हैप्पी टीचर्स-डे: इन शिक्षकों को प्रणाम, संस्कृत को बनाया सरल विषय, फोन से लेते हैं होमवर्क की जानकारी

हैप्पी टीचर्स-डे: इन शिक्षकों को प्रणाम, संस्कृत को बनाया सरल विषय, फोन से लेते हैं होमवर्क की जानकारी

Satyanarayan Shukla | Publish: Sep, 04 2018 07:03:34 PM (IST) Bhilai, Chhattisgarh, India

इस वर्ष मुख्यमंत्री शिक्षक अलंकरण में संभाग स्तर पर शिक्षाश्री सम्मान के लिए चुने गए तीन शिक्षक भी ऐसे ही कुछ खास है। जिनके प्रयास और नवाचार से ना सिर्फ स्कूल को अलग पहचान मिली बल्कि बच्चों का रूझान भी पढ़ाई में बढ़ गया।

भिलाई. माता-पिता के बाद शिक्षक ही ऐसे है जो बच्चे के सबसे करीब होते हैं और ऐसे शिक्षक जब अपने स्कूल के लिए कुछ हटकर करते हैं तो वे अपने आप ही दूसरे शिक्षकों के लिए भी मिसाल बन जाते हैं। इस वर्ष मुख्यमंत्री शिक्षक अलंकरण में संभाग स्तर पर शिक्षाश्री सम्मान के लिए चुने गए तीन शिक्षक भी ऐसे ही कुछ खास है। जिनके प्रयास और नवाचार से ना सिर्फ स्कूल को अलग पहचान मिली बल्कि बच्चों का रूझान भी पढ़ाई में बढ़ गया। शिक्षाश्री का सम्मान पाने वाले तीन शिक्षकों में दो शिक्षक दुर्ग जिले के जबकि एक कवर्धा जिले से चुने गए हैं।

इंग्लिश लैब बनाकर भगाया अंग्रेजी का भूत
सेक्टर 7 स्थित शासकीय हाईस्कूल की पहचान इंग्लिश लैब के रूप में ज्यादा है। व्याख्याता ऋतु सिन्हा के प्रयास से तैयार अंग्रेजी लैब अचानक नहीं बना। उनकी 6 साल की मेहनत के बाद यहां अंग्रेजी का रिजल्ट 98 से 100 फीसदी तक पहुंच चुका है। वे बताती हैं कि लर्निंग आउट कम की तर्ज पर उन्होंने बच्चों को सिखाना शुरू किया। बच्चों से ही वह शब्द मंगवाएं जो उन्हें कठिन लगते थे। इस तरह हर चैप्टर की अपनी डिक्शनरी तैयार की। जिससे बच्चों को उन शब्दों के अर्थ को समझना और भी आसान हो गया। एससीईआरटी की मास्टर टे्रनर बन चुकी ऋतु अब दूसरे शिक्षकों को भी यही ट्रिक सिखाती हैं। वे बताती हैं कि शिक्षक पढ़ाने का तरीका जितना सहज और आसान निकालेंगे, बच्चों की रूचि उतनी ही बढ़ती जाएगी।

Teachers-day

यह है ऐसे गुरुजी जो बच्चों को लेने जाते हैं घर
कवर्धा जिले के कापादह शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला के व्याख्याता रुपचंद्र जायसवाल की पहचान फोन वाले गुरुजी से ज्यादा है। वे बताते हैं कि तीन साल पहले जब वे स्कूल में आए तो दर्ज संख्या मात्र 22 थी, लेकिन अब स्कूल में ढाई सौ से ज्यादा बच्चे हैं। हर बच्चों को शिक्षा से जोडऩे का संकल्प लेकर वे अपना कार्य करते रहे। प्रिंसिपल और सहयोगियों का साथ मिला तो उनके अभियान को और बल मिला। वे सब पहले घर-घर गए और बच्चों को स्कूल लेकर आए। आज भी कोई बच्चा अनुपस्थित होता है तो सीधे उनके पैरेंट्स से पूछने घर तक जाते हैं। उन्होंने बताया कि बच्चों में पढ़ाई का माहौल बनाने उन्होंने स्कूल में 50 बच्चों का ऐसा ग्रुप बनाया है जो रोज सुबह 5 बजे और रात में 10 बजे बच्चों के घर पर फोन कर पैरेंट्स से यह पूछते हैं कि बच्चे पढ़ रहे हैं या नहीं। पैरेंट्स को भी पता है कि फोन की घंटी बजी यानी गुरुजी का ही फोन है। साथ ही बच्चों को रोजाना मिलने वाले होमवर्क में पैरेट्स के साइन भी जरूरी है ताकि शिक्षकों को पता चल सके कि वाकई बच्चे अपने टाइम टेबल से पढ़ रहे हैं।

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संस्कृत को बनाया इतना सरल कि बच्चों को मिली स्कालरशिप
संस्कृत व्याकरण को आसानी से समझाना हर किसी के बस की बात नहीं। पर भिलाई के कोहका स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला की संस्कृत व्याख्याता शैलजा सुरेश ने अपनी कुछ अलग ही युक्ति लगाई। खेल-खेल में संस्कृत को ऐसा सिखाया कि इस साल स्कूल के सैकड़ों बच्चों को एक लाख 52 हजार रुपए की स्कालरशिप मिल गई। शैलजा बताती हैं कि 2003 में स्कूल में संस्कृत लिट्रेचर विषय शुरू हुआ तब से उन्होंने इस सेंटर को लैब के रूप में विकसित किया। खुद चार्ट बनाने से लेकर मॉडल तक बनाए। यहां तक कि दूसरे स्कूलों में भी संस्कृत की पढ़ाई आसान हो सके। इसलिए उन्होंने गाइड भी तैयार की। ताकि शिक्षकों को पढ़ाने में आसानी हो।

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