छत्तीसगढ़ के इस नगर निगम में 23 करोड़ के सफाई ठेके में बड़ी गड़बड़ी, राज्य शासन ने बैठाई जांच कमेटी, अफसर हुए मौन

पूर्व नेता प्रतिपक्ष रिकेश सेन की शिकायत पर राज्य शासन मामले की जांच करवा रहा है। नगर निगम आयुक्त प्रकाश कुमार सर्वे ने भी तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित कर दी है।

By: Dakshi Sahu

Published: 04 Oct 2021, 04:26 PM IST

भिलाई. नगर निगम भिलाई में पिछले वर्ष एक साल के लिए 23 करोड़ 21 लाख 52 हजार रुपए में दिए सफाई ठेका को लेकर एक बार फिर बखेड़ा खड़ा हो गया है। पूर्व नेता प्रतिपक्ष रिकेश सेन की शिकायत पर राज्य शासन मामले की जांच करवा रहा है। नगर निगम आयुक्त प्रकाश कुमार सर्वे ने भी तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित कर दी है। अब कमेटी की जांच और रिपोर्ट पर सबकी निगाहें है। कमेटी सिर्फ लेबर लाइसेंस मामले की जांच करेगी कि पूरी ठेका प्रक्रिया की जो अवैधानिक तरीके से एजेंसी को दे दी गई थी।

नगर निगम ने पूरे शहर की एक साल (नवंबर से अक्टूबर 2021) तक सफाई के लिए सभी जोन में स्कोप ऑफ वर्क के अंतर्गत नाली, सड़क, बाजार एवं तिपहिए रिक्शे/ई रिक्शा से आवासीय एवं व्यावसायिक क्षेत्र से डोर-टू डोर कचरा संग्रहण व अन्य सफाई कार्य के लिए सात अलग-अलग प्रस्ताव में कुल 24 करोड़ 18 लाख 87 हजार 881 रुपए की निविदा बुलवाई थी। चार ठेकेदारों ने निविदा में भाग लिया था। बाद में नेचर ग्रीन टूल्स एंड टेक्रीकल प्राइवेट लिमिटेड नोएडा (उत्तरप्रदेश) को 23 करोड़ 21 लाख 52 हजार रुपए में सफाई ठेका दे दिया गया ।

क्या जांच कमेटी इनकी जवाबदेही तय करेगी
1. सामान्य सभा में मौजूद पार्षद
क्या सामान्य सभा एक ही बार मेंं टेंडर की अनुमति, नियम-शर्तों की स्वीकृति, प्रशासकीय स्वीकृति और निविदा में प्राप्त न्यूनतम दरदाता से कार्य कराए जाने की वित्तीय स्वीकृति एक साथ दे सकता है? इससे पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ था। अगर नहीं तो सामान्य सभा में पारित इस संकल्प के लिए दोषी कौन-कौन हैं, क्या इसका खुलासा कमेटी करेगी?

2. पूर्व आयुक्त ऋतुराज रघुवंशी
सदन ने ऐसा निर्णय ले भी लिया तो क्या तत्कालीन आयुक्त ऋतुराज रघुवंशी को प्रशासनिक दृष्टिकोण से पुनर्विचार के लिए नहीं भेजा जाना चाहिए था? सचिव जीवन वर्मा को भी नहीं चाहिए था कि वे संज्ञान में लाएं? कमेटी क्या इसके लिए पूर्व आयुक्त और निगम सचिव को जिम्मेदार ठहराएगी?

3. पूर्व महापौर एवं उनकी परिषद
खुद तत्कालीन महापौर परिषद की आपत्ति थी कि ठेकेदार ने ऑनलाइन टेंडर में लेबर लाइसेंस प्रस्तुत (स्कैन डॉक्यमेंट) नहीं किया है। चाहे गए वर्ष की वित्तीय क्षमता का भी उल्लेख नहीं किया गया है। मध्यप्रदेश के एक निकाय मेंं काली सूची में दर्ज होने की बात भी आई थी। बावजूद आगे की प्रक्रिया पूरी कर सफाई ठेका भी पंसद की एजेंसी को दे दी गई? इस मामले में कमेटी अपना स्पष्ट अभिमत के साथ जवाबदेही तय करेगी?

4. सचिव जीवन वर्मा
अगर सामान्य सभा से पहले की संपूर्ण मंजूरी मिल चुकी थी। एमआईसी में प्रस्ताव रखना भी नहीं था तो सचिव जीवन वर्मा ने इस विषय की संक्षेपिका क्यों बनाई गई? परिषद के सदस्यों को क्यों दिया गया? कमेटी इस पहलू पर गौर करेगी?

5. शिकायत झूठी तो ठेकेदार पर
एक ठेकेदार ने आयुक्त से लिखित शिकायत की थी कि निविदाकारों ने ऑनलाइन भरी निविदा में वित्तीय वर्ष 2019-20 के टर्न ओवर संबंधी शर्त की परिपूर्ति नहीं की है। नेचर ग्रीन ने 2018-19 का 27 करोड़ और रमन ने शून्य भरा था। तो क्या यह शिकायत झूठी थी? और नहीं तो ठेकेदार पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

शहर सरकार और नेता प्रतिपक्ष से शहर मांग रहा जवाब
1. पहले निरस्त, बाद में उसी को ठेका क्यों
पत्रिका ने सालभर पहले ही सफाई ठेका की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाया था। इसके बाद 12 अक्टूबर 2020 को हुई तत्कालीन महापौर परिषद की बैठक में न्यूनतम दर वाले ठेकेदार को लेकर तीन बिंदुओं पर आपत्तियां की गई। उसने नियम व शर्तों के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2019-20 में 3 करोड़ का वार्षिक टर्न ओवर का वित्तीय क्षमता प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किया है,, देश के एक अन्य निकाय में उसका नाम काली सूची में दर्ज है और एजेंसी के पास लेबर लाइसेंस भी नहीं है। स्वास्थ्य विभाग के प्रभारी लक्ष्मीपति राजू सहित परिषद के कई सदस्यों ने इस बात की पुष्टि भी की थी। बावजूद इन तीनों आपत्तियों को निराकृत किए बिना परिषद की अगली बैठक में सर्वसम्मति से ठेका की मंजूरी दे दी गई। बाद में यही लोग एमआईसी में प्रस्ताव प्रस्तुत होने से ही से इनकार करते रहे।

2. तब गड़बड़ी देखकर भी क्यों खामोश रहे रिकेश
रिकेश सेन तब चुने हुए पार्षद और निगम में नेता प्रतिपक्ष थे। इतनी बड़ी गड़बड़ी होती रही और वे खामोश रहे, आखिर क्यों ? बिना लेबर लाइसेंस के एजेंसी से दस महीने तक सफाई कराने का मामला भी पत्रिका ने सबसे पहले उठाया। अब जब एक साल के ठेके में मात्र 27 दिन रह गए हैं, रिकेश हो-हल्ला मचा रहे हैं। लोग गंदगी से परेशान हैं। विपक्ष के नाते रिकेश ने कभी आवाज क्यों नहीं उठाई?

पत्रिका ने पहले ही उठाया था ये दो सवाल
1. पत्रिका ने निविदा के नियम व शर्त क्रमांक 27 में वित्तीय वर्ष 2019-20 में 3 करोड़ वार्षिक टर्न ओवर की अनिवार्यता पिर पहले की सवाल उठाया था। आशंका जताई थी कि निविदा मूल्य से अधिक का टर्न ओवर की शर्त लगाना निविदा को प्रभावित करने की मंशा है।
2. यह भी बताया था कि केंद्रीय सतर्कता आयोग नई दिल्ली द्वारा जारी गाइडलाइन का उल्लंघन है। आयोग के ऑफिस मेमोरंडम में पीक्यू के संबंध में पेज-3 ए (1) में उल्लेख है कि पिछले तीन वर्षो में 31 मार्च तक निविदा राशि का 30 प्रतिशत वित्तीय टर्न ओवर होना चाहिए।

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