करा पा रहा है। कारण यह है कि इस चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का वेतन उसके काम करने वाले महाविद्यालय के प्राचार्य ने आठ महीने से रोक दिया है। पीडि़त पिता ने बताया कि जिस वक्त उसकी बच्ची के साथ यह घटना घटी थी, उस वक्तवह उसे लेकर सीधे राजधानी के आम्बेडकर अस्पताल चला गया था, जहां कई दिन तक बच्ची का इलाज चला। इस दौरान वह संस्था में उपस्थिति नहीं दे सका। बाद में संस्था को इसकी जानकारी दी लेकिन उसे यहां भी कोई रियायत नहीं दी गई।

आयोग में शिकायत
मानवाधिकार आयोग में 15 नबम्बर 2017 को संस्था प्रमुख के इस तरह के रवैये की शिकायत की गई है। पीडि़त ने अपनी परिस्थितियां बताते हुए वेतन भुगतान कराने के लिए गुहार लगाई है। पीडि़त ने बताया कि कार्यालय में अपनी उपस्थिति देने के बावजूद भी उसे हाजिरी रजिस्टर में हस्ताक्षर करने नहीं दिया गया। शिकायत में पीडि़त ने कहा कि बच्ची की तबीयत को लेकर वे मानसिक तौर टूट चुके हैं।

दे दी थी मौखिक सूचना
पीडि़त पिता ने बताया कि उस वक्त उनकी प्राथमिकता में बेटी का इलाज था। हालांकि संस्था प्रमुख को मौखिक तौर पर सूचना दे दी गई थी, इसके बावजूद लौटने पर उसे आधा वेतन दिया गया और अब आठ महीने से उसे वेतन नहीं दिया जा रहा है।

संस्था प्रमुख ने कही अपनी बात
संस्था प्रमुख ने वेतन नहीं देने की बात को सही बताते हुए कहा कि संबंधित व्यक्तिका व्यवहार काम के प्रति ठीक नहीं है। वह नशे की हालत में संस्था में पहुंचता है और मारपीट पर उतारू हो जाता है। इसकी शिकायत पुलिस में भी की जा चुकी है। उन्होंने कहा कि मानवाधिकार आयोग का पत्र प्राप्त हुआ है, जिसका विधिवत जवाब प्रेषित किया जाएगा।

Satya Narayan Shukla Desk/Reporting
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