Breaking news ऑनलाइन क्लास के नाम पर बच्चों को हो रहे बुढ़ापे वाले रोग

क्या कहना है विशेषज्ञों का.

By: Abdul Salam

Published: 21 Aug 2021, 09:56 PM IST

भिलाई. ऑनलाइन क्लास से न केवल पालकों की जेब पर नए मोबाइल, इंटरनेट का बोझ आया है, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य पर भी इसका खासा बुरा असर नजर आने लगा है। विशेषज्ञों के मुताबिक लगातार स्क्रीन देखने से आंखें कमजोर होने के साथ-साथ मोबाइल की रेडिएशन से स्वास्थ्य भी गिरता जा रहा है। बच्चों को बचपन में ही बुढ़ापे वाले रोग होते जा रहे हैं। स्कूल प्रबंधन भी यह मानता है कि कम उम्र के बच्चों को मोबाइल देना गलत है। असल में ऑन लाइन क्लॉस से वैसी पढ़ाई नहीं हो पा रही है। इसके विपरीत बच्चों के हाथों में मोबाइल आ गया, जिसका उपयोग वे वीडियो गेम खेलने से लेकर कार्टून देखने में तक कर रहे हैं।

आंख और कान के बढ़ रहे मरीज
जिला में आंखों के मरीजों की संख्या में लॉक डाउन के बाद से करीब २० फीसदी बढ़ चुकी है। जिसमें सबसे अधिक पढऩे वाले बच्चे हैं। दसवीं से बारहवीं क्लास के बच्चों में सबसे अधिक आंख से संबंधित शिकायत आ रही है। वहीं कान से संबंधित मरीजों की संख्या में भी खासा इजाफा हो रहा है। जिला में 40 फीसदी अधिक मरीज कान के चिकित्सकों के पास पहुंच रहे हैं। ऑनलाइन क्लास के साथ बच्चे कार्टून भी मोबाइल में देख रहे हैं। इसके साथ-साथ अधिक साउंड के साथ गेम भी खेल रहे हैं। जिसका यह साइड इफेक्ट हो रहा है कि बच्चों की सुनने की क्षमता कम होने लगी है।

चश्मा का बढ़ रहा नंबर
चिकित्सकों के मुताबिक दसवीं और बारहवीं क्लास के बच्चों को लगे चश्मों का नंबर पिछले एक साल में बढ़ा है। इसी तरह से पहले छोटे क्लास के एक्का-दुक्का बच्चों को ही चश्मा लगता था ऑनलाइन क्लास की वजह से इन बच्चों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है। वे मानते हैं कि छोटे बच्चों की ऑनलाइन क्लॉसेज को बंद कर देना बेहतर है।

बच्चों की आंखो पर पड़ रहा बुरा असर
कोरोना काल में अधिकतर शिक्षण संस्थान बंद हैं, ऐसे में बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है। बच्चे मोबाइल, लैपटॉप या कंप्यूटर से ऑनलाइन क्लास कर रहे हैं। जिसका उनके आंखों पर बहुत ही बुरा असर पड़ रहा है। बच्चों की नजर लगातार कमजोर हो रही है, जिससे पालक भी परेशान हैं। ऑनलाइन क्लासेस में बच्चों को पढ़ाई के लिए लगातार मोबाइल, लैपटॉप या कंप्यूटर की स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखना पड़ता है, जिसका नकारात्मक प्रभाव उनके आंखों पर पड़ रहा है। पहले उम्र अधिक होने के बाद आंख खराब हुआ करती थी। अब ऑनलाइन क्लास की वजह से बच्चों को अधिक उम्र में होने वाले रोग हो रहे हैं।

बच्चों की आंख से आ रहा पानी
नेत्र विशेषज्ञों के मुताबिक स्क्रीन से निलकने वाली ब्लू लाइट बहुत प्रभावशाली होती है। आंखों के ऊपर इस लाइट का गहरा असर पड़ता है, मोबाइल या लैपटॉप का इस्तेमाल करते समय बच्चे पलक झपकाना भूल जाते हैं, जो बच्चों की आंखों के लिए परेशानी का सबब बनता है। ऑनलाइन क्लासेस की वजह से बच्चों पर असर पड़ रहा है, मोबाइल से क्लास अटेंड करने की वजह से बच्चों की आंख से पानी आ रहा है, कम उम्र के बच्चों को चश्मे की जरूरत पडऩे लगी है।

हर बीस मिनट बाद स्क्रीन से हटा लेना चाहिए नजर
एक मिनट में 11 से 16 बार पलक झपकाना चाहिए। जिससे आंखों के ऊपर आंसू की पतली लेयर बनी रहती है और आंख पूरी तरह से सूखती नहीं है। 34 सेकेंड में आंख के आंसू खत्म हो जाते हैं। आंखों की हिफाजत के लिए हर 20 मिनट के बाद लैपटॉप से नजर हटा लेना चाहिए, स्क्रीन से नजरों को हटाने के बाद दूर तक देखना चाहिए। भारत में मेडिकल भाषा में इसे सिक्स विजन कहते हैं।

इयर बर्ड और इयर फोन का न करें इस्तेमाल
चिकित्सकों के मुताबिक कान का जितना हिस्सा बाहर नजर आता है इसे पिन्ना कहते हैं और असल में यह कान का सबसे कम महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे अंदर कान का पर्दा यानी ईयर ड्रम होता है। उसके अंदर के हिस्से को इनर ईयर कहते हैं। इसमें तमाम नसें और अंग होते हैं, जो दिमाग तक जाते हैं। जब बोलते हैं, तब हवा में शब्द का कंपन उत्पन्न होता है। इस कंपन वाली हवा को पिन्ना एकत्रित करके कान के पर्दे तक भेजता है। हवा के कंपन से कान का पर्दा हिलता है, जो उससे जुड़ी कॉकलिया को हिलाता है। कॉकलिया इस कंपन को दिमाग तक पहुंचाती है। जिसे दिमाग समझ कर शब्द का रूप देता है।

ईयरफोन और हेडफोन में से कौन है बेहतर
विशेषज्ञों के मुताबिक ईयरफोन के मुकाबले हेडफोन ज्यादा सुरक्षित है। इसका कारण यह है कि हेडफोन कान के ऊपर लगता है जबकि इयरफोन कान के अंदर लगता है। इयरफोन में कंपन की कान के पर्दे से दूरी कम होती है, इसलिए हेडफोन अधिक सुरक्षित हैं। एक घंटे से अधिक हेडफोन या ईयरफोन ना लगाएं। वॉल्यूम कम ही रखें। फोन में सुरक्षित वॉल्यूम रेंज नजर आती है, तो ध्यान रखें कि आवाज सुरक्षित रेंज में रहे।

फंगस इंफेक्शन के बढ़ गए मामले
एसवीएम हॉस्पिटल, दुर्ग के डॉक्टर मयूरेश वर्मा ने बताया कि कान में कम सुनाई देने की शिकायत पिछले एक साल के दौरान 40 फीसदी तक बढ़ गई है। सबसे अधिक फंगस इंफेक्शन के मामले बढ़ गए हैं। ऑन लाइन क्लास अटेंड करने वाले दस साल से अधिक उम्र के बच्चों को लेकर पालक अधिक आ रहे हैं। बच्चों के कान की वह नस टूट रही है, जो उद्योगों में काम करने वाले कर्मियों की अधिक आवास के बीच रहने की वजह से टूट जाती है। यह ईयरफोन को अधिक साउंड के साथ देर तक कान में लगाए रखने का नतीजा है।

ऑनलाइन क्लास की वजह से बच्चों की नजरें हो रही कमजोर

नेत्ररोग विशेषज्ञ, सुपेला, हॉस्पिटल बीपी शर्मा ने बताया कि पिछले एक साल के दौरान देखा जा सकता है कि ऑनलाइन के नाम पर बच्चों के हाथ में मोबाइल आ गया है। जिसका उपयोग वे ऑनलाइन क्लास के बाद वीडियो गैम और फिल्म वगैरह देखने में कर रहे हैं। आंख की शिकायत इस वजह से बीस फीसदी बढ़ गई है। बच्चों को क्लास अटेंड करने के बाद रेस्ट जरूरी है। उस ओर पालकों को ध्यान देना होगा। बच्चों को दिनभर में पपीता, गाजर, हरी सब्जी, दूध, अंडे दें, जिससे उनको प्रोटीन मिलती रहे।

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